होली पर हर साल होलिका दहन के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ियों की जरूरत पड़ती है, जिससे पेड़ों की कटाई बढ़ती है। इस बार कोडरमा में पर्यावरण बचाने की दिशा में अनोखी पहल शुरू हुई है। श्री कोडरमा गौशाला समिति ने गोबर से ‘गौकाष्ठ’ तैयार किया है। जिसे होलिका दहन में लकड़ी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। समिति का उद्देश्य है कि त्योहार की आस्था भी बनी रहे और प्रकृति को नुकसान भी न पहुंचे। गौकाष्ठ 10 रुपए प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि आम लोग भी इसे आसानी से अपना सकें। 80% गोबर और 20% बुरादा से होता है तैयार समिति के अध्यक्ष प्रदीप केडिया ने बताया कि गौशाला परिसर में विशेष मशीनों की मदद से गौकाष्ठ का निर्माण किया जा रहा है। सह सचिव अरुण मोदी के अनुसार, इसमें 80 प्रतिशत गोबर और 20 प्रतिशत लकड़ी के बुरादे का मिश्रण होता है। दोनों को मिक्सर मशीन में मिलाकर लकड़ी का आकार दिया जाता है। प्रत्येक गौकाष्ठ लगभग आधा फीट गोल और चार फीट लंबी होती है। निर्माण के बाद इन्हें पांच दिनों तक धूप में सुखाया जाता है, जिससे यह पूरी तरह सख्त और उपयोग योग्य बन जाती है। कम धुआं, हल्की और आसानी से जलने वाली समिति के उपाध्यक्ष महेश दारूका ने बताया कि पारंपरिक लकड़ी की तुलना में गौकाष्ठ हल्की होती है और इसे जलाना आसान है। पूरी तरह सूखी होने के कारण इससे धुआं अपेक्षाकृत कम निकलता है, जिससे प्रदूषण कम होता है। बीच में छेद होने से ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर रहता है। यह तेजी से जलती है। गौकाष्ठ का उपयोग पूजन, हवन, तंदूर, भोजन पकाने और अंतिम संस्कार में भी किया जा रहा है। जिले के कुछ होटलों ने भी इसे ईंधन के रूप में अपनाना शुरू कर दिया है। समिति ने कुछ लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए इसे नि:शुल्क उपलब्ध कराया था। होलिका दहन के लिए 10 किलो का बैग तैयार होली को देखते हुए समिति ने 10 किलो के पैक में गौकाष्ठ उपलब्ध कराना शुरू किया है। होलिका दहन में इसके बड़े पैमाने पर उपयोग से पेड़ों की कटाई रोकी जा सकेगी और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। समिति का मानना है कि यदि लोग इस विकल्प को अपनाएं तो त्योहार की पवित्रता के साथ प्रकृति की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है। इच्छुक लोग गौकाष्ठ प्राप्त करने के लिए गौशाला से संपर्क कर सकते हैं। इस पहल से होली के रंगों में हरियाली का संदेश भी जुड़ रहा है। होली पर हर साल होलिका दहन के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ियों की जरूरत पड़ती है, जिससे पेड़ों की कटाई बढ़ती है। इस बार कोडरमा में पर्यावरण बचाने की दिशा में अनोखी पहल शुरू हुई है। श्री कोडरमा गौशाला समिति ने गोबर से ‘गौकाष्ठ’ तैयार किया है। जिसे होलिका दहन में लकड़ी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। समिति का उद्देश्य है कि त्योहार की आस्था भी बनी रहे और प्रकृति को नुकसान भी न पहुंचे। गौकाष्ठ 10 रुपए प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि आम लोग भी इसे आसानी से अपना सकें। 80% गोबर और 20% बुरादा से होता है तैयार समिति के अध्यक्ष प्रदीप केडिया ने बताया कि गौशाला परिसर में विशेष मशीनों की मदद से गौकाष्ठ का निर्माण किया जा रहा है। सह सचिव अरुण मोदी के अनुसार, इसमें 80 प्रतिशत गोबर और 20 प्रतिशत लकड़ी के बुरादे का मिश्रण होता है। दोनों को मिक्सर मशीन में मिलाकर लकड़ी का आकार दिया जाता है। प्रत्येक गौकाष्ठ लगभग आधा फीट गोल और चार फीट लंबी होती है। निर्माण के बाद इन्हें पांच दिनों तक धूप में सुखाया जाता है, जिससे यह पूरी तरह सख्त और उपयोग योग्य बन जाती है। कम धुआं, हल्की और आसानी से जलने वाली समिति के उपाध्यक्ष महेश दारूका ने बताया कि पारंपरिक लकड़ी की तुलना में गौकाष्ठ हल्की होती है और इसे जलाना आसान है। पूरी तरह सूखी होने के कारण इससे धुआं अपेक्षाकृत कम निकलता है, जिससे प्रदूषण कम होता है। बीच में छेद होने से ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर रहता है। यह तेजी से जलती है। गौकाष्ठ का उपयोग पूजन, हवन, तंदूर, भोजन पकाने और अंतिम संस्कार में भी किया जा रहा है। जिले के कुछ होटलों ने भी इसे ईंधन के रूप में अपनाना शुरू कर दिया है। समिति ने कुछ लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए इसे नि:शुल्क उपलब्ध कराया था। होलिका दहन के लिए 10 किलो का बैग तैयार होली को देखते हुए समिति ने 10 किलो के पैक में गौकाष्ठ उपलब्ध कराना शुरू किया है। होलिका दहन में इसके बड़े पैमाने पर उपयोग से पेड़ों की कटाई रोकी जा सकेगी और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। समिति का मानना है कि यदि लोग इस विकल्प को अपनाएं तो त्योहार की पवित्रता के साथ प्रकृति की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है। इच्छुक लोग गौकाष्ठ प्राप्त करने के लिए गौशाला से संपर्क कर सकते हैं। इस पहल से होली के रंगों में हरियाली का संदेश भी जुड़ रहा है।


