रोहतासगढ़ में अंतरराष्ट्रीय कुड़ुखर कोहा बैंजा महोत्सव संपन्न:भारत-नेपाल के आदिवासी समाज ने पूर्वजों की धरती को किया नमन, किले के संरक्षण और जीर्णोद्धार की मांग

रोहतासगढ़ में अंतरराष्ट्रीय कुड़ुखर कोहा बैंजा महोत्सव संपन्न:भारत-नेपाल के आदिवासी समाज ने पूर्वजों की धरती को किया नमन, किले के संरक्षण और जीर्णोद्धार की मांग

रोहतास प्रखंड क्षेत्र के कैमूर पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक रोहतासगढ़ किला परिसर एवं नागाटोली में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुड़ुखर कोहा बैंजा महोत्सव का समापन हुआ। इस महोत्सव में भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ नेपाल से आए आदिवासी समाज के लोगों ने भाग लिया और अपने पूर्वजों की धरती को नमन किया। दो दिवसीय इस कार्यक्रम में बिहार सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमा खान और चेनारी विधायक मुरारी प्रसाद गौतम भी शामिल हुए। आयोजन समिति की ओर से मुख्य अतिथियों को अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया। इसके बाद वक्ताओं ने अपनी स्मृतियां साझा कीं। महोत्सव के दौरान आदिवासी समाज के लोगों ने रोहतासगढ़ किला परिसर में स्थित कर्म के पवित्र पेड़ (चार धाम) की विधिवत पूजा-अर्चना की। उन्होंने पारंपरिक मानर थाप पर अपने पूर्वजों को याद किया। नेपाल से आईं प्रमिला देवी, झारखंड की इतवारी उरांव, ओडिशा के दिनेश उरांव, महेश उरांव और ललिता देवी सहित अन्य प्रतिभागियों ने बताया कि उन्होंने अपने पूर्वजों से रोहतासगढ़ किले की अनेक कहानियां सुनी थीं, लेकिन आज स्वयं दर्शन कर वे अभिभूत हुए। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि सरकार की उदासीनता के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर अपना अस्तित्व खोती जा रही है। उन्होंने सरकार से रोहतासगढ़ किले के संरक्षण एवं जीर्णोद्धार की मांग की। उरांव जनजाति की लोककथाओं और पारंपरिक गीतों में रोहतासगढ़ का विशेष स्थान रहा है। एक पारंपरिक गीत के अनुसार, सरहुल पर्व के अवसर पर जब उरांव पुरुष मद्यपान में मदहोश थे, उसी दौरान खरवार राजा ने लूंउनी नामक ग्वालन दासी की सहायता से आक्रमण कर रोहतासगढ़ किले और उसके आसपास के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। इस पराजय के बाद उरांव राजा सहित पूरा समुदाय रोहतासगढ़ छोड़कर छोटानागपुर (वर्तमान झारखंड) चला गया। कालांतर में वे छत्तीसगढ़ सहित देश के अन्य हिस्सों में बस गए, लेकिन रोहतासगढ़ की स्मृतियां आज भी उनके मन-मस्तिष्क में जीवित हैं। इस अवसर पर झारखंड सरकार के मंत्री चमर लोहड़ा, अध्यक्ष लक्ष्मण उरांव, अध्यक्ष सुदामा उरांव, किशुनदेव उरांव, मनोज उरांव, रमेश उरांव, मुखिया नागेंद्र यादव, श्याम नारायण उरांव, प्रमोद उरांव, मथुरा उरांव, मोती उरांव, वीरेंद्र उरांव, सुरेंद्र उरांव, बलदेव उरांव, बंधन टिंगा, संतोष कुमार भोला, विशाल देव, सुदामा उरांव, लक्ष्मण उरांव, सतेंद्र दुबे, नीरज कुमार मिश्रा और रिंकू सिंह सहित कई लोग मौजूद रहे। रोहतास प्रखंड क्षेत्र के कैमूर पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक रोहतासगढ़ किला परिसर एवं नागाटोली में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुड़ुखर कोहा बैंजा महोत्सव का समापन हुआ। इस महोत्सव में भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ नेपाल से आए आदिवासी समाज के लोगों ने भाग लिया और अपने पूर्वजों की धरती को नमन किया। दो दिवसीय इस कार्यक्रम में बिहार सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमा खान और चेनारी विधायक मुरारी प्रसाद गौतम भी शामिल हुए। आयोजन समिति की ओर से मुख्य अतिथियों को अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया। इसके बाद वक्ताओं ने अपनी स्मृतियां साझा कीं। महोत्सव के दौरान आदिवासी समाज के लोगों ने रोहतासगढ़ किला परिसर में स्थित कर्म के पवित्र पेड़ (चार धाम) की विधिवत पूजा-अर्चना की। उन्होंने पारंपरिक मानर थाप पर अपने पूर्वजों को याद किया। नेपाल से आईं प्रमिला देवी, झारखंड की इतवारी उरांव, ओडिशा के दिनेश उरांव, महेश उरांव और ललिता देवी सहित अन्य प्रतिभागियों ने बताया कि उन्होंने अपने पूर्वजों से रोहतासगढ़ किले की अनेक कहानियां सुनी थीं, लेकिन आज स्वयं दर्शन कर वे अभिभूत हुए। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि सरकार की उदासीनता के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर अपना अस्तित्व खोती जा रही है। उन्होंने सरकार से रोहतासगढ़ किले के संरक्षण एवं जीर्णोद्धार की मांग की। उरांव जनजाति की लोककथाओं और पारंपरिक गीतों में रोहतासगढ़ का विशेष स्थान रहा है। एक पारंपरिक गीत के अनुसार, सरहुल पर्व के अवसर पर जब उरांव पुरुष मद्यपान में मदहोश थे, उसी दौरान खरवार राजा ने लूंउनी नामक ग्वालन दासी की सहायता से आक्रमण कर रोहतासगढ़ किले और उसके आसपास के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। इस पराजय के बाद उरांव राजा सहित पूरा समुदाय रोहतासगढ़ छोड़कर छोटानागपुर (वर्तमान झारखंड) चला गया। कालांतर में वे छत्तीसगढ़ सहित देश के अन्य हिस्सों में बस गए, लेकिन रोहतासगढ़ की स्मृतियां आज भी उनके मन-मस्तिष्क में जीवित हैं। इस अवसर पर झारखंड सरकार के मंत्री चमर लोहड़ा, अध्यक्ष लक्ष्मण उरांव, अध्यक्ष सुदामा उरांव, किशुनदेव उरांव, मनोज उरांव, रमेश उरांव, मुखिया नागेंद्र यादव, श्याम नारायण उरांव, प्रमोद उरांव, मथुरा उरांव, मोती उरांव, वीरेंद्र उरांव, सुरेंद्र उरांव, बलदेव उरांव, बंधन टिंगा, संतोष कुमार भोला, विशाल देव, सुदामा उरांव, लक्ष्मण उरांव, सतेंद्र दुबे, नीरज कुमार मिश्रा और रिंकू सिंह सहित कई लोग मौजूद रहे।  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *