गोरखपुर में माह-ए-रमजान का सातवां रोजा पूरी अकीदत और रूहानी माहौल के बीच गुजरा। रोजेदार रोजा और नमाज के जरिए अल्लाह की इबादत में जुटे रहे। मस्जिदों और घरों में कुरआन-ए-पाक की तिलावत और दुरूद-ओ-सलाम पढ़ा गया, जबकि तरावीह की नमाज का सिलसिला जारी है। इफ्तार और सहरी के समय घरों में दस्तरख्वान सजे नजर आए और बाजारों में भी अच्छी खासी रौनक रही। रहमत का अशरा जारी है और दस रोजे पूरे होने के बाद मगफिरत का अशरा शुरू होगा।
सेहत के लिए फायदेमंद है रोजा
मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया, दीवान बाजार के प्रधानाचार्य हाफिज नजरे आलम कादरी ने बताया कि रोजा रखने से इंसान तंदुरुस्त रहता है। हदीस शरीफ में भी रोजा रखने को सेहत के लिए फायदेमंद बताया गया है। उन्होंने कहा कि रोजा रखने से पाचन क्रिया और आमाशय को आराम मिलता है, जिससे शरीर की कार्यप्रणाली बेहतर होती है और शरीर के भीतर जमा फालतू तत्व खत्म होते हैं। उन्होंने बताया कि खजूर से रोजा खोलना पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत है और खजूर शरीर को ताकत देने के साथ थकान दूर करने में भी मदद करता है। इबादत से मिलती है रूहानी ताकत
जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में कार्यरत मोहम्मद फैजान ने बताया कि इस्लाम में रोजे का सिलसिला पहले की उम्मतों से जुड़ा है। रमजान के महीने में की गई इबादत का खास महत्व होता है। इस दौरान व्यक्ति खान-पान और अन्य आदतों पर संयम रखता है और नमाज व तरावीह के जरिए अल्लाह का जिक्र करता है, जिससे इंसान की रूह पाक-साफ होती है और आत्मिक मजबूती मिलती है। सदका-ए-फित्र की मिकदार 75 रुपये तय
रमजान हेल्पलाइन पर उलमा द्वारा लोगों के सवालों के जवाब दिए जा रहे हैं। शहर काजी मुफ्ती मुहम्मद अजहर शम्सी ने बताया कि गोरखपुर में गेहूं की कीमत के हिसाब से सदका-ए-फित्र की मिकदार एक व्यक्ति की तरफ से 75 रुपये तय की गई है। उन्होंने बताया कि हर मालिके निसाब पर अपनी तरफ से और अपनी नाबालिग औलाद की तरफ से सदका-ए-फित्र देना वाजिब है।


