Archana Puran Singh Son Aaryamann Sethi Depression: फिल्म और टेलीविजन जगत की जानी-मानी हस्ती अर्चना पूरन सिंह अक्सर अपनी हंसी और बेबाक अंदाज के लिए जानी जाती हैं। लेकिन हाल ही में उनके बेटे आर्यमन सेठी ने अपनी जिंदगी के एक ऐसे दौर का खुलासा किया, जिसने परिवार को अंदर तक हिला दिया था। कम उम्र में बड़े सपने देखने वाले आर्यमन को एक गंभीर चोट ने ऐसा झटका दिया कि वो लंबे समय तक मानसिक तनाव और डिप्रेशन से जूझते रहे। आर्यमन ने क्या कुछ कहा, चलिए जानते हैं।
14 साल की उम्र में झेला डिप्रेशन (Archana Puran Singh Son Aaryamann Sethi Depression)
आर्यमन बचपन से ही फुटबॉल के प्रति बेहद जुनूनी थे। महज 14 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़कर इंग्लैंड में ट्रेनिंग लेने का फैसला किया। वहां वह एक प्रतिष्ठित क्लब के साथ खेल रहे थे और भविष्य में बड़े लीग में खेलने का सपना देख रहे थे। परिवार ने भी उनके सपनों को पंख दिए और उन्हें विदेश भेजा। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
इंग्लैंड पहुंचने के कुछ ही समय बाद अभ्यास के दौरान उनके पैर में गंभीर चोट लग गई। सर्जरी और लंबे इलाज के कारण उन्हें वापस भारत लौटना पड़ा। बैसाखियों के सहारे चलना और अस्पताल के चक्कर लगाना उस उम्र में उनके लिए बेहद कठिन अनुभव था। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी और अगले साल दोबारा इंग्लैंड लौटे, लेकिन तब तक शरीर पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था।
पढ़ाई और खेल दोनों का ही दबाव
उस दौरान पढ़ाई और खेल दोनों का दबाव था। उनके साथ खेलने वाले साथी तेजी से आगे बढ़ रहे थे, जबकि वो खुद को पीछे छूटता हुआ महसूस कर रहे थे। यही वो समय था जब उनके भीतर निराशा घर करने लगी। धीरे-धीरे ये स्थिति डिप्रेशन और घबराहट के दौरों में बदल गई। उन्होंने स्वीकार किया कि कई बार वह अपने कमरे से बाहर निकलने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते थे।
विदेश में अकेलेपन का एहसास और अधूरा सपना उनके लिए मानसिक रूप से बेहद भारी साबित हुआ। लेकिन इस मुश्किल घड़ी में परिवार उनका सबसे बड़ा सहारा बना। खासकर उनकी मां अर्चना पूरन सिंह ने बेटे का साथ नहीं छोड़ा। आर्यमन का मानना है कि डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्ति के लिए केवल समझाना काफी नहीं होता, बल्कि उसके साथ समय बिताना ज्यादा जरूरी है।
मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात हो- आर्यमन
धीरे-धीरे उन्होंने खुद को नए सिरे से संभालना शुरू किया। असफलता का डर जरूर उनके भीतर बैठ गया था, लेकिन उसी दौर में उन्हें संगीत की ओर रुझान महसूस हुआ। उन्होंने समझा कि अगर फुटबॉल का सपना अधूरा रह गया, तो जिंदगी यहीं खत्म नहीं होती। संगीत ने उन्हें नई दिशा दी और आत्मविश्वास लौटाया।
आज आर्यमन पहले से कहीं ज्यादा मजबूत महसूस करते हैं। उनका कहना है कि अब डिप्रेशन की स्थिति काफी हद तक नियंत्रित है और घबराहट के दौरे भी लगभग खत्म हो चुके हैं। वो अपने अनुभव को साझा कर ये संदेश देना चाहते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना जरूरी है।


