डिंडौरी में आदिवासी समाज का जवारे विसर्जन जुलूस निकला:भक्तों ने बूढ़ी माई की पूजा की, फड़ापेन ठाना से नर्मदा नदी तक लगे जयकारे

डिंडौरी में आदिवासी समाज का जवारे विसर्जन जुलूस निकला:भक्तों ने बूढ़ी माई की पूजा की, फड़ापेन ठाना से नर्मदा नदी तक लगे जयकारे

डिंडौरी में चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर रविवार को आदिवासी समाज ने पारंपरिक तरीके से जवारा विसर्जन का कार्यक्रम किया। नौ दिनों तक ‘बूढ़ी माई’ की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने के बाद यह धार्मिक अनुष्ठान पूरा हुआ। फड़ापेन ठाना से नर्मदा नदी तक निकाले गए इस जुलूस में बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष और बच्चे शामिल हुए। पूरा माहौल देवी की भक्ति में डूबा नजर आया। जुलूस के सबसे आगे खप्पर में अग्नि लेकर माता की प्रतीकात्मक अगुवाई की जा रही थी, जिसके दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। ढोल-नगाड़ों की थाप और माता के जयकारों से पूरा रास्ता गूंज उठा। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस बल भी तैनात रहा। नौ दिनों की साधना और विसर्जन समाज के वरिष्ठ सदस्य धरम सिंह मसराम ने बताया कि इस साल चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 21 मार्च को बूढ़ी माई के नाम से जवारे बोकर की गई थी। इन नौ दिनों तक लगातार पूजा-पाठ, भजन और भंडारे का दौर चला। रविवार को पूरे विधि-विधान और परंपरा के साथ जवारों का विसर्जन किया गया। प्रकृति और खेती से जुड़ी परंपरा धरम सिंह मसराम ने जवारा बोने के पीछे का महत्व समझाते हुए कहा कि यह परंपरा पूरी तरह प्रकृति से जुड़ी है। चैत्र के महीने में जब पेड़ों पर नई पत्तियां आती हैं और प्रकृति में नयापन दिखता है, तभी जवारे बोए जाते हैं। यह आदिवासी समाज का प्रकृति के प्रति प्रेम और खेती-किसानी से उनके गहरे जुड़ाव को दिखाता है। इन जवारों को देखकर आने वाली फसल के अच्छे होने के संकेत भी समझे जाते हैं।

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