प्रकृति के नन्हे मेहमान
सार्थक शर्मा, 12 वर्ष
रवि और गुड़िया खेतों की हरियाली के बीच लेटे बादलों की कलाबाजियां देख रहे थे। तभी एक रंग-बिरंगी तितली वहां आ पहुंची। उसे देखकर रवि के मन में उसे पकड़ने की जिज्ञासा जागी, पर गुड़िया ने बड़ी आत्मीयता से रोका। रवि, इसे कैद मत करो, इसे उड़ते हुए देखना ही असली सुंदरता है। पास ही के गड्ढे में एक मेंढक ‘टर्र-टर्र’ कर रहा था। रवि ने उसे डराने के लिए कंकड़ उठाया, तो गुड़िया ने फिर टोकते हुए कहा कि यह भी इस प्रकृति का हिस्सा है। दोनों शांति से बैठकर तितली की उड़ान और मेंढक की छलांग का आनंद लेने लगे। रवि को अहसास हुआ कि असली खेल तो प्रकृति खेलती है और गुड़िया ने मुस्कुराकर जोड़ा, “और हम उसके मेहमान हैं।” उस शाम उन्होंने कुछ तोड़ा नहीं, बस प्रकृति को महसूस करना सीखा।
प्रकृति की गोद में सच्ची खुशी
भाविका शर्मा , उम्र 13 वर्ष
एक सुहानी सुबह रिया और उसका छोटा भाई रोहन पास के बगीचे की हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों के बीच खेलने पहुंचे। रिया घास पर बैठकर अपनी गुड़िया से खेल ही रही थी कि एक सुनहरी तितली उसके चारों ओर मंडराने लगी। वहीं, रोहन तालाब के किनारे एक मेंढक की लंबी छलांगों को बड़े कौतूहल से निहार रहा था। प्रकृति के इन नन्हे जीवों के साथ वक्त बिताते हुए दोनों भाई-बहनों को यह अहसास हुआ कि असली शांति और खुशी मोबाइल या टीवी के स्क्रीन में नहीं, बल्कि कुदरत में है। वे मुस्कुराते हुए सुनहरी यादें समेटकर घर लौटे। उन्होंने जान लिया था कि प्रकृति के साथ बिताया हर पल एक अनमोल उपहार है।
बगीचे के नन्हे साथी
अनीष्क अग्रवाल, उम्र 7वर्ष
सुनहरी धूप खिली थी, जब चिंटू और पिंकी बगीचे की मखमली घास पर खेलने निकले। चिंटू को जमीन पर लेटना पसंद था, वह पेट के बल लेटकर झाड़ियों के पास एक नन्हे मेंढक की ‘टर्र-टर्र’ को बड़े कौतूहल से सुनने लगा। उसे लगा मानो मेंढक उससे बातें कर रहा हो। दूसरी ओर, पिंकी अपनी गुड़िया के साथ खेल रही थी, तभी एक लाल तितली उसके करीब आ गई। पिंकी उंगली उठाकर उसे पास बुलाने लगी और उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगी। दोनों भाई-बहन अपने इन नन्हे दोस्तों के साथ इतने मगन थे कि शाम का पता ही नहीं चला। घर लौटते समय उन्होंने बड़े प्यार से मेंढक और तितली को ‘बाय-बाय’ कहा। वह दिन उनके लिए वाकई यादगार था।
प्रकृति की गोद में: राजू और पिंकी
भाग्यश्री सोनी, उम्र 10 साल
एक सुनहरी धूप वाले दिन, राजू और पिंकी गांव के पास एक शांत तालाब के किनारे खेल रहे थे। वहां एक नन्हे मेंढक को देख राजू चहक उठा, “देखो पिंकी, यह कितना प्यारा है!” वहीं घास पर बैठी पिंकी एक रंग-बिरंगी तितली को निहारते हुए मुस्कुराई, “हां भाई”, और यह तितली कितनी सुंदर है। काश हम भी इसके साथ उड़ पाते। दोनों बच्चे कुदरत के उस शांत आंगन में खोए हुए थे। राजू ने पानी में मछली की उछल-कूद देखी, तो पिंकी ने पेड़ों की सरसराहट का आनंद लिया। उन्हें गांव की यह एकांत और सुकून भरी जगह बहुत प्रिय थी, जहां वे अक्सर प्रकृति के इन नन्हे साथियों के बीच अपनी खुशियां ढूंढ लेते थे।
दो भाई-बहन: दो अलग दुनिया
