‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के बेहद करीब भारत-EU! टैरिफ को चुनौती, 2 अरब लोगों का बनेगा साझा बाजार

‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के बेहद करीब भारत-EU! टैरिफ को चुनौती, 2 अरब लोगों का बनेगा साझा बाजार

India-EU Trade Deal: भारत और यूरोपीय संघ (EU) के रिश्तों में अब एक नया अध्याय जुड़ने वाला है। दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक मंच (WEF) से EU की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने ऐलान किया है कि भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता अपने अंतिम चरण में है। उन्होंने इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” बताया, जो करीब दो अरब लोगों के लिए साझा बाजार तैयार करेगा। खास बात यह है कि EU प्रमुख लेयेन अगले हफ्ते भारत आ रही हैं और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी।

टैरिफ नहीं, साझेदारी जरूरी

विश्व आर्थिक मंच में अपने संबोधन के दौरान लेयेन ने साफ शब्दों में कहा कि यूरोप अब टैरिफ और ट्रेड वॉर की राजनीति से आगे बढ़ना चाहता है। उनका इशारा अमेरिका समेत उन देशों की ओर था, जो व्यापार में शुल्क बढ़ाने की नीति अपनाते हैं।
EU प्रमुख ने कहा कि यूरोप निष्पक्ष व्यापार, टिकाऊ विकास और भरोसेमंद साझेदारी में यकीन रखता है। उन्होंने भारत को यूरोप की नई आर्थिक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ बताया। लेयेन का मानना है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र इस सदी का आर्थिक केंद्र है और भारत इसमें सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है।

गणतंत्र दिवस का खास महत्व

EU प्रमुख लेयेन 25 से 27 जनवरी के बीच भारत दौरे पर रहेंगी। 26 जनवरी को वह यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा के साथ भारत के 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगी। यह पहली बार होगा जब EU की एक सैन्य टुकड़ी भी गणतंत्र दिवस परेड में हिस्सा लेगी।
इसके अगले ही दिन, 27 जनवरी को नई दिल्ली में 16वां भारत-EU शिखर सम्मेलन होगा, जिसकी सह-अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। इसी दौरान FTA को लेकर अहम दस्तावेज अपनाए जाने की संभावना है।

क्यों ऐतिहासिक है यह व्यापार समझौता?

अगर यह मुक्त व्यापार समझौता (FTA) पूरा होता है, तो यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता होगा। इसमें 27 देशों वाले यूरोपीय संघ के साथ सिर्फ सामान ही नहीं, बल्कि सेवाएं, निवेश, डिजिटल व्यापार, सप्लाई चेन, पर्यावरण मानक और नियमों में सहयोग जैसे कई अहम मुद्दे शामिल होंगे।
यूरोपीय संघ के अनुसार, यह डील दुनिया की लगभग 25% GDP को कवर करेगी। इससे भारतीय कंपनियों को यूरोप के बड़े बाजार तक आसान पहुंच मिलेगी, जबकि यूरोपीय कंपनियों को भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजार में मजबूत पकड़ बनाने का मौका मिलेगा। हालांकि कुछ जटिल मुद्दों पर बातचीत अभी बाकी है, लेकिन दावोस से आए संकेत साफ बताते हैं कि दोनों पक्ष एक ऐतिहासिक समझौते के बेहद करीब हैं।

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