‘होली खेलें रघुवीरा अवध में, होली खेलें रघुवीरा…’ जब ढोलक की थाप पर मंजीरे की झंकार गूंजती है। हारमोनियम की सुरीली तान के साथ ‘जोगीरा सारा र रा’ का शोर उठता है, तो समझ लीजिए कि फागुन सिर्फ कैलेंडर में नहीं, बल्कि रगों में उतर आया है। आधुनिकता की दौड़ में जहां आज गांवों की गलियां डीजे के फूहड़ शोर और द्विअर्थी गानों से अटी पड़ी हैं, वहीं बेगूसराय के ग्रामीण क्षेत्रों में मिसाल पेश हो रही है। यहां की फिजाओं में आज भी वही पारंपरिक मिठास घुली है, जो हमारे पूर्वजों की विरासत थी। इसमें सबसे खास है मटिहानी गांव। आमतौर पर लोग होली वाले दिन रंग खेलते हैं, लेकिन बेगूसराय के मटिहानी गांव में परंपरा की जड़ें बहुत गहरी हैं। यहां महाशिवरात्रि की रात से ही होली के गायन की शुरुआत हो जाती है। दिन भर के कामकाज से फुर्सत पाकर ग्रामीण रात 8 बजे काली मंदिर परिसर में जमा होते हैं। कार्यक्रम की शुरुआत भगवती वंदना से होती है, जो सात्विकता और श्रद्धा का प्रतीक है। इसके बाद रात 12 बजे तक गांव की गलियों में घूम-घूम कर होली, चैता और जोगीरा का गायन चलता है। आजकल की पीढ़ी जहां ब्लूटूथ स्पीकर खोजती है, वहीं मटिहानी के बुजुर्ग और युवा आज भी इन वाद्य यंत्रों पर भरोसा करते हैं। लोग ढोलक की थाप पर थिरकने को मजबूर हो जाते हैं। बजता झाल और मंजीरा संगीत में खनक पैदा करते हैं। डीजे और अश्लीलता के बीच संघर्ष करती संस्कृति एक समय था जब बसंत पंचमी के बाद से ही हर गांव की चौपाल पर फगुआ के सुर सजने लगते थे। बुजुर्गों की टोली जब चैता गाती थी, तो पूरा इलाका झूम उठता था। लेकिन बीते एक दशक में डिजिटल क्रांति ने लोक संस्कृति पर करारा प्रहार किया है। डीजे के शोर ने जोगीरा की बोली को खामोश कर दिया है। मोबाइल पर बजने वाले द्विअर्थी गीतों ने उस पारंपरिक मर्यादा को चोट पहुंचाई है, जिसमें देवर-भाभी और जीजा-साली के हंसी-मजाक में भी एक संस्कार होता था। रामायण से गुजरता है गायन का रास्ता मटिहानी गांव के रहने वाले सहदेव पंडित और कारी राय जैसे कलाकार इस परंपरा के ध्वजवाहक बने हुए हैं। सहदेव पंडित बताते हैं कि उनके यहां की होली महज हुड़दंग नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है। यहां होने वाला चौपड्डा होली गायन रामायण के प्रसंगों से होकर गुजरता है। इसमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम और माता सीता की होली के वर्णन के जरिए हमलोग लोक जीवन को जोड़ देते हैं। राग, मल्हार से लेकर बारहमासा तक गाकर समृद्ध विरासत को जीवित रखे हुए हैं। सामाजिक समरसता का संदेश होली गायन का सबसे खूबसूरत पहलू है सामाजिक विद्वेष को मिटाना। डेढ़-दो घंटे मंदिर पर गाने के बाद लोग आपसी मनमुटाव भुलाकर एक-दूसरे के दरवाजे पर पहुंचते हैं। जब टोली किसी के घर पहुंचती है, तो घर का मालिक बाहर आता है। हमलोग गाते हैं सदा आनंदा रहे यही द्वारे, मोहन खेले होली हो। यह आशीर्वाद आपसी भाईचारे की वो डोर है जो सालों तक रिश्तों को बांधे रखती है। हम सब नई पीढ़ी को विरासत सौंपने की कोशिश लगातार कर रहे हैं। गांव के युवाओं में भी इस परंपरा को लेकर खासा उत्साह है। बुजुर्गों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युवा भी ढोलक लटकाए नजर आते हैं। सभी का मानना है कि अगर आज उन्होंने अपनी संस्कृति को नहीं बचाया तो आने वाली पीढ़ी जोगीरा और फाग जैसे शब्दों से अनजान हो जाएगी। जीवंत सभ्यता का आईना ये त्योहार ही है। तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, लेकिन जो मिठास मिट्टी की सोंधी महक और ढोलक की थाप में है, वह किसी कृत्रिम म्यूजिक सिस्टम में नहीं मिल सकती। ‘होली