मौत के बाद जारी होगा जैकी चैन का गीत:स्कूल में 20 घंटों की कठोर ट्रेनिंग, 30 से ज्यादा चोटें झेलीं, 10 साल हॉलीवुड ने ठुकराया, ​फिर मिली कामयाबी

71 साल के मशहूर अभिनेता और मार्शल आर्ट आइकन जैकी चैन ने हाल ही में अपने फैंस को चौंका दिया। उन्होंने एक खास गीत रिकॉर्ड किया, जिसे वे अपनी मौत के बाद रिलीज करना चाहते हैं, ‘एक अंतिम संदेश। मंच पर यह बताते हुए उनकी आवाज भर्राई तो दुनिया को लगा जैसे जैकी अपनी जिंदगी की किताब का आखिरी पन्ना खुद लिख रहे हों। लेकिन हर महान अंत से पहले एक तूफानी कहानी होती है और जैकी की कहानी तो खुद एक पूरी फिल्म है। 1954 में हॉन्गकॉन्ग में जन्मे जैकी का बचपन आसान नहीं था। 1961 में उन्हें चीनी ओपेरा रिसर्च इंस्टीट्यूट भेज दिया गया, जहां 20 घंटे की क्रूर ट्रेनिंग, अनुशासनात्मक दंड, लगातार परफॉर्मेंस उनके रोज का हिस्सा बन गए। अपनी पहली आत्मकथा ‘माई लाइफ इन एक्शन’ (1998) में उन्होंने लिखा, ‘वहां आंसू भी अनुमति लेकर गिरते थे।’ यही कठोरता उन्हें ऐसा शरीर दे गई, जिसने आगे चलकर एक्शन सिनेमा की परिभाषा बदल दी, लेकिन उसकी कीमत भारी थी। 70-80 के दशक में उन्होंने स्टंट खुद किए। हर बार मौत को करीब से देखा। 30 से ज्यादा गंभीर चोटें झेलीं। 1986 में फिल्म ‘आर्मर ऑफ गॉड’ की शूटिंग के दौरान सिर की गहरी चोट ने उन्हें लगभग जीवन से दूर खींच लिया। बाद में जैकी ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘उस दिन लगा कि दूसरा मौका मिला है और मुझे उसे बर्बाद नहीं करना।’ पर सफलता सीधी राह नहीं थी। 1980-90 के बीच लगभग दस साल हॉलीवुड ने उन्हें ठुकराया। ‘तुम दिखते अलग हो, बोलते अलग हो’ यह सुनते हुए भी उन्होंने धैर्य नहीं छोड़ा। आखिरकार 1998 में आई ‘रश ऑवर’ ने पूरी दुनिया में उनका जादू चला दिया। जिंदगी के सबसे बड़े राज सबसे करीबी लोग थे जिंदगी ने एक और मोड़ 2003 में दिखाया, जब जैकी के पिता चार्ल्स चैन ने खुलासा किया कि वे सीआईए से जुड़े एजेंट रहे थे और उनकी मां ओपियम तस्करी में पकड़ी जा चुकी थीं। इस बारे में जैकी ने दूसरी आत्मकथा ‘नेवर ग्रो अप’ (2015) में लिखा, ‘मेरी जिंदगी के सबसे बड़े राज मेरे करीब के लोग थे।’ व्यक्तिगत मोर्चे पर भी वे खुद को निर्दोष नहीं बताते। लिखते हैं, ‘बेटे जेसी के लिए अच्छा पिता नहीं था। मैं दुनिया को हंसाता रहा, अपना घर रुलाता रहा।’ आज उनका अंतिम गीत चर्चा में है, लेकिन जैकी वही बात दोहराते हैं, ‘आखिरी होने का डर मत रखो…, अधूरा रह जाने का रखो।’

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