सिद्धार्थ जोशी , उम्र 11 वर्ष
नन्हीं माया के लिए वह दिन जादुई था। उसकी खिलखिलाहट इतनी मधुर थी कि रंग-बिरंगी तितलियां उसके इर्द-गिर्द मंडराने लगीं। माया को लगा मानो उसके भी अदृश्य पंख निकल आए हों और वह किसी परीकथा का हिस्सा बन गई हो।वहीं उसका छोटा भाई आर्यन अपनी अलग ही दुनिया में मगन था। उसे आसमान की ऊंचाइयों से ज्यादा तालाब की गहराई में दिलचस्पी थी। ज़मीन पर लेटा आर्यन पत्थर पर बैठे उस नन्हे मेंढक को कौतूहल से निहार रहा था, जो उसे घूर रहा था। एक ही आंगन में दो अलग संसार बसे थे।एक तरफ माया की आसमान छूती उड़ान थी, तो दूसरी तरफ आर्यन की धरती से जुड़ी मासूम जिज्ञासा।
प्यारे भाई-बहन: दिव्या और दीपक
हनुश्री यादव, उम्र 9 वर्ष
तारानगर के सुंदर गांव में दो प्यारे भाई-बहन रहते थे। दिव्या और दीपक। दोनों को हरियाली और पशु-पक्षियों से बहुत लगाव था। उनकी एक अच्छी आदत थी कि वे हमेशा अपना स्कूल का काम समय पर पूरा करते और फिर खेलने जाते थे।हर शाम वे नदी किनारे घूमने निकलते। दिव्या अपनी सुंदर गुड़िया के साथ खेलती, तो दीपक नन्हे जीवों को देखकर खुश होता। उन्हें नदी का पानी और ठंडी हवा बहुत सुकून देती थी। सूरज ढलने से पहले वे हमेशा घर लौट आते थे। दोनों ने सीखा था कि प्रकृति हमारी सबसे अच्छी दोस्त है।
बगीचे की सैर: चिंटू और पिंकी
गौरांश शर्मा , उम्र 7 साल
एक सुहानी शाम चिंटू और पिंकी अपने माता-पिता के साथ बगीचे की सैर पर निकले। वहां रंग-बिरंगी तितलियों को देख पिंकी चहक उठी और उन्हें पकड़ने के लिए उनके पीछे दौड़ने लगी। तितलियां कभी फूल पर बैठतीं, तो कभी दूर उड़ जातीं। चिंटू उसे रोकने ही वाला था कि तभी उसकी नजर तालाब में फुदकते एक नन्हे मेंढक पर पड़ी। वह चुपचाप तालाब के किनारे बैठकर मेंढक की अठखेलियां देखने लगा। तितलियों के पीछे भागकर थकी पिंकी भी चिंटू के पास आ बैठी और मेंढक की लंबी छलांगें देख तालियां बजाने लगी। बच्चों की यह मासूम मस्ती देख माता-पिता का मन भी खुशी से भर गया।
पार्क के नन्हे अजूबे
रीमा मीना , उम्र 7 साल
धूप भरी सुहानी दोपहर में रिया और अमन पार्क की हरियाली के बीच खेलने निकले। जहां रिया एक सुनहरी तितली को पकड़ने की कोशिश में उसकी चपल उड़ान देख खिलखिला रही थी, वहीं अमन घास पर लेटा तालाब के किनारे बैठे एक शांत मेंढक को निहार रहा था। रिया भी दबे पांव अमन के पास आ बैठी। दोनों चुपचाप इस छोटे से जीव को देख ही रहे थे कि अचानक मेंढक ने पानी में छलांग लगा दी। पानी के छींटों ने दोनों बच्चों को भिगो दिया और वे जोर से हंस पड़े। उस दिन उन्होंने जाना कि प्रकृति के छोटे-छोटे जीव ही इस दुनिया को सुंदर और रोमांचक बनाते हैं।
बगीचे के सुंदर रंग
दिव्यम माहेश्वरी ,उम्र 11 वर्ष
पिंकी और चिंटू दो पक्के दोस्त थे, जो एक दिन बगीचे की सैर पर निकले। वहां रंग-बिरंगी तितलियों को उड़ते देख पिंकी की खुशी का ठिकाना न रहा और वह उन्हें पकड़ने के लिए उनके पीछे दौड़ने लगी। वहीं पास में पानी से भरा एक छोटा सा गड्ढा था, जिसके किनारे मखमली घास उगी थी। चिंटू बड़े मजे से घास पर लेट गया और गड्ढे में एक नन्हे मेंढक को लंबी छलांगें लगाते हुए देखने लगा। दोनों दोस्तों ने प्रकृति के इन छोटे-छोटे नजारों का खूब आनंद लिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “हमारा बगीचा वाकई कितना सुंदर है, जहाँ हर तरफ अद्भुत और प्यारी चीजें बसी हैं।
