‘गैस सिलेंडर की किल्लत न होती तो बच्चे जिंदा होते’:मां बोली- एजेंसी ने 7 दिन दौड़ाया; छपरा में नदी में डूबकर 3 बच्चों की मौत

‘गैस सिलेंडर की किल्लत न होती तो बच्चे जिंदा होते’:मां बोली- एजेंसी ने 7 दिन दौड़ाया; छपरा में नदी में डूबकर 3 बच्चों की मौत

“कल आधी रात एजेंसी से दो लोग आए थे। वे बिना पैसे लिए गैस सिलेंडर देकर चले गए, लेकिन अब गैस मिलने से क्या होगा… मेरे बच्चे तो वापस नहीं आएंगे।” छपरा में गैस की किल्लत के बीच लकड़ी लेने गए बच्चों की मां कल्याणी देवी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में यह दर्द बयां किया। शुक्रवार सुबह सरयू नदी में डूबने से एक ही परिवार के तीन बच्चों की मौत हो गई। देर शाम तीनों मासूमों को एक ही जगह मिट्टी में दफना दिया गया। घटना के बाद भास्कर की टीम जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर मटियार गांव पहुंची। बच्चों की मौत के बाद मां का रो-रोकर बुरा हाल है। वह बार-बार चीखती और फिर बेहोश हो जा रही थी। आस-पड़ोस की महिलाएं जब उन्हें संभालतीं, तो वह एक ही बात दोहरातीं, “अगर घर में गैस होती, तो बच्चे लकड़ी काटने नहीं जाते… और आज जिंदा होते।” पढ़िए पूरी रिपोर्ट मां बोली- बच्चे सूखा चूड़ा खाकर दिन काट रहे थे मृतकों की पहचान मटियार गांव निवासी पप्पू महतो के 10 वर्षीय बेटे गुंजन कुमार, उनकी 12 वर्षीय बेटी रागिनी कुमारी और रिश्तेदार कृष्णा महतो की 13 वर्षीय बेटी प्रियांशु कुमारी के रूप में हुई है। गुंजन और रागिनी सगे भाई-बहन थे, जबकि प्रियांशु उनकी मौसेरी बहन थी। गुंजन अपने परिवार के साथ रहता था। घर में उसकी मां और बहन रागिनी थीं, जबकि उसके पिता सऊदी अरब में मजदूरी करते हैं। बताया जा रहा है कि करीब 10 दिन पहले गुंजन की मौसी अपने बच्चों के साथ छुट्टियां बिताने उनके घर आई थीं। मां ने रोते हुए बताया, “घर में दो दिनों से चूल्हा नहीं जला था। गैस खत्म हो गई थी और इतने पैसे नहीं थे कि नया सिलेंडर ले सकें। बच्चे सूखा चूड़ा खाकर दिन काट रहे थे। शुक्रवार को वे लकड़ी चुनने जंगल की ओर गए थे, ताकि घर में चूल्हा जल सके। कुछ ही देर बाद खबर मिली कि तीनों बच्चों की नदी में डूबने से मौत हो गई, एक पल में मेरा पूरा संसार उजड़ गया।” गैस नहीं रहने की वजह लड़की लेने गए थे जंगल भीड़ में पीछे खड़ी महिलाओं से जब गांव के पुरुषों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि सभी मृतक बच्चों को मिट्टी देने गए हैं। कुछ देर इंतजार के बाद गांव की सड़कों पर नजर गई, जहां लोग अंतिम संस्कार कर लौटते दिखे। इसी दौरान हमारी सबसे पहले मृतक के बड़े भाई राजन से बातचीत हुई। राजन ने घटना को याद करते हुए बताया कि घर में दो दिन पहले गैस सिलेंडर खत्म हो गया था। