Shankaracharya Avimukteshwaranand in Jaipur: जयपुर: खुलेआम दी जा रही जान से मारने की धमकियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होतीॉ? गुरुवार को जयपुर के बनीपार्क में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ऐसे ही कई तीखे सवालों के साथ मौजूदा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया।
बता दें कि उनकी बातचीत सिर्फ शासन-प्रशासन तक सीमित नहीं रही। बल्कि वे समाज और धर्म के वर्तमान स्वरूप पर भी गहरी चोट करते नजर आए। पत्रिका से बातचीत में उन्होंने कई विषयों पर टिप्पणी भी की।

गौरतलब है कि हाल ही में शंकराचार्य को जान से मारने की धमकी मिलने का मामला सामने आया है। उन्होंने कहा कि बिना किसी भय के अपनी आवाज को और मजबूत करेंगे। राजनीतिक दलों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि वोट लेने के समय हिंदुओं की बात होती है, लेकिन उनके हितों की रक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते।
27 अप्रैल को गोमाता के सम्मान, संरक्षण एवं संवर्धन को समर्पित राष्ट्रव्यापी अभियान के अंतर्गत होने वाले गो सम्मान दिवस की तैयारियों को लेकर राय रखी। साथ ही उन्होंने ज्यादा से ज्यादा जुड़ने का आह्वान भी किया।

धमकी से धर्म तक रखी बेबाक राय
सवाल: हत्या की धमकी पर आपका क्या कहना है?
जवाब: यदि कोई खुलेआम हत्या की बात करता है और उस पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह कानून के राज पर गंभीर प्रश्न चिन्ह है। सरकार का पहला दायित्व नागरिकों की सुरक्षा है, ऐसे में सुरक्षा ही सुनिश्चित न हो तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सवाल: समाज और विद्वान जरूरी विषयों पर मौन हैं?
जवाबः आज के दौर में गंभीर मुद्दों पर सार्थक संवाद का अभाव है, जिससे भ्रम और असंतुलन बढ़ा है। मेरा उद्देश्य किसी पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि धर्म के वास्तविक स्वरूप को सामने लाना है। दिखावे का धर्म ज्यादा दिन नहीं चलेगा, लोगों को इसके असली अर्थ को समझना होगा।
सवाल: धर्म का स्वरूप कितना बदल गया है?
जवाबः आज बड़े मंच, रोशनी और आयोजन तो हैं। लेकिन सत्य, धैर्य और क्षमा जैसे मूल तत्व पीछे छूटते जा रहे हैं। हर व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि उसके जीवन में धर्म अधिक है या अधर्म। आत्ममंथन के बिना धर्म केवल दिखावा बनकर रह जाएगा।
सवाल: गो संरक्षण पर आपकी क्या राय है?
जवाबः स्थिति अब केवल व्यक्तिगत घटनाओं तक सीमित नहीं दिखती। इसके पीछे संगठित तंत्र होने की आशंका है। जिम्मेदार संस्थाएं अपेक्षित भूमिका नहीं निभा रही हैं। चुनाव के समय धर्म और गोमाता की बातें होती हैं, लेकिन जमीन पर ठोस कदम नजर नहीं आते। इससे यह सवाल उठता है कि कहीं यह सिर्फ भावनाओं को भुनाने का माध्यम तो नहीं बन गया।