बगीचे की जादुई दुनिया
करण , उम्र 10 वर्ष
एक सुहावने दिन रिया और उसका भाई आर्यन घर के पास वाले खूबसूरत बगीचे में खेलने गए। रिया अपनी प्यारी गुड़िया को गोद में लिए सुनहरी तितलियों के पीछे चहक रही थी, जो उसके चारों ओर किसी परीकथा की तरह नाच रही थीं।वहीं, आर्यन तालाब के किनारे मखमली घास पर बैठ गया और कमल के पत्ते पर आराम करते एक नन्हे मेंढक को बड़े कौतूहल से निहारने लगा। पक्षियों की चहचहाहट और फूलों की खुशबू के बीच दोनों भाई-बहन प्रकृति की इस नन्हीं दुनिया में खो गए। सूरज ढलने से पहले, वे इस शांत और सुंदर दिन की ढेरों मीठी यादें समेटकर खुशी-खुशी घर लौट आए।
आज़ादी का आनंद: अमन और खुशी
आरती खन्ना, उम्र – 12 वर्ष
एक सुनहरी सुबह अमन और खुशी बगीचे की हरियाली के बीच खेल रहे थे। खुशी एक चपल पीली तितली के पीछे दौड़ रही थी, जो बार-बार उसके हाथों से फिसलकर फूलों पर जा बैठती। वहीं, अमन की नज़र तालाब किनारे बैठे एक नन्हे मेंढक पर पड़ी, जो अपनी ‘टर्र-टर्र’ से सबको लुभा रहा था। दोनों ने महसूस किया कि ये बेज़ुबान जीव अपनी आज़ादी में ही सुंदर लगते हैं। उन्होंने तय किया कि वे इन्हें परेशान नहीं करेंगे, बल्कि दूर से ही इनकी अठखेलियों का आनंद लेंगे। उस दिन उन्होंने एक अनमोल सबक सीखा—सच्ची खुशी दूसरों को कैद करने में नहीं, बल्कि उन्हें स्वतंत्र और खुश देखने में है।
प्रकृति के नन्हे मित्र
ध्रुव धौसरिया, उम्र 10 वर्ष
एक खिली हुई सुबह राहुल और उसकी छोटी बहन रिया पार्क की सैर पर निकले। जहां राहुल घास पर लेटकर तालाब किनारे बैठे एक हरे मेंढक की मज़ेदार ‘टर्र-टर्र’ और उसकी छलाँगों को कौतूहल से निहार रहा था, वहीं रिया अपनी गुड़िया के साथ शांत बैठी थी। तभी एक रंग-बिरंगी तितली उड़ती हुई आई और पल भर के लिए रिया की उंगली पर थिमि गई। रिया की खुशी का ठिकाना न रहा, उसे लगा मानो तितली उससे दोस्ती करने आई हो। जब तितली उड़ गई और मेंढक पानी में ओझल हो गया, तब दोनों भाई-बहनों ने जाना कि प्रकृति के ये नन्हे जीव हमें सच्ची खुशी देने आते हैं। उन्होंने सीखा कि जीवों को कैद करने के बजाय उन्हें प्यार से निहारना ही असली समझदारी है।
प्रकृति की जादुई दुनिया
मोहित सोनवानी , उम्र 10 वर्ष
एक खिली धूप वाली दोपहर मीनू और चिंटू बगीचे की सैर पर निकले। जहां मीनू अपनी गुड़िया के साथ घास पर बैठकर अपनी उंगली पर एक नन्ही तितली के उतरने का जादुई अनुभव कर रही थी, वहीं चिंटू पेट के बल लेटकर तालाब किनारे बैठे एक शांत मेंढक को निहार रहा था। वह अपनी सांसें थामे हुए था ताकि उसका नन्हा दोस्त डर न जाए। बिना किसी शोर-शराबे के, दोनों बच्चों ने प्रकृति की इस मौन मित्रता को महसूस किया। उन्होंने जाना कि अगर हम शांत रहें, तो कुदरत के ये जीव हमारे सबसे अच्छे मित्र बन सकते हैं। शाम को घर लौटते समय उनके पास कोई बड़ी कहानी तो नहीं थी, पर उनके मन में तितलियों की उड़ान और मेंढक की मासूमियत की अनमोल यादें हमेशा के लिए बस गईं।