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि तुरंत नया सिलेंडर लिया जा सके, इसलिए परिवार किसी तरह रूखा-सूखा खाकर दिन गुजार रहा था। उन्होंने बताया कि शुक्रवार सुबह करीब 8 बजे गांव के कुल सात बच्चे कुल्हाड़ी लेकर दियारा इलाके में लकड़ी काटने के लिए निकले थे, ताकि घर में चूल्हा जल सके। लकड़ी काटने के दौरान तेज धूप और मेहनत के कारण गुंजन कुमार को प्यास लगी। वह पानी पीने के लिए पास बह रही सरयू नदी की ओर गया। जैसे ही वह नदी में उतरा, अचानक उसका पैर फिसल गया और वह गहरे पानी में चला गया। उसे डूबता देख उसकी बहन रागिनी कुमारी घबरा गई और बिना कुछ सोचे-समझे उसे बचाने के लिए नदी में कूद पड़ी, लेकिन वह भी संतुलन नहीं बना सकी और खुद भी डूबने लगी। मेरी आंखों के सामने छोटे भाई-बहन डूब गए राजन ने आगे बताया, “दोनों भाई-बहन को पानी में संघर्ष करता देख मेरी छोटी बहन प्रियांशु कुमारी भी उन्हें बचाने के लिए नदी में उतर गई, लेकिन नदी की गहराई और तेज धारा के सामने वह भी खुद को संभाल नहीं पाई और तीनों देखते ही देखते पानी में समा गए। इस दौरान मैं और एक अन्य युवक भी हिम्मत जुटाकर उन्हें बचाने के लिए नदी में उतरे, लेकिन गहराई और धारा इतनी तेज थी कि हमलोग बच्चों तक नहीं पहुंच सके और किसी तरह अपनी जान बचाकर बाहर निकल आए। मेरी आंखों के सामने छोटे भाई-बहन डूब गए। मैं कुछ नहीं कर सका।” वहीं, राजन के साथ जो युवक पानी में कूदा था उसने बताया, “जब से सिलेंडर की किल्लत हुई है हमारे गांव में कई घरों में लकड़ी-चूल्हे पर खाना बन रहा है। कई घरों में सिलेंडर खत्म हो गया है, इस वजह से लोग फिर से पुराने तौर तरीके की तरफ मुड़ गए हैं। गांव से हर दिन कोई न कोई लड़की काटने जंगल की तरफ जाता है।” अब जानिए, घटना की शुरुआत कैसे हुई.. दादी के नाम था गैस कनेक्शन, 7 दिन तक एजेंसी ने दौड़ाया मृतकों की दादी मालती देवी ने बताया, “गैस कनेक्शन मेरे ही नाम से है, लेकिन सिलेंडर लेने के लिए 20 मार्च से लगातार एजेंसी का चक्कर लगा रही थी। पहले दिन 20 मार्च को गई तो कहा गया कि पहले ई-केवाईसी कराइए, तभी गैस मिलेगा। अगले दिन 21 मार्च को जब केवाईसी कराने पहुंची तो कहा गया कि अभी सिस्टम में अपडेट नहीं हुआ है, दोबारा आइए।” उन्होंने आगे कहा, “22 मार्च को फिर गई तो बोले कि डीएससी कोड नहीं आया है, कोड आएगा तभी सिलेंडर मिलेगा। 23 मार्च को कोड के बारे में पूछने गई तो कहा गया कि अभी सर्वर डाउन है, इंतजार करना पड़ेगा। 24 मार्च को फिर एजेंसी गई तो कहा गया कि अभी स्टॉक नहीं है, दो दिन बाद आइए।” मालती देवी ने बताया, “25 मार्च को गई तो फिर से केवाईसी में कमी बताकर लौटा दिया गया। 26 मार्च को आखिरी बार गई तो कहा गया कि कोड नहीं गिरा है, इसलिए गैस नहीं मिलेगा। हर दिन कोई न कोई बहाना बनाकर वापस भेज दिया जाता था। थक-हार कर लौट आती थी और घर में लकड़ी पर ही खाना बनता रहा।” उन्होंने दर्द भरे शब्दों में कहा, “अगर उसी समय गैस मिल गया होता तो मेरे पोते-पोतियां लकड़ी काटने जंगल नहीं जाते और आज जिंदा होते। करीब एक साल से घर में लकड़ी के जलावन पर ही खाना बन रहा था।” ग्रामीण बोले- अमूमन यही हालत पूरे गांव का
