किन्नर स्किन थेरेपिस्ट माघ मेले में कर रहीं तपस्या:बोलीं- परिवार ने कभी समझा ही नहीं; सरकारी नियम भी पूरी तरह लागू नहीं

किन्नर स्किन थेरेपिस्ट माघ मेले में कर रहीं तपस्या:बोलीं- परिवार ने कभी समझा ही नहीं; सरकारी नियम भी पूरी तरह लागू नहीं

‘7-8 साल की थी तो शरीर में चेंज शुरू हुआ। लड़का थी, लेकिन मन लड़की जैसा था। सजने-संवरने में मन लगता। समाज ने ताने मारने शुरू किए। कॉलेज पहुंची तो किसके साथ बैठूं, कुछ समझ ही नहीं आया। घर में बात करती तो कोई समझने को तैयार ही नहीं था। फिर मैंने घर-समाज सब छोड़ दिया। किन्नर समूह के साथ आ गई। पढ़ाई पूरी की। अब अपने समाज के लिए आवाज उठाती हूं।’ यह कहना है प्रयागराज के माघ मेले में आई किन्नर प्रियांशी दास का। प्रियांशी स्किन थेरेपिस्ट हैं। इस वक्त माघ मेले में साधना कर रहींं, लोगों को आशीर्वाद दे रही हैं। बड़ी संख्या में लोग उनके पास आते हैं और सेल्फी लेते हैं। दैनिक भास्कर की टीम ने उनसे विस्तार से बात की। उनके अलावा कुछ और किन्नरों से बात की। सरकार की दी गई सुविधाओं और सहूलियत को समझा। जो कुछ बताया, उसे आइए जानते हैं… मैं बायोलॉजिकली लड़का, लेकिन अंदर से लड़की थी
प्रयागराज में इस वक्त माघ मेला चल रहा। सेक्टर-6 में किन्नर अखाड़े का शिविर है। यहां बाकी शिविर के मुकाबले श्रद्धालुओं के पहुंचने की संख्या ज्यादा होती है। लोग किन्नर महंतों से आशीर्वाद लेना चाहते हैं। इसी अखाड़े की पहली चौकी पर प्रियांशी दास बैठी हैं। लोग उनके पास आ रहे, आशीर्वाद और सेल्फी ले रहे हैं। प्रियांशी उन्हें चावल और एक रुपए का सिक्का आशीर्वाद के रूप में देती हैं। हमने प्रियांशी से उनके जीवन पर विस्तार से बात की। वह कहती हैं- मेरा जन्म ओडिशा में हुआ था। मैं किन्नर अखाड़ा में श्रीमहंत हूं। ट्रांसजेंडर राइट्स एक्टिविस्ट हूं। पेशे से स्किन थेरेपिस्ट हूं। ओडिशा और मुंबई में काम करती हूं। जब मैं 7-8 साल की थी, उस वक्त से मेरे अंदर बदलाव आने लगा था। समझ आने लगा कि मैं लड़का नहीं हूं। ऊपर से लड़का जैसा हूं, लेकिन अंदर से लड़की हूं। मेरा दिमाग भी खुद को लड़की ही मानता था। हमेशा लड़की की तरह तैयार होती, खाना बनाने में लगी रहती, यह सब अच्छा लगने लगा था। प्रियांशी कहती हैं- स्कूल तो जैसे-तैसे बीत गया। कॉलेज पहुंची तो दिक्कत होने लगी। कैसे चलूं, कैसे बैठूं, किसके साथ बैठूं, क्या करूं, हर चीज के बारे में बहुत सोचने लगी। उस वक्त कॉलेज में रैगिंग बहुत होती थी। मेरे साथ भी रैगिंग हुई। मैंने इन चीजों को लेकर अपने घर में बात की।

