देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) के खुद के मेडिकल कॉलेज का 25 साल पुराना सपना अब हकीकत में बदलने जा रहा है। राज्य सरकार ने इस बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट को ‘ग्रीन सिग्नल’ देते हुए इसेंसिएलिटी सर्टिफिकेट (अनिवार्यता प्रमाण पत्र) जारी कर दिया है। इसके साथ ही विश्वविद्यालय ने नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) के पास आवेदन जमा कर दिया है। इंदौर से झाबुआ क्यों शिफ्ट हुआ प्रोजेक्ट इंदौर के छोटा बांगड़दा में 2001 से यह प्रोजेक्ट जमीन की कमी के कारण अटका था। इंदौर में यूनिवर्सिटी के पास पहले 50 एकड़ जमीन थी, जो अब घटकर मात्र 12 एकड़ रह गई है। यह मेडिकल कॉलेज के मानकों के लिए काफी कम है। कुलपति प्रो. राकेश सिंघई की पहल और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की रुचि के बाद इसे झाबुआ शिफ्ट किया गया, ताकि पिछड़े आदिवासी क्षेत्रों में बेहतर इलाज और शिक्षा पहुंच सके। 1200 करोड़ का मेगा प्लान: 2026 से शुरू हो सकती है पढ़ाई यूनिवर्सिटी प्रशासन की कोशिश है कि अगले शैक्षणिक सत्र से ही एमबीबीएस की सीटें आवंटित हो जाएं। झाबुआ स्थित आरजीपीवी के यूआईटी भवन में कॉलेज शुरू होगा। इसके लिए आरजीपीवी को 60 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति दी जाएगी। आगे चलकर 100 एकड़ जमीन पर विशाल कैंपस विकसित किया जाएगा। एमबीबीएस के बाद यहां बीडीएस, आयुर्वेदिक और होम्योपैथी के कोर्स भी शुरू किए जाएंगे। कुलपति प्रो. राकेश सिंघई के अनुसार, इस कॉलेज के खुलने से जिला अस्पतालों को विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम और आधुनिक संसाधन मिलेंगे। कॉलेज और अस्पताल के कारण क्षेत्र में बाजार और रोजगार की नई संभावनाएं पैदा होंगी। आदिवासी अंचल के मेधावी छात्र अपने ही क्षेत्र में रहकर डॉक्टर बन सकेंगे। इंदौर की जमीन का क्या होगा? इंदौर के छोटा बांगड़दा की 12 एकड़ जमीन को लेकर पेंच अभी फंसा हुआ है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह जमीन केवल चिकित्सा शिक्षा के लिए आरक्षित है। ऐसे में वहां बी.आर्क या बी.डिजाइन जैसे नए कोर्स शुरू करने के लिए यूनिवर्सिटी को फिर से सरकार से विशेष अनुमति लेनी होगी।