गांव के निवासी अजित महतो ने बताया कि महतो मोहल्ले में लगभग सभी के घर उज्जवला से गैस कनेक्शन मिला है। लेकिन किसी को गैस उपलब्ध नहीं कराया जाता है। गैस एजेंसी पर जाने के बाद किसी प्रकार से बहाना बनाकर लौटा दिया जाता है मजबूरन गरीब लोग जलावन पर खाना बनाते हैं। योगेंद्र महतो ने बताया कि मेरे घर भी उज्जवला गैस योजना के तहत गैस कनेक्शन मिला है। जिसको लेकर कई बार गैस एजेंसी पर गए। लेकिन ई केवाईसी नहीं होने पर डीएससी कोड नहीं आने का हवाला देकर लौटा दिया गया और मुझे गैस नहीं दिया गया। अमूमन यही हालत पूरे गांव का है। राजा कुमार ने बताया के गैस की कमी होने से पहले हम लोगों को गैस सिलेंडर मिल जाया करता था। लेकिन इजराइल अमेरिका ईरान लड़ाई के बाद एजेंसी के कर्मचारियों द्वारा बहाना बनाकर लौटा दिया जा रहा है। और 45 दिन बाद गैस देने की बात कही जा रही है। जिसकी भी गलती होगी, कार्रवाई की जाएगी
विधायक मनोरंजन सिंह धूमल आगे कहा, “प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि परिवार को जल्द से जल्द राहत और मुआवजा उपलब्ध कराया जाए। साथ ही गांव में गैस की किल्लत और एजेंसी की लापरवाही की जो बात सामने आ रही है, उसकी गंभीरता से जांच कराई जाएगी। अगर इसमें किसी की भी गलती पाई जाती है तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।” “कल आधी रात एजेंसी से दो लोग आए थे। वे बिना पैसे लिए गैस सिलेंडर देकर चले गए, लेकिन अब गैस मिलने से क्या होगा… मेरे बच्चे तो वापस नहीं आएंगे।” छपरा में गैस की किल्लत के बीच लकड़ी लेने गए बच्चों की मां कल्याणी देवी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में यह दर्द बयां किया। शुक्रवार सुबह सरयू नदी में डूबने से एक ही परिवार के तीन बच्चों की मौत हो गई। देर शाम तीनों मासूमों को एक ही जगह मिट्टी में दफना दिया गया। घटना के बाद भास्कर की टीम जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर मटियार गांव पहुंची। बच्चों की मौत के बाद मां का रो-रोकर बुरा हाल है। वह बार-बार चीखती और फिर बेहोश हो जा रही थी। आस-पड़ोस की महिलाएं जब उन्हें संभालतीं, तो वह एक ही बात दोहरातीं, “अगर घर में गैस होती, तो बच्चे लकड़ी काटने नहीं जाते… और आज जिंदा होते।” पढ़िए पूरी रिपोर्ट मां बोली- बच्चे सूखा चूड़ा खाकर दिन काट रहे थे मृतकों की पहचान मटियार गांव निवासी पप्पू महतो के 10 वर्षीय बेटे गुंजन कुमार, उनकी 12 वर्षीय बेटी रागिनी कुमारी और रिश्तेदार कृष्णा महतो की 13 वर्षीय बेटी प्रियांशु कुमारी के रूप में हुई है। गुंजन और रागिनी सगे भाई-बहन थे, जबकि प्रियांशु उनकी मौसेरी बहन थी। गुंजन अपने परिवार के