दहेज मृत्यु पर विरलतम मामलों में उम्रकैद उचित:हाईकोर्ट ने आजीवन कारावास की सज़ा घटाई, तत्काल रिहा करने का निर्देश

दहेज मृत्यु पर विरलतम मामलों में उम्रकैद उचित:हाईकोर्ट ने आजीवन कारावास की सज़ा घटाई, तत्काल रिहा करने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज मृत्यु के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि इस तरह के विरल से विरलतम मामलों में ही उम्र कैद की सज़ा दी जानी चाहिए। जहां यह स्पष्ट हो कि पीड़िता की हत्या की गई है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने बिजनौर के चांदपुर के शकील अहमद व अन्य की अपील पर सुनवाई करते हुए दिया है।

इसी के साथ कोर्ट ने दहेज मृत्यु के आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उसकी उम्रकैद की सजा घटाकर जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया। साथ ही दोनों को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया है।अभियोजन के अनुसार नाजिया की शादी 14 दिसंबर 2014 को शेरबाज उर्फ शादाब से हुई थी। आरोप था कि शादी के बाद ससुराल पक्ष ने बाइक और दो लाख रुपये दहेज मांग की और नौ अप्रैल 2015 को केरोसिन डालकर नाजिया को जला दिया गया, जिससे वह लगभग 80 प्रतिशत झुलस गई और इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। ट्रायल कोर्ट ने शकील अहमद और शेरबाज उर्फ शादाब को आईपीसी की धारा 304 बी के तहत उम्र कैद तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत दो वर्ष कारावास और 10 हज़ार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि मृतका की अस्वाभाविक मृत्यु ससुराल में हुई। ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज दोषसिद्धि में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई। सजा के प्रश्न पर कोर्ट ने हेम चंद बनाम हरियाणा राज्य में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आईपीसी की धारा 304 बी में न्यूनतम सजा सात वर्ष है, जो उम्र कैद तक बढ़ाई जा सकती है लेकिन हर मामले में अधिकतम सजा देना आवश्यक नहीं है। यह विरल से विरलतम मामलों में ही होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्ष समाज के कमजोर आर्थिक वर्ग से हैं और अभियुक्त पिछले दस वर्ष से अधिक समय से जेल में हैं। इन परिस्थितियों में उम्र कैद अत्यधिक कठोर प्रतीत होती है। कोर्ट ने उम्रकैद की सजा घटाकर 10 वर्ष कर दी। अभियुक्त दस वर्ष से अधिक सजा काट चुके हैं इसलिए उनकी सजा जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित मानते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया है।

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