मैंने घर छोड़ा, किन्नर समाज ने अपना लिया
प्रियांशी आगे बताती हैं- जब मुझे कोई समझने को तैयार नहीं हुआ तो मैंने घर ही छोड़ दिया। वहीं किन्नरों के एक समूह के साथ हो गई। सभी ने मुझे अच्छे तरीके से अपनाया। फिर मेरी जो पढ़ाई बची थी, उसे हमने पूरा किया। इसके बाद मैं कॉस्मेटोलॉजिस्ट बन गई। स्किन थेरेपिस्ट का काम करने लगी। यह सब मैं मुंबई में करती थी। उस वक्त किन्नर समाज में एचआईवी एड्स की बीमारी बहुत हो रही थी। मैंने अपने समाज को जागरूक करने के लिए काम शुरू कर दिया। ट्रांसजेंडर वर्ग पढ़ाई में बहुत पीछे है, उसके साथ हमेशा भेदभाव होता रहता है। इसलिए हमने एक ऑर्गनाइजेशन बनाया। किन्नर वर्ग की पढ़ाई पर काम किया। उस वक्त तक हमारे समाज में पढ़े-लिखे लोग कम थे। कोई समझने को तैयार भी नहीं था। बहुत सारा संघर्ष करना पड़ा, कोई सपोर्ट करने वाला नहीं था। बावजूद इसके काम करते रहे और फिर फायदा मिला। सरकार ने हमारे लिए ऐलान किया, कई चीजें लागू नहीं कीं
15 अप्रैल, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने किन्नर वर्ग को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने आदेश दिया कि सरकार किन्नरों को स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा की सेवा मुहैया करवाए। ये समाज पिछड़ा हुआ है। इसे अब तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी जाती है। कोर्ट के इस आदेश के बाद किन्नर वर्ग में खुशी थी। क्योंकि इतने सालों बाद उन्हें उनकी पहचान मिली थी। याचिकाकर्ता किन्नर अखाड़े की प्रमुख लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी थीं। उनका कहना था कि मैं खुश हूं कि आज हमें महिला-पुरुष की तरह समान अधिकार दिया गया है। प्रियांशी भी कहती हैं- 2014 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चीजें बदलीं। समाज ने हम सबको स्वीकार किया। लेकिन सरकार ने जो बहुत सारी चीजें लागू की हैं, वह कहीं न कहीं पेपर पर ही हैं। आरक्षण का मामला है। सरकारी नौकरी का मामला है। हम चाहते हैं कि जो कुछ बोला गया है, उसे पूरा किया जाए। किन्नर समाज भी मुख्य धारा में आना चाहता है। बिहार में किन्नरों को आरक्षण, यूपी में भी मांग
हमने किन्नरों की स्थिति को लेकर सनातन किन्नर अखाड़ा की प्रमुख महामंडलेश्वर कौशल्या गिरी से बात की। वह कहती हैं- सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तो हम सबको मौलिक अधिकार मिल सका। लेकिन इसके बाद जो कुछ आदेश हुआ, उसमें कमी रह गई। बिहार में अभी पुलिस की भर्ती हुई। उसमें किन्नरों को मौका मिला और वो सिलेक्ट हुए, होमगार्ड में भी ऐसे ही हुआ। लेकिन, यूपी में ऐसा नहीं है। हमने समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण जी से बात की है। उन्होंने कहा है कि हम इस मामले पर विचार करेंगे। कौशल्या गिरी कहती हैं- किन्नर समाज सबसे ज्यादा पिछड़ा समाज है। कोर्ट के आदेश के बाद हमें ओबीसी में तो शामिल कर लिया गया, लेकिन यह तय नहीं किया गया कि ओबीसी कोटे के 27% आरक्षण में हम लोगों को कितना मिलेगा? हम तो बस यही कहते हैं कि 1 फीसदी ही दें, लेकिन तय कर दें। सड़क पर हमें सबसे ज्यादा कटाक्ष झेलना पड़ता है
हमने सनातन किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर संजना नंद गिरी से बात की। संजना महाराष्ट्र से हैं। वह पिछले 3 साल से कौशल्या गिरी के साथ रह रही हैं। कहती हैं- सरकार ने 2014 के आदेश के बाद हम सबके लिए सुविधाएं बढ़ाई हैं। हॉस्पिटल बनाया। बाथरूम में अब ट्रांसजेंडर के लिए अलग से व्यवस्था की। लेकिन, हमें वो आरक्षण चाहिए, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पारित किया है। 3 न सही 1 फीसदी ही दीजिए, क्योंकि अगर हमारे पास नौकरी होगी तो हम परेशान नहीं होंगे। संजना कहती हैं- आगे की पीढ़ी के पास पढ़ाई, नौकरी का विकल्प होगा तो वह सड़क पर नहीं उतरेगी। सड़क पर बहुत कटाक्ष झेलना पड़ता है। वह नौकरी के लिए पढ़ाई करेगी। कई राज्यों ने हमें मौका भी दिया है। बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड में हमारे लिए नियम बने हैं। तेलंगाना में तो पीएम आवास योजना के तहत हम सबको घर बनाकर दिया जा रहा। लेकिन, कई जगहों पर अभी भी काम होना बाकी है। ———————– ये खबर भी पढ़ें… माघ मेले में किन्नर योनि की पूजा क्यों कर रहे, अघोरी किन्नर बोले- मां कामाख्या से कनेक्शन महाकुंभ हो या अब प्रयागराज का माघ मेला, सबसे ज्यादा भीड़ किन्नर अखाड़ा में दिखती है। इस बार किन्नर अखाड़े को तीन जगहों पर कैंप मिला। तीनों में एक बड़ी समानता है। तीनों ही जगहों पर योनि (महिलाओं का प्राइवेट पार्ट) के आकार का हवन कुंड बनाया गया है। कुंड हमेशा प्रज्जवलित रहता है। श्रद्धालु आते हैं और हाथ जोड़कर नमन करते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। पढ़ें पूरी खबर

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