Unsafe Building: देश के महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक हर साल बड़ी संख्या में रिहायशी इमारतें जर्जर घोषित होती हैं। बढ़ती उम्र, खराब रखरखाव और बुनियादी ढांचे में कमजोरी इन्हें खतरनाक बना देते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उठता है कि असुरक्षित (Unsafe) घोषित होने पर फ्लैट के मालिकों का क्या होगा, लोन का क्या बनेगा और आगे क्या रास्ता अपनाया जा सकता है।
क्यों और कौन करता है Unsafe घोषित?
किसी इमारत को असुरक्षित घोषित करने का अधिकार स्थानीय शहरी प्रशासन के पास होता है। नगर निगम या नगर पालिका स्ट्रक्चरल ऑडिट रिपोर्ट (structural audit report) के साथ इंजीनियरों की जांच और जोखिम आकलन की रिपोर्ट के आधार पर यह फैसला लेती है। अगर इमारत के गिरने का खतरा हो, तो प्रशासन नोटिस जारी कर उसे खाली कराने, सुविधाएं काटने और इमारत को गिराने तक के आदेश दे सकता है।
क्या सीलिंग और खाली कराना कानूनी है?
प्रशासन के पास मानव जीवन की सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाने का अधिकार है। इमारत असुरक्षित घोषित होने के बाद बिजली-पानी काटना, परिसर सील करना या प्रवेश रोकना कानूनी माना गया है। अदालतें भी लगातार यह मानती रही हैं कि जीवन का अधिकार संपत्ति के अधिकार से ऊपर है, इसलिए मालिक होने के बावजूद ऐसी इमारत में रहना अनुमति योग्य नहीं रहता।
मालिकाना हक और सोसाइटी का भ्रम
असुरक्षित होने का मतलब यह नहीं कि फ्लैट पर मालिक का अधिकार खत्म हो गया। यहां जमीन में अविभाजित हिस्सा सुरक्षित रहता है। सोसाइटी केवल एक प्रबंधन व्यवस्था है, लेकिन कई मामलों में कहा जाता है कि सोसाइटी डिसबैंड (disband) हो गई, मतलब सोसाइटी बुनियादी रूप से खत्म हो जाती है। हालांकि, सोसाइटी के निष्क्रिय होने से जमीन पर मालिकों का अधिकार समाप्त नहीं होता। इसके बाद नई सोसाइटी बनाकर आगे की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
समाधान कैसे किया जाता है?
जर्जर इमारतों का व्यावहारिक समाधान रीडेवलपमेंट (redevelopment) है। इसमें पुरानी इमारत गिराकर उसी जमीन पर नई इमारत बनाई जाती है और पुराने मालिकों को नए फ्लैट मिलते हैं। इस स्थिति में फ्लैट के मालिक जमीन नहीं बेचते, बल्कि केवल निर्माण का अधिकार builder यानी निर्माता को देते हैं, जिसे डेवलपमेंट अधिकार (development right) कहा जाता है। निर्माण पूरा होते ही यह अधिकार समाप्त हो जाता है।
Home Loan का क्या होता है?
असुरक्षित घोषित होने से होम लोन खत्म नहीं होता। ग्राहकों को लोन चुकाना अनिवार्य होता है। ईएमआई चलती रहती है क्योंकि लोन बैंक और ग्राहक के बीच निजी समझौता होता है, इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता। भुगतान न करने पर बैंक वसूली की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। इसलिए पुन:निर्माण यानी रीडेवलपमेंट के दौरान भी लोन चुकाने की जिम्मेदारी बनी रहती है।