खेलें रघुवीरा अवध में, होली खेलें रघुवीरा…’ जब ढोलक की थाप पर मंजीरे की झंकार गूंजती है। हारमोनियम की सुरीली तान के साथ ‘जोगीरा सारा र रा’ का शोर उठता है, तो समझ लीजिए कि फागुन सिर्फ कैलेंडर में नहीं, बल्कि रगों में उतर आया है। आधुनिकता की दौड़ में जहां आज गांवों की गलियां डीजे के फूहड़ शोर और द्विअर्थी गानों से अटी पड़ी हैं, वहीं बेगूसराय के ग्रामीण क्षेत्रों में मिसाल पेश हो रही है। यहां की फिजाओं में आज भी वही पारंपरिक मिठास घुली है, जो हमारे पूर्वजों की विरासत थी। इसमें सबसे खास है मटिहानी गांव। आमतौर पर लोग होली वाले दिन रंग खेलते हैं, लेकिन बेगूसराय के मटिहानी गांव में परंपरा की जड़ें बहुत गहरी हैं। यहां महाशिवरात्रि की रात से ही होली के गायन की शुरुआत हो जाती है। दिन भर के कामकाज से फुर्सत पाकर ग्रामीण रात 8 बजे काली मंदिर परिसर में जमा होते हैं। कार्यक्रम की शुरुआत भगवती वंदना से होती है, जो सात्विकता और श्रद्धा का प्रतीक है। इसके बाद रात 12 बजे तक गांव की गलियों में घूम-घूम कर होली, चैता और जोगीरा का गायन चलता है। आजकल की पीढ़ी जहां ब्लूटूथ स्पीकर खोजती है, वहीं मटिहानी के बुजुर्ग और युवा आज भी इन वाद्य यंत्रों पर भरोसा करते हैं। लोग ढोलक की थाप पर थिरकने को मजबूर हो जाते हैं। बजता झाल और मंजीरा संगीत में खनक पैदा करते हैं। डीजे और अश्लीलता के बीच संघर्ष करती संस्कृति एक समय था जब बसंत पंचमी के बाद से ही हर गांव की चौपाल पर फगुआ के सुर सजने लगते थे। बुजुर्गों की टोली जब चैता गाती थी, तो पूरा इलाका झूम उठता था। लेकिन बीते एक दशक में डिजिटल क्रांति ने लोक संस्कृति पर करारा प्रहार किया है। डीजे के शोर ने जोगीरा की बोली को खामोश कर दिया है। मोबाइल पर बजने वाले द्विअर्थी गीतों ने उस पारंपरिक मर्यादा को चोट पहुंचाई है, जिसमें देवर-भाभी और जीजा-साली के हंसी-मजाक में भी एक संस्कार होता था। रामायण से गुजरता है गायन का रास्ता मटिहानी गांव के रहने वाले सहदेव पंडित और कारी राय जैसे कलाकार इस परंपरा के ध्वजवाहक बने हुए हैं। सहदेव पंडित बताते हैं कि उनके यहां की होली महज हुड़दंग नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है। यहां होने वाला चौपड्डा होली गायन रामायण के प्रसंगों से होकर गुजरता है। इसमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम और माता सीता की होली के वर्णन के जरिए हमलोग लोक जीवन को जोड़ देते हैं। राग, मल्हार से लेकर बारहमासा तक गाकर समृद्ध विरासत को जीवित रखे हुए हैं। सामाजिक समरसता का संदेश होली गायन का सबसे खूबसूरत पहलू है सामाजिक विद्वेष को मिटाना। डेढ़-दो घंटे मंदिर पर गाने के बाद लोग आपसी मनमुटाव भुलाकर एक-दूसरे के दरवाजे पर पहुंचते हैं। जब टोली किसी के घर पहुंचती है, तो घर का मालिक बाहर आता है। हमलोग गाते हैं सदा आनंदा रहे यही द्वारे, मोहन खेले होली हो। यह आशीर्वाद आपसी भाईचारे की वो डोर है जो सालों तक रिश्तों को बांधे रखती है। हम सब नई पीढ़ी को विरासत सौंपने की कोशिश लगातार कर रहे हैं। गांव के युवाओं में भी इस परंपरा को लेकर खासा उत्साह है। बुजुर्गों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युवा भी ढोलक लटकाए नजर आते हैं। सभी का मानना है कि अगर आज उन्होंने अपनी संस्कृति को नहीं बचाया तो आने वाली पीढ़ी जोगीरा और फाग जैसे शब्दों से अनजान हो जाएगी। जीवंत सभ्यता का आईना ये त्योहार ही है। तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, लेकिन जो मिठास मिट्टी की सोंधी महक और ढोलक की थाप में है, वह किसी कृत्रिम म्यूजिक सिस्टम में नहीं मिल सकती।


