कानपुर में किडनी रैकेट में पुलिस ने 5 डॉक्टर और एक दलाल को गिरफ्तार कर जेल भेजा है। किडनी रैकेट की सरगना डॉक्टर प्रीति अहूजा इंडियन मेडिकल एसोसिएन की उपाध्यक्ष है। IMA का रसूख दिखा कर ये किडनी रैकेट चला रही थी। डॉक्टर प्रीति और उसके पति डॉक्टर सुरजीत अहूजा अपने और साथियों के साथ मिलकर के किडनी रैकेट चलाते थे। इस गैंग में काम करने वाले हर एक सदस्य का एक अलग काम और कमीशन फिक्स किया गया था। कानपुर में किडनी रैकेट का पर्दाफाश करते हुए पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल ने बताया- शहर में किडनी गैंग के द्वारा 50 से ज्यादा किडनी का ट्रांसप्लांट किया गया है। इस नेटवर्क के तार- कानपुर-लखनऊ के अलावा दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, नेपाल और साउथ अफ्रीका तक फैला हुआ है। इसके बाद दैनिक भास्कर ने अपनी पड़ताल शुरू की। पढिए पूरी रिपोर्ट हमारे सामने कुल 4 सवाल आए, इन सवालों के जवाब जानने के लिए हम कानपुर के कल्याणपुर पहुंचे। पहला- ये गैंग कैसे लोगों को टारगेट करता था? दूसरा- गैंग के सदस्यों को कितना कमीशन मिलता था? तीसरा- ये लोग कैसे किडनी के जरूरतमंद लोगों को ढूंढते थे? चौथा- आखिर इस रैकेट को चलाने के लिए इन्होंने कानपुर को क्यों चुना? कानपुर में किडनी गैंग की मार्केटिंग टीम के बारे में कानपुर का कल्याणपुर क्षेत्र मेडिकल सुविधाओं के लिए शहर का नामचीन स्थान है। पिछले दिनों कानपुर के स्वास्थ्य विभाग ने अभियान चलाते हुए 10 से ज्यादा अस्पतालों को बंद किया और नोटिस दिये थे। इन अस्पतालों में अवैध रूप से ICU चलते हुए मिले थे। यहां करीब 100 से ज्यादा अस्पताल संचालित हो रहे है। इन अस्पतालों में मरीज लाने के लिए आसपास के जिले- कन्नौज, फर्रुखाबाद, हरदोई, कानपुर देहात, फतेहपुर, औरैया, इटावा, हमीरपुर आदि जिलों में मार्केटिंग टीम की तरह काम करने वाले लड़के जाते है। जो मरीजों को लाने के एवज में अन्य जिलों के छोटे डॉक्टरों को कमीशन देते थे। यहीं से ये लोग अपने टारगेट को फिक्स करते थे। यहां से मरीजों को बड़ी बीमारी का डर दिखाकर कानपुर में लाते हैं। हेल्थ कैंप से भी टारगेट करते थे फिक्स डॉक्टर प्रीति अहूजा और डॉक्टर सुरजीत अहूजा, अपने अस्पताल में फ्री हेल्थ कैंप का आयोजन करते थे, बाहर से आए लोग IMA का अधिकारी और बड़े डॉक्टर समझ कर इनके कैंप मे आते थे, जहां से ये डॉक्टर भोले- भाले लोगों को अपना निशाना बनाते थे। इसके लिए बाकायदा एक टीम रखते थे। मरीजों को घर से लाने और लेजाने का काम एम्बुलेंस का होता है। जिसके लिए इन्होंने ने एक एम्बुलेंस ड्राइवर शिवम अग्रवाल उर्फ काना को रखा। समय के साथ- साथ काना इनके काम को बारीकी से समझ गया। उसके वह लोगों को टारगेट करने लगा। जब इन्होंने देखा- किडनी के रैकेट से पैसे की कमाई हो रही है, तो इन्होंने ने अपने नेटवर्क मे अन्य और अस्पतालों को शामिल कर लिया। जिसका जिक्र आज पुलिस ने अपने खुलासे में किया है। कल्याणपुर के ये अस्पताल आए सामने पुलिस ने मामला सामने आने के बाद मेड लाइफ हॉस्पिटल, आहूजा हॉस्पिटल और प्रिया हॉस्पिटल में एक साथ छापेमारी की थी।मेड लाइफ हॉस्पिटल में किडनी डोनर एमबीए छात्र और मरीज भी भर्ती मिला। मंगलवार को आहूजा हॉस्पिटल की मालकिन डॉ. प्रीति आहूजा, उनके पति डॉ. सुरजीत, डॉ राजेश कुमार, डॉ राम प्रकाश, डॉ नरेंद्र सिंह और दलाल शिवम अग्रवाल को अरेस्ट कर जेल भेज दिया था। अब समझिए किसको कितना कमीशन मिलता था किडनी रैकेट से जुड़ा शिवम अग्रवाल एंबूलेंस ड्राइवर जो किडनी गैंग का एक्टिव मेम्बर है। इसने शोसल मीडिया के जरिए छात्रों और बाहर रहने वाले दिहाड़ी मजदूरों को टारगेट करता था। जो छात्र अपने घर से दूर रह करके पढ़ाई करते थे। ये गैंग बाकायदा टेलीग्राम, व्हाट्सएप, फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और डार्कवेब पर पूरा नेटवर्क संचालित करते थे। MBA स्टूडेंट आयुष चौधरी को इस गैंग ने टेलीग्राम ग्रुप के