साथ रहता था। घर में उसकी मां और बहन रागिनी थीं, जबकि उसके पिता सऊदी अरब में मजदूरी करते हैं। बताया जा रहा है कि करीब 10 दिन पहले गुंजन की मौसी अपने बच्चों के साथ छुट्टियां बिताने उनके घर आई थीं। मां ने रोते हुए बताया, “घर में दो दिनों से चूल्हा नहीं जला था। गैस खत्म हो गई थी और इतने पैसे नहीं थे कि नया सिलेंडर ले सकें। बच्चे सूखा चूड़ा खाकर दिन काट रहे थे। शुक्रवार को वे लकड़ी चुनने जंगल की ओर गए थे, ताकि घर में चूल्हा जल सके। कुछ ही देर बाद खबर मिली कि तीनों बच्चों की नदी में डूबने से मौत हो गई, एक पल में मेरा पूरा संसार उजड़ गया।” गैस नहीं रहने की वजह लड़की लेने गए थे जंगल भीड़ में पीछे खड़ी महिलाओं से जब गांव के पुरुषों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि सभी मृतक बच्चों को मिट्टी देने गए हैं। कुछ देर इंतजार के बाद गांव की सड़कों पर नजर गई, जहां लोग अंतिम संस्कार कर लौटते दिखे। इसी दौरान हमारी सबसे पहले मृतक के बड़े भाई राजन से बातचीत हुई। राजन ने घटना को याद करते हुए बताया कि घर में दो दिन पहले गैस सिलेंडर खत्म हो गया था। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि तुरंत नया सिलेंडर लिया जा सके, इसलिए परिवार किसी तरह रूखा-सूखा खाकर दिन गुजार रहा था। उन्होंने बताया कि शुक्रवार सुबह करीब 8 बजे गांव के कुल सात बच्चे कुल्हाड़ी लेकर दियारा इलाके में लकड़ी काटने के लिए निकले थे, ताकि घर में चूल्हा जल सके। लकड़ी काटने के दौरान तेज धूप और मेहनत के कारण गुंजन कुमार को प्यास लगी। वह पानी पीने के लिए पास बह रही सरयू नदी की ओर गया। जैसे ही वह नदी में उतरा, अचानक उसका पैर फिसल गया और वह गहरे पानी में चला गया। उसे डूबता देख उसकी बहन रागिनी कुमारी घबरा गई और बिना कुछ सोचे-समझे उसे बचाने के लिए नदी में कूद पड़ी, लेकिन वह भी संतुलन नहीं बना सकी और खुद भी डूबने लगी। मेरी आंखों के सामने छोटे भाई-बहन डूब गए राजन ने आगे बताया, “दोनों भाई-बहन को पानी में संघर्ष करता देख मेरी छोटी बहन प्रियांशु कुमारी भी उन्हें बचाने के लिए नदी में उतर गई, लेकिन नदी की गहराई और तेज धारा के सामने वह भी खुद को संभाल नहीं पाई और तीनों देखते ही देखते पानी में समा गए। इस दौरान मैं और एक अन्य युवक भी हिम्मत जुटाकर उन्हें बचाने के लिए नदी में उतरे, लेकिन गहराई और धारा इतनी तेज थी कि हमलोग बच्चों तक नहीं पहुंच सके और किसी तरह अपनी जान बचाकर बाहर निकल आए। मेरी आंखों के सामने छोटे भाई-बहन डूब गए। मैं कुछ नहीं कर सका।” वहीं, राजन के साथ जो युवक पानी में कूदा था उसने बताया, “जब से सिलेंडर की किल्लत हुई है हमारे गांव में कई घरों में लकड़ी-चूल्हे पर खाना बन रहा है। कई घरों में सिलेंडर खत्म हो गया है, इस वजह से लोग फिर से पुराने तौर तरीके की तरफ मुड़ गए हैं। गांव से हर दिन कोई न कोई लड़की