उदयपुर में सिंधी समाज ने चेटीचंड महोत्सव (भगवान झूलेलाल जयंती) पहली बार वर्ष 1954 में मनाया था। 79 वर्षों बाद भी यह परंपरा न केवल जीवित है, बल्कि और अधिक भव्यता के साथ आगे बढ़ रही है। इस बार शुक्रवार को चेटीचंड महोत्सव पर शहर में भव्य शोभायात्रा, महाआरती, रक्तदान शिविर और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। लेकिन इस उत्सव के पीछे एक ऐसी प्रेरक गाथा छिपी है, जो संघर्ष, एकता और सतत प्रगति की मिसाल है। भारत-पाक बंटवारे के समय बिखरे सिंधी समाज ने मेवाड़ की धरती पर खुद को इस तरह संगठित किया कि आज यह समाज सेवा, संस्कार और समृद्धि का प्रतीक बन चुका है। करीब आठ दशकों पहले अस्थायी शिविरों से शुरू हुआ यह सफर आज सामाजिक, प्रशासनिक और आर्थिक सशक्तता तक पहुंच चुका है। सिंधी समाज की सामाजिक संरचना प्रमुख पंचायतों और मोहल्ला पंचायतों में व्यवस्थित है, जो लगातार परिवारों को एक सूत्र में बांधे रखने का कार्य कर रही हैं। झूलेलाल सेवा समिति सहित जेकबआबाद, साहिती, बिलोचिस्तान, खानपुर और शिकारपुर जैसी पंचायतें वर्षों से सिंधी परिवारों को जोड़ने का दायित्व निभा रही हैं। इन पंचायतों के नाम सिंध की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं की याद दिलाते हैं, वहीं समाज के हर व्यक्ति को एकता के सूत्र में बंधे रहने की प्रेरणा भी देते हैं। समाज की 9 प्रमुख पंचायतें और विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय 10 मोहल्ला पंचायतें शहर के कोने-कोने में बसे सिंधी परिवारों तक पहुंचकर उन्हें भाषा, संस्कार और संस्कृति से जोड़े रखने के साथ आर्थिक और सामाजिक सहयोग के लिए 24 घंटे तत्पर रहती हैं। सिंधी समाज ने न केवल अपनी पहचान को सुरक्षित रखा है, बल्कि उसे नई पीढ़ी तक भी मजबूती से पहुंचाया है। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक आपस में सिंधी भाषा में संवाद करते हैं। उनका मानना है कि यही भाषा उन्हें अपनी जड़ों से जोड़े रखती है। विस्थापन से लेकर पुनर्निर्माण तक की कहानी उन्हीं की जुबानी… झूलेलाल सेवा समिति अध्यक्ष प्रताप राय चुग, सिंधी पंचायत अध्यक्ष हरीश राजानी व महासचिव राजेश चुग बताते हैं कि 1947 का भारत-पाक विभाजन इंसानी जिंदगियों के बिखरने की त्रासदी भी था। सिंध की समृद्ध धरती पर बसे सिंधी समाज के हजारों परिवार एक झटके में जड़ों से उखड़ गए। घर, व्यापार, पहचान सब कुछ पीछे छूट गया। संघर्ष के इस सफर में हर परिवार एक बिखरा हुआ “मोती” बन चुका था। इन्हीं बिखरे मोतियों को एक नई डोर मेवाड़ की धरती पर मिली। महाराणा भूपाल सिंह ने विस्थापित परिवारों को उदयपुर में शरण दी। अस्थायी शिविरों से शुरू हुई यह कहानी धीरे-धीरे बसावट में बदली, फिर संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक का सफर तय हुआ। जिन हाथों में कभी उजड़ने का दर्द था, उन्हीं हाथों ने मेहनत और हुनर से नई दुनिया गढ़ी। वक्त के साथ यही बिखरे हुए मोती एक सशक्त “माला” में पिरोते चले गए। छोटे कारोबार से शुरू हुई पहल ने शहर की आर्थिक धड़कन को नई गति दी और सिंधी समाज ने उदयपुर की पहचान में खुद को गहराई से जोड़ लिया। यह कहानी केवल विस्थापन की नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण, जिजीविषा और सामूहिक शक्ति की है, जहां टूटकर बिखरने वाला समाज, मेवाड़ की महान माटी में फिर से संवरकर एक नई चमक के साथ उभर चुका है। आज सिंधी समाज राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक रूप में भी सशक्त होकर सर्व समाज की सेवा कर रहा है। प्रमुख-मोहल्ला पंचायतों के ये प्रतिनिधि संभाल रहे समाज की कमान झूलेलाल सिंधी सेंट्रल पंचायत, झूलेलाल सेवा समिति अध्यक्ष प्रताप राय चुग व महासचिव कैलाश नेभनानी, पूज्य सिंधी पंचायत (जेकबआबाद सिंधी पंचायत) अध्यक्ष हरीश राजानी व महासचिव राजेश चुग, पूज्य सिंधी साहिती पंचायत अध्यक्ष ओम प्रकाश आहूजा, पूज्य बिलोचिस्तान पंचायत अध्यक्ष नानकराम कस्तूरी, पूज्य खानपुर सिंधी पंचायत अध्यक्ष किशन वाधवानी, पूज्य शिकारपुर सिंधी पंचायत अध्यक्ष सुखराम बालचंदानी, पूज्य सिंधी पंचायत हिरण मगरी सेक्टर 3 से 8 अध्यक्ष मुरली राजानी, पूज्य सिंधी पंचायत प्रतापनगर सोसाइटी अध्यक्ष उमेश मनवानी, पूज्य सिंधी पंचायत कैलाश कॉलोनी अध्यक्ष जीतेन्द्र खत्री, पूज्य सिंधी पंचायत कमलानगर अध्यक्ष डॉ. मनोहर लाल कालरा, पूज्य सिंधी पंचायत माछला मगरा अध्यक्ष अशोक ड्राबला, पूज्य सिंधी पंचायत जवाहर नगर अध्यक्ष उमेश नारा, पूज्य सिंधी पंचायत हिरणमगरी सेक्टर 11 से 13 अध्यक्ष अशोक गेरा, पूज्य सिंधी पंचायत गोवर्धन विलास अध्यक्ष हरीश गोलानी, पूज्य सिंधी पंचायत सवीना सेक्टर 9 अध्यक्ष प्रकाश रूपचंदानी, पूज्य सिंधी पंचायत टेकरी अध्यक्ष वासुदेव आहूजा, श्री धर्मशाला एसोसिएशन अध्यक्ष किशोर सिधवानी, श्री सिंधी सेंट्रल सेवा समिति अध्यक्ष विजय, हरीश सिधवानी, गिरीश राजानी, भारत खत्री, दीपेश हेमनानी आहूजा आदि पदाधिकारी समाज के सर्वांगीण विकास में भूमिका निभा रहे हैं।