पार्क के नए दोस्त: आनी और रोहन
अद्वैत जैन , 7 वर्ष
एक सुनहरी दोपहर आनी और रोहन पार्क में खेल रहे थे। आनी अपनी पसंदीदा गुलाबी गुड़िया को थामे हुए थी, तो रोहन घास पर लेटकर एक रंग-बिरंगी तितली की उड़ान निहार रहा था। तभी उनकी नज़र तालाब के किनारे बैठे एक पीले मेंढक पर पड़ी। मेंढक को फुदकता देख दोनों बच्चे खुशी से खिलखिला उठे। उन्होंने तालाब के पास तितलियों के साथ दौड़ लगाने और मेंढक की अठखेलियां देखने का फैसला किया। बच्चों की हंसी और शोर से पूरा पार्क गूंज उठा। प्रकृति के इन नन्हे साथियों के साथ खेलते हुए उनका दिन यादगार बन गया। घर लौटते समय उन्होंने वादा किया कि वे इन दोस्तों से मिलने दोबारा जरूर आएंगे।
असली खजाना
अनुकृति राजावत, उम्र 7 वर्ष
अमन अपनी पॉकेट मनी बचाकर संदूक में रखता था, जबकि उसका दोस्त रवि उसे फिजूलखर्ची में उड़ा देता था। एक बार अमन ने अपना संदूक बगीचे में छिपाया, जिसे रवि ने चोरी कर वहां आम का पौधा लगा दिया। रवि ने चालाकी से कहा कि यह ‘खजाने का पेड़’ है। मासूम अमन वर्षों इंतजार करता रहा। धीरे-धीरे वह पौधा विशाल पेड़ बन गया और रसीले आमों से लद गया।अमन ने आम बेचकर संदूक से भी अधिक धन कमाया, जबकि रवि ने चोरी के पैसे खा-पीकर खत्म कर दिए। मां ने समझाया कि असली धन ये पेड़ ही हैं, जो हमें फल और ऑक्सीजन देते हैं। रवि को अपनी गलती का एहसास हो गया।
आत्मविश्वास की जीत
काव्या सैनी , उम्र 9 वर्ष
दस वर्षीय दीपक को चित्रकारी का बहुत शौक था, लेकिन वह हमेशा अपनी कला को लेकर संशय में रहता था। एक दिन स्कूल में चित्रकला प्रतियोगिता हुई। दीपक हिचकिचा रहा था, तब उसकी मित्र ने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा, “कोशिश तो करो। साहस जुटाकर दीपक ने अपनी कल्पना से अपने गाँव के सुंदर दृश्य, उगते सूरज और हरे-भरे पेड़ों का चित्र उकेरा। उसकी सादगी और मेहनत देख शिक्षिका ने बहुत सराहना की और उसे पुरस्कार मिला। दीपक की खुशी का ठिकाना न रहा। उसे समझ आ गया कि सफलता का पहला कदम खुद पर भरोसा और निरंतर प्रयास है।
प्रकृति के नन्हे माली
विकास जाखड़ सालवा कला ,उम्र 11 वर्ष
एक सुहानी दोपहर विकास जाखड़ पार्क में एक नन्हे पौधे को निहार रहे थे। तभी उनकी बहन सुंदरी एक रंग-बिरंगी तितली को देख चहक उठी। जब सुंदरी ने उसे पकड़ना चाहा, तो उसे एहसास हुआ कि तितलियां हमारी दोस्त हैं और उन्हें स्वतंत्र रहना चाहिए। विकास ने समझाया कि अधिक पौधे लगाने से तितलियां स्वयं हमारे पास आएंगी।दोनों भाई-बहन ने मिलकर बगीचे की देखभाल की और नए बीज बोए। जल्द ही वहां फूलों की खुशबू और तितलियों का मेला लग गया। उन्होंने सीखा कि यदि हम प्रकृति को प्यार और देखभाल देंगे, तो बदले में वह हमें अनगिनत खुशियां लौटाएगी।
मैदान के नन्हे साथी
रिद्धिमा कुमावत, आयु-9
धूप भरी दोपहर में रिया और अमन मैदान की हरियाली के बीच खेलने निकले। रिया अपनी गुड़िया के साथ घास पर बैठी थी, तभी एक सुनहरी तितली उसके हाथ पर आ बैठी। रिया उसे देख मंद-मंद मुस्कुराने लगी। दूसरी ओर, अमन तालाब के किनारे लेटा एक हरे मेंढक को निहार रहा था। जैसे ही मेंढक ने पानी में छलांग लगाई, छींटों की बौछार देख अमन खिलखिला उठा। भाई-बहन देर तक तितलियों की उड़ान और मेंढक की अठखेलियाँ देखते रहे। ढलती शाम के साथ वे ढेर सारी खुशियां समेटकर घर लौटे और सबको अपने नन्हे दोस्तों के किस्से सुनाए।