काटने जंगल की तरफ जाता है।” अब जानिए, घटना की शुरुआत कैसे हुई.. दादी के नाम था गैस कनेक्शन, 7 दिन तक एजेंसी ने दौड़ाया मृतकों की दादी मालती देवी ने बताया, “गैस कनेक्शन मेरे ही नाम से है, लेकिन सिलेंडर लेने के लिए 20 मार्च से लगातार एजेंसी का चक्कर लगा रही थी। पहले दिन 20 मार्च को गई तो कहा गया कि पहले ई-केवाईसी कराइए, तभी गैस मिलेगा। अगले दिन 21 मार्च को जब केवाईसी कराने पहुंची तो कहा गया कि अभी सिस्टम में अपडेट नहीं हुआ है, दोबारा आइए।” उन्होंने आगे कहा, “22 मार्च को फिर गई तो बोले कि डीएससी कोड नहीं आया है, कोड आएगा तभी सिलेंडर मिलेगा। 23 मार्च को कोड के बारे में पूछने गई तो कहा गया कि अभी सर्वर डाउन है, इंतजार करना पड़ेगा। 24 मार्च को फिर एजेंसी गई तो कहा गया कि अभी स्टॉक नहीं है, दो दिन बाद आइए।” मालती देवी ने बताया, “25 मार्च को गई तो फिर से केवाईसी में कमी बताकर लौटा दिया गया। 26 मार्च को आखिरी बार गई तो कहा गया कि कोड नहीं गिरा है, इसलिए गैस नहीं मिलेगा। हर दिन कोई न कोई बहाना बनाकर वापस भेज दिया जाता था। थक-हार कर लौट आती थी और घर में लकड़ी पर ही खाना बनता रहा।” उन्होंने दर्द भरे शब्दों में कहा, “अगर उसी समय गैस मिल गया होता तो मेरे पोते-पोतियां लकड़ी काटने जंगल नहीं जाते और आज जिंदा होते। करीब एक साल से घर में लकड़ी के जलावन पर ही खाना बन रहा था।” ग्रामीण बोले- अमूमन यही हालत पूरे गांव का
गांव के निवासी अजित महतो ने बताया कि महतो मोहल्ले में लगभग सभी के घर उज्जवला से गैस कनेक्शन मिला है। लेकिन किसी को गैस उपलब्ध नहीं कराया जाता है। गैस एजेंसी पर जाने के बाद किसी प्रकार से बहाना बनाकर लौटा दिया जाता है मजबूरन गरीब लोग जलावन पर खाना बनाते हैं। योगेंद्र महतो ने बताया कि मेरे घर भी उज्जवला गैस योजना के तहत गैस कनेक्शन मिला है। जिसको लेकर कई बार गैस एजेंसी पर गए। लेकिन ई केवाईसी नहीं होने पर डीएससी कोड नहीं आने का हवाला देकर लौटा दिया गया और मुझे गैस नहीं दिया गया। अमूमन यही हालत पूरे गांव का है। राजा कुमार ने बताया के गैस की कमी होने से पहले हम लोगों को गैस सिलेंडर मिल जाया करता था। लेकिन इजराइल अमेरिका ईरान लड़ाई के बाद एजेंसी के कर्मचारियों द्वारा बहाना बनाकर लौटा दिया जा रहा है। और 45 दिन बाद गैस देने की बात कही जा रही है। जिसकी भी गलती होगी, कार्रवाई की जाएगी
विधायक मनोरंजन सिंह धूमल आगे कहा, “प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि परिवार को जल्द से जल्द राहत और मुआवजा उपलब्ध कराया जाए। साथ ही गांव में गैस की किल्लत और एजेंसी की लापरवाही की जो बात सामने आ रही है, उसकी गंभीरता से जांच कराई जाएगी। अगर इसमें किसी की भी गलती पाई जाती है तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।”  

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