छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक अनोखा मंदिर है, जहां नाव के आकार के एक पत्थर की पूजा की जाती है। यह मंदिर हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। डोंगेश्वर धाम में हर साल माघ पूर्णिमा पर दो दिवसीय विशाल मेला लगता है, जिसमें जिले और अन्य राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं। जिला मुख्यालय से लगभग 18 किलोमीटर दूर देवपुर गांव में स्थित यह प्रसिद्ध डोंगेश्वर धाम है। मंदिर का प्रवेश द्वार भी डोंगा यानी नाव के आकार का बना हुआ है। मंदिर के गर्भगृह में एक विशाल नाव स्वरूप पत्थर स्थापित है, जिसे सदियों से भगवान मानकर पूजा जाता है। पत्थर से जुड़ी ये है प्राचीन कथा इस पत्थर से जुड़ी एक प्राचीन कथा है, जिसे सुनकर लोग इसे दैवीय स्वरूप मानते हैं। डोंगेश्वर धाम मंदिर ट्रस्ट के 83 वर्षीय अध्यक्ष रामकुमार कौशल ने बताया कि यह कहानी उन्होंने अपने पूर्वजों से सुनी है और इस पर एक कविता भी लिखी है। वे यहां आने वाले हर जिज्ञासु को यह कथा सुनाते हैं। रामकुमार कौशल के अनुसार, महानदी के किनारे भंवरगढ़ नामक एक स्थान था, जहां नदी के टीले पर राजा का महल था। एक बार महानदी में भयंकर बाढ़ आ गई, जिससे चारों ओर स्थिति भयावह हो गई। प्रजा सब कुछ छोड़कर बाढ़ से बच निकली, लेकिन राजा, रानी और उनका पुत्र महल में फंस गए। बाढ़ से बचने राजा ने वहां से निकलने का फैसला किया बाढ़ से बचने के लिए राजा ने अपना महल और संपत्ति छोड़कर परिवार सहित वहां से निकलने का फैसला किया। उन्होंने एक केवट से विनम्रतापूर्वक महानदी पार कराने का अनुरोध किया और इसके बदले में धन व गहने देने का वादा किया। नाव में बैठकर सभी नदी के बीच में पहुंचे ही थे कि नाव अचानक रुक गई। केवट के अथक प्रयासों के बावजूद नाव आगे नहीं बढ़ी। तब केवट ने राजा से कहा कि नाव को बिना पूजा किए पानी में उतारा गया था, इसलिए अब पूजा आवश्यक है। उसने बताया कि नाव तभी आगे बढ़ेगी जब राजा अपने पुत्र की बलि देंगे, अन्यथा नाव का आगे बढ़ पाना संभव नहीं है। तभी राजा गंगा मैय्या से देवपुर गांव पार कराने मन ही मन प्रार्थना करने लगे। केंवट की बात सुनकर रानी ने कहा कि उनका यह इकलौता पुत्र है, इसलिए उसे बलि देना संभव नहीं है। रानी की यह बात कहते ही पानी की तेज लहर आई और नाव पलट गई। नाव में बैठे सभी लोग पानी में डूब गए। इसमें राजा, रानी, उनके पुत्र और केंवट की भी मौत हो गई। वहीं, लकड़ी की नाव पत्थर में बदल गई। आज जिस जगह डोंगापथरा का मंदिर है, वह कभी महानदी के बीच का स्थान हुआ करता था। इसी स्थान पर वह नाव पलटी थी। देवपुर गांव के लोग बताते हैं कि डोंगेश्वर धाम में हर साल माघ पूर्णिमा के अवसर पर दो दिन का भव्य मेला लगता है। इस दौरान लोग सुबह-सुबह आस्था की डुबकी लगाने आते हैं। श्रद्धालु सिर्फ छत्तीसगढ़ से ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों से भी यहां पहुंचते हैं। मेले में एक दिन पहले ही व्यापारी अपनी तैयारी शुरू कर देते हैं। यहां खाने-पीने की ढेरों स्टॉल लगती हैं, बच्चों के लिए झूले और खिलौने भी होते हैं। कपड़ों की दुकानों के साथ-साथ अलग-अलग समाजों के मंदिर और भवन भी सजते हैं, जहां सुबह-शाम पूजा पाठ किया जाता है।