नन्हा मेंढक, तितलियां और बच्चों की दुनिया
अनुष्री सिंह ठाकुर , उम्र 11 वर्ष
एक शांत गांव में सूरज की किरणों से चमकते तालाब के किनारे एक नन्हा मेंढक बैठा ‘टर्र-टर्र’ कर रहा था। तभी वहां एक लड़का आया और कौतूहल से उसे निहारने लगा। वहीं पास में एक लड़की अपनी गुड़िया के साथ खेल रही थी, जिसके चारों ओर रंग-बिरंगी तितलियां मंडराने लगीं। उसने तितलियों के पीछे दौड़ तो लगाई, पर उन्हें चोट नहीं पहुंचाई।जैसे ही लड़का मुस्कुराया, मेंढक ने तालाब के पानी में छलांग लगा दी और सुंदर लहरें बन गईं। दोनों बच्चों ने महसूस किया कि सच्ची खुशी प्रकृति के इन छोटे-छोटे और अद्भुत पलों को प्रेम से देखने में ही छिपी है
सुंदर बगीचा
ओजस्वी सिसोदिया , उम्र 10 वर्ष
एक दिन राधा अपनी गुड़िया के साथ खेल रही थी, तभी श्याम ने आकर उसे एक सुंदर बगीचे की सैर का प्रस्ताव दिया। राधा ने अनुशासन का परिचय देते हुए पहले अपनी माँ से अनुमति ली। माँ ने मुस्कुराकर उन्हें सावधानी से जाने को कहा। बगीचे में पहुँचते ही प्रकृति की सुंदरता देख दोनों के चेहरे खिल उठे। जहां राधा फूलों और नज़ारों पर मुग्ध थी, वहीं श्याम का ध्यान तालाब के किनारे बैठे एक मासूम मेंढक ने खींच लिया। दोनों ने उस जादुई माहौल में जी भरकर खेल का आनंद लिया। वह दिन उनकी दोस्ती और प्रकृति के प्रति प्रेम के कारण हमेशा के लिए खास बन गया।
प्रकृति की सैर
विधि सिन्हा, उम्र 9 वर्ष
एक दिन राजू और रिया स्कूल से घर लौटे। माता-पिता काम पर बाहर थे, इसलिए दोनों बोर होकर मोबाइल पर गेम खेलने लगे। कुछ देर बाद राजू ने महसूस किया कि गेम में अब वो मज़ा नहीं रहा। उसने रिया से बाहर बगीचे में टहलने का सुझाव दिया। बगीचे में कदम रखते ही उनका मन खिल उठा। रिया ने वहां रंग-बिरंगी तितलियां देखीं, जिनमें से एक सुंदर लाल-नारंगी तितली उसकी उंगली पर आ बैठी। वहीं, राजू को तालाब में कमल के पत्ते पर बैठा एक नन्हा मेंढक दिखा। प्रकृति के इन नज़ारों ने उनका दिल जीत लिया। दोनों ने तय किया कि अब वे मोबाइल छोड़कर रोज़ प्रकृति के साथ समय बिताएंगे।
प्रकृति की छोटी खुशियां
अदम्य चतुर्वेदी , उम्र: 7 वर्ष
एक दिन मैं अपनी छोटी बहन के साथ तालाब किनारे खेलने गया। पानी इतना साफ़ था कि तैरती मछलियां स्पष्ट दिख रही थीं। कौतूहलवश मैंने एक पत्थर तालाब में फेंका, जिससे मछलियां डरकर इधर-उधर भागने लगीं। मेरी बहन ने मुझे टोका कि उन्हें डर लग रहा है। तभी एक मेंढक बाहर आया और हमें देखने लगा; उसकी आंखों में मुझे उदासी महसूस हुई। मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ कि किसी के घर (प्रकृति) में पत्थर फेंकना गलत है। मैंने तुरंत माफी मांगी और प्रायश्चित के रूप में तालाब के पास फैला कचरा साफ कर दिया। घर लौटते समय मुझे असीम शांति महसूस हुई। मैंने सीखा कि हमें मूक प्राणियों और प्रकृति का सम्मान करना चाहिए।


