बरेली के चर्चित राजेंद्र नगर स्थित ‘द डेन’ कैफे कांड के मुख्य आरोपी ऋषभ ठाकुर ने शनिवार को जनपद न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया। पुलिस को चकमा देकर कोर्ट पहुँचे आरोपी के चेहरे पर न तो कानून का खौफ दिखा और न ही किए का कोई पछतावा। शनिवार को न्यायालय परिसर में जो दृश्य सामने आया, उसने न सिर्फ पुलिस की कार्यप्रणाली बल्कि अदालत की मर्यादा और सुरक्षा व्यवस्था पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस परिसर में मोबाइल फोन और वीडियो रिकॉर्डिंग सख्त प्रतिबंधित है, वहां आरोपी का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल करना न्यायिक अनुशासन को सीधी चुनौती देता नजर आया। रील बनवाना कोर्ट प्रशासन की बड़ी चूक कोर्ट नंबर 05 में सरेंडर करने पहुँचा ऋषभ ठाकुर पूरी तरह बेखौफ नजर आ रहा था। अदालत की सीढ़ियां चढ़ते और कटघरे में खड़े होकर साथियों के साथ ठहाके लगाते हुए उसका वीडियो वायरल होने से न्याय की उम्मीद लगाए बैठी पीड़िता के जख्मों को और गहरा कर दिया है। जहाँ आम जनता को कोर्ट कक्ष में मोबाइल निकालने की अनुमति नहीं होती, वहीं एक गंभीर मामले के आरोपी का इस तरह रील बनवाना कोर्ट प्रशासन की बड़ी चूक मानी जा रही है। पुलिस की घेराबंदी को ठेंगा, ठहाकों के साथ किया सरेंडर राजेंद्र नगर कैफे कांड में पुलिस की कार्यप्रणाली उस वक्त सवालों के घेरे में आ गई जब कई टीमों की दबिश के बावजूद मुख्य आरोपी ऋषभ ठाकुर बड़ी आसानी से कोर्ट पहुँच गया। 27 दिसंबर को एक नर्सिंग छात्रा की बर्थडे पार्टी में घुसकर मारपीट, तोड़फोड़ और बदसलूकी करने का आरोपी पिछले कई दिनों से फरार चल रहा था। हैरानी की बात यह है कि फरार होने के बावजूद वह सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय था। पुलिस की ‘सुस्ती’ का फायदा उठाते हुए उसने अपनी सुविधानुसार सरेंडर किया, जो पुलिस के घेराबंदी के दावों की पोल खोलता है। झूठे निकले ‘लव जिहाद’ के दावे, छात्रा ने झेला था खौफनाक तांडव सीओ सिटी आशुतोष शिवम ने स्पष्ट किया था कि जांच में ‘लव जिहाद’ या धर्म परिवर्तन जैसा कोई भी साक्ष्य नहीं मिला था। यह एक सामान्य बर्थडे पार्टी थी, जिसमें बजरंग दल के पूर्व कार्यकर्ता ऋषभ और उसके साथियों ने महज शक के आधार पर कानून हाथ में लिया। छात्रा ने अपनी शिकायत में बताया था कि किस तरह हमलावरों ने उसके साथ बदतमीजी की और उसके दोस्तों को बेरहमी से पीटा। इस मामले में 6 आरोपी पहले ही जेल जा चुके हैं और अब मुख्य आरोपी को भी न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। क्या कहते हैं कानून के जानकार? इस पूरे प्रकरण पर सीनियर एडवोकेट सुनील सक्सेना और लवलेश पाठक ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि न्यायालय कक्ष में नियमों की अवहेलना करना अपने आप में एक गंभीर अपराध है। सभी न्यायालयों में मोबाइल का प्रयोग वर्जित है और रील बनाने वाली पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि कानून का उल्लंघन करने पर न्यायालय उनकी ‘रेल’ बना सकता है। कानून का पालन करना हर नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है और कोर्ट परिसर के भीतर ऐसी गतिविधियों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।