जरिए लाइनअप किया था। आयुष इनके लिए एक सॉफ्ट टारगेट था। क्योंकि ये टारगेट बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला था। लेकिन उत्तराखंड के देहरादून में रह के पढ़ाई कर रहा था। इस गैंग ने आयुष को प्रेमानंद, अभिताभ बच्चन का उदाहरण देकर ब्रेन वॉश किया था। इसके लिए गैंग ने डोनर लाने के लिए अलग कमीशन फिक्स किया था। और डोनर को लाने- लेजाने और पूरे इलाज की जममेदारी के लिए अस्पतालों को अलग से कमीशन देता था। जिसका जिक्र पुलिस ने अपने खुलासे में किया था। कमीशन के पैसे के बटवारे में विवाद हुआ तो खुला पूरा रैकेट दलाल शिवम अग्रवाल ने 3.50 लाख रुपए आयुष के खाते में डाले थे। 2.75 लाख आहूजा हॉस्पिटल को दिए थे, वहीं 25 हजार रुपए मेड लाइफ हॉस्पिटल को ट्रीटमेंट के लिए और 50 हजार रुपए उसने अपने पास रखे थे। जब आयुष ने शिवम से बाकी ढाई लाख रुपए की रकम मांगी तो विवाद हो गया था। जिसके बाद सोमवार को आयुष ने फोन पर पुलिस को मामले की जानकारी दी थी। उसके कमीशन के खेल के चक्कर मे पूरा रैकेट एक्सपोज हो गया। अब समझिए कैसे फैला कानपुर से साउथ अफ्रीका तक किडनी रैकेट ये गैंग विभिन्न सोशल मीडिया मैसेंजर एप और डार्कवेब के द्वारा पूरा गैंग संचालित करता था। जिसके बाद स्थानीय गैंग के किडनी के इलाज के लिए बड़े- बड़े अस्पतालों के बाहर से परेशान मरीजों को टारगेट करते थे। चूंकि किडनी ट्रांसप्लांट के इलाज में बड़ा खर्च आता है। इस लिए इनके झांसे में बड़े लोग जल्दी फंस जाते थे। उसके बाद इस गैंग के लोग किडनी से पीड़ित मरीज से टोकन मनी लेने के बाद केस को दूसरे सदस्यों को सौपते थे। हालांकि पुलिस अभी इन गैंग के लोगों की तलाश कर रही है। इसी तरीके से ये गैंग कोलकाता, दिल्ली, बिहार और साउथ अफ्रीका तक चल रहा था। चूंकि कानपुर यूपी का बड़ा शहर है, यहां एयरपोर्ट और देश का बड़ा रेलवे स्टेशन मौजूद है। जिसकी वजह से किडनी डोनर और रिसीवर आसानी से पहुंच जाते थे। अब समझिए किडनी गैंग कानपुर से क्यों चला रहा था रैकेट कानपुर यूपी की फाइनेंशियल कैपिटल है, यहां से देश का सबसे बड़ा हाइवे आगरा- लखनऊ एक्सप्रेस वे भी गुजरता है, साथ ही प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 80 किमी की दूरी पर स्थित है। इससे टारगेट अंजाम तक आसानी से पहुंच जाते थे। शहर के साउथ और कल्याणपुर के अधिकतर अस्पतालों में ठेके पर इलाज होता है। यहां बाहर से आने- जाने वाले टारगेट को पहुचने में कोई दिक्कत नहीं होती है। वहीं यूपी का सबसे पिछड़ा इलाका पूर्वांचल और बिहार की सीधी कनेक्टिविटी है, इस इलाके से नेपाल की सीमा जुड़ी हुई है। इससे टारगेट आसानी से कानपुर पहुंच जाते हैं। इस बात का जिक्र पुलिस ने अपनी इंवेस्टिगेशन में करते हुए कहा- ये गैंग कानपुर-लखनऊ के अलावा दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, नेपाल और साउथ अफ्रीका तक फैला हुआ है। हमारी पड़ताल में कुल चार प्वाइंट सामने आए पहला इस गैंग के लोग अपने आप को बड़ा डॉक्टर और भौकाल दिखा के पढ़ने वाले स्टूडेंट और गरीब लोगों को बीमारी का डर दिखा के उनको टारगेट बनाते है दूसरा- चूंकि गैंग को सरगना डॉक्टर प्रीति आहूजा IMA में पदाधिकारी बता करके अपने गैंग को सर्कुलेट करती थी। जिसके इस रैकेट में अन्य अस्पताल साथ देते हैं तीसरा – किडनी डोनर से लेकर रिसीवर को पकड़ने के लिए इस गैंग में लोगों को अलग अलग काम सौंपा जाता था। इसी लिए एक केस के खुलासे में 6 लोग सामने आए। पुलिस सूत्रों की माने तो ये संख्या 12 से ज्यादा पहुंच सकती है। चौथा- कानपुर बड़ा शहर है, यहां बड़े पैमाने पर रजिस्टर्ड और अनरजिस्टर्ड अस्पताल संचालित है। इकोनॉमी की दृष्टि से बड़ा शहर है तो देश और विदेश से आने वाले किडनी रसीवर या डोनेटर को कोई परेशानी नहीं होती है। जब हमनें इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष अनुराग मेहरोत्रा से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनका फोन नहीं उठा।


