सीनियर जर्नलिस्ट और लेखक अरविंद मोहन की 2 किताबें लॉन्च हुई हैं। ये बुक्स बिहार की विशेषता और संस्कृति को बताने वाली हैं। इसमें एक बुक का नाम यह जो बिहार है और दूसरे का नाम हमार चंपारण है। यह जो बिहार है बिहार के स्वभाव, बुनियादी चरित्र, ताक़त और कमजोरियों को रेखांकित करती हुई किताब है। इसमें बिहार के लोगों, देश के अन्य लोगों को यह बताने का प्रयास किया जा रहा कि बिहार वास्तव में है क्या, क्यों किसी बिहारी को इस पर गर्व करना चाहिए। यह किताब इन सब बातों की चर्चा करते हुए उस बिहार पर भी विचार करती है जो आज है- विकास के लगभग सभी पैमानों पर एकदम आखिरी, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, परिवहन तंत्र और नागरिक सुविधाओं आदि के मामले में पिछड़ा, जहां से लाखों लोग हर साल मजदूरों के रूप में पलायन करते हैं। जहां के लोगों को लोग बिहारी कहकर जैसे नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन ने अलग-अलग समय पर दोनों किताबें लिखी हैं। यह किताब बिहार को एक नई समझ से देखने की वजहें उपलब्ध कराती है। हमर चंपारण जिले की विशेषता को दर्शाती है इसके अलावा ‘हमर चम्पारण’ इस जिले के जीवन, स्वभाव, इतिहास के कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ावों और इसकी आर्थिक सामाजिक स्थिति को दिखाता है। ‘कुछ अपनी’ और ‘कुछ पराई’ शीर्षक दो भागों में संयोजित इस किताब के पहले भाग में लेखक चम्पारण से अपनी भावनात्मक तारतम्यता को बनाए रखते हुए उसके ऐतिहासिक और भौगोलिक परिचय देते हैं। 2 भागों में कई मैसेज वहीं चम्पारण सत्याग्रह, ध्रुपद की परम्परा, वहां की चीनी मिलों और गन्ने की खेती आदि विभिन्न विषयों पर लिखे गए अपने शोधपरक आलेखों में चम्पारण का एक वृहत्तर चित्र पाठक के सामने रखते हैं। जिसमें गांधी, नील की खेती, निलहों का जुल्म और चम्पारण के लोगों का संघर्ष खासतौर पर दिखाई देता है। दूसरे भाग में कुछ ऐसे आलेख भी हैं, जो उन लोगों ने लिखे थे जिन्होंने बहुत गहराई से यहां के जीवन, आबोहवा और विडम्बना को देखा था। इनमें जॉन बीम्स, नगेन्द्रनाथ गुप्त, राजेन्द्र प्रसाद, पीर मुहम्मद मूनिस, शम्भुनाथ मिश्र और महात्मा गांधी के लेख उल्लेखनीय हैं। सीनियर जर्नलिस्ट और लेखक अरविंद मोहन की 2 किताबें लॉन्च हुई हैं। ये बुक्स बिहार की विशेषता और संस्कृति को बताने वाली हैं। इसमें एक बुक का नाम यह जो बिहार है और दूसरे का नाम हमार चंपारण है। यह जो बिहार है बिहार के स्वभाव, बुनियादी चरित्र, ताक़त और कमजोरियों को रेखांकित करती हुई किताब है। इसमें बिहार के लोगों, देश के अन्य लोगों को यह बताने का प्रयास किया जा रहा कि बिहार वास्तव में है क्या, क्यों किसी बिहारी को इस पर गर्व करना चाहिए। यह किताब इन सब बातों की चर्चा करते हुए उस बिहार पर भी विचार करती है जो आज है- विकास के लगभग सभी पैमानों पर एकदम आखिरी, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, परिवहन तंत्र और नागरिक सुविधाओं आदि के मामले में पिछड़ा, जहां से लाखों लोग हर साल मजदूरों के रूप में पलायन करते हैं। जहां के लोगों को लोग बिहारी कहकर जैसे नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन ने अलग-अलग समय पर दोनों किताबें लिखी हैं। यह किताब बिहार को एक नई समझ से देखने की वजहें उपलब्ध कराती है। हमर चंपारण जिले की विशेषता को दर्शाती है इसके अलावा ‘हमर चम्पारण’ इस जिले के जीवन, स्वभाव, इतिहास के कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ावों और इसकी आर्थिक सामाजिक स्थिति को दिखाता है। ‘कुछ अपनी’ और ‘कुछ पराई’ शीर्षक दो भागों में संयोजित इस किताब के पहले भाग में लेखक चम्पारण से अपनी भावनात्मक तारतम्यता को बनाए रखते हुए उसके ऐतिहासिक और भौगोलिक परिचय देते हैं। 2 भागों में कई मैसेज वहीं चम्पारण सत्याग्रह, ध्रुपद की परम्परा, वहां की चीनी मिलों और गन्ने की खेती आदि विभिन्न विषयों पर लिखे गए अपने शोधपरक आलेखों में चम्पारण का एक वृहत्तर चित्र पाठक के सामने रखते हैं। जिसमें गांधी, नील की खेती, निलहों का जुल्म और चम्पारण के लोगों का संघर्ष खासतौर पर दिखाई देता है। दूसरे भाग में कुछ ऐसे आलेख भी हैं, जो उन लोगों ने लिखे थे जिन्होंने बहुत गहराई से यहां के जीवन, आबोहवा और विडम्बना को देखा था। इनमें जॉन बीम्स, नगेन्द्रनाथ गुप्त, राजेन्द्र प्रसाद, पीर मुहम्मद मूनिस, शम्भुनाथ मिश्र और महात्मा गांधी के लेख उल्लेखनीय हैं।


