मूर्ति कलाकारों को नहीं हो रहा मुनाफा:सरकार से मदद की है आस, कहा- प्रोत्साहन मिलता तो कला में और आता निखार

मूर्ति कलाकारों को नहीं हो रहा मुनाफा:सरकार से मदद की है आस, कहा- प्रोत्साहन मिलता तो कला में और आता निखार

समस्तीपुर शहर से सटा हुआ जितवारपुर का हसनपुर गांव। प्रजापति कुम्हार समाज से जुड़े 12 परिवारों के 16 युवा इन दिनों सरस्वती प्रतिमा निर्माण कार्य में जुटे हुए हैं। चुकी वर्षों से इनके पूर्वज मूर्ति कला को जीवित रखे हुए हैं। पूर्वजों के इस कला को परिवार के लोग आगे तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन दिनों दिन उनकी माली हालत खराब होती जा रही है। मेहनत और लागत के हिसाब से उन्हें मुनाफा नहीं मिलता। समाज के कुछ युवा ने तो नए कारोबार की ओर रुख कर लिया है। जो इस कार्य में जुटे हैं उनका मानना है कि सरकार से अगर कलाकारों को मदद मिलती तो इस कारोबार में भी उन्हें मुनाफा हो सकता था। जिस तरह से गीत संगीत, हस्तशिल्प, मिथिला पेंटिंग जैसे कलाकारों को सरकार प्रोत्साहित कर रही है। वैसे ही मिट्टी कला के क्षेत्र में कार्य करने वाले कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता तो यह कला और निखरता। नए लोगों को रोजगार भी मिलता। कंपटीशन में कम कीमत पर प्रतिमा बेचनी पड़ती कुम्हार प्रजापति समन्वय समिति के जिला अध्यक्ष व मिट्टी कलाकार प्रमोद पंडित बताते हैं कि उनके परिवार के 16 लोग विभिन्न अवसरों पर मिट्टी की प्रतिमा बनाते हैं। उनके बड़े भाई चंदेश्वर पंडित को सरकार ने मिट्टी कला के क्षेत्र में अवार्ड भी दिया था। इस कला को उनके परिवारों ने जीवित रखा है, लेकिन मुनाफा नहीं मिलने के कारण अब लोग इस ओर से मुख मोड़ रहे हैं। 5 फीट की सरस्वती प्रतिमा बनाने और उसे फाइनल टच देने तक करीब 7000 रुपए तक का खर्च आता है। मेहनत को देखते हुए इस प्रतिमा की कीमत 12 से 15000 रुपए होनी चाहिए। तब कलाकारों को बचत हो पता। लेकिन कंपटीशन की इस दौड़ में प्रतिमा को लोग ज्यादा से ज्यादा 8000 तक में बेच देते हैं। जिससे उन्हें मुनाफा नहीं हो पता। जबकि एक प्रतिमा बनाने में कम से कम एक सप्ताह का समय लगता है। बंगाल, झारखंड और यूपी की तरफ बिहार में भी हो माटी कला बोर्ड का गठन प्रमोद पंडित बताते हैं कि बिहार को छोड़ झारखंड, बंगाल और उत्तर प्रदेश में मिट्टी कला को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने माटी कला बोर्ड का गठन कर रखा है। जिस कारण इसे कुटीर उद्योग का दर्जा प्रदान होता है। उद्योग को बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से कई तरह से आर्थिक मदद दी जाती है। अगर बिहार में भी माटी कला बोर्ड का गठन कर दिया जाए तो विलुप्त हो रहे इस कला को पुनर्जीवित किया जा सकता है। नए लोगों को इस क्षेत्र में लाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे लोगों को रोजगार मिलेगा तो लोग इस कला को आगे बढ़ाएंगे अन्यथा धीरे-धीरे यह कला समाप्त हो जाएगी। समस्तीपुर शहर से सटा हुआ जितवारपुर का हसनपुर गांव। प्रजापति कुम्हार समाज से जुड़े 12 परिवारों के 16 युवा इन दिनों सरस्वती प्रतिमा निर्माण कार्य में जुटे हुए हैं। चुकी वर्षों से इनके पूर्वज मूर्ति कला को जीवित रखे हुए हैं। पूर्वजों के इस कला को परिवार के लोग आगे तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन दिनों दिन उनकी माली हालत खराब होती जा रही है। मेहनत और लागत के हिसाब से उन्हें मुनाफा नहीं मिलता। समाज के कुछ युवा ने तो नए कारोबार की ओर रुख कर लिया है। जो इस कार्य में जुटे हैं उनका मानना है कि सरकार से अगर कलाकारों को मदद मिलती तो इस कारोबार में भी उन्हें मुनाफा हो सकता था। जिस तरह से गीत संगीत, हस्तशिल्प, मिथिला पेंटिंग जैसे कलाकारों को सरकार प्रोत्साहित कर रही है। वैसे ही मिट्टी कला के क्षेत्र में कार्य करने वाले कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता तो यह कला और निखरता। नए लोगों को रोजगार भी मिलता। कंपटीशन में कम कीमत पर प्रतिमा बेचनी पड़ती कुम्हार प्रजापति समन्वय समिति के जिला अध्यक्ष व मिट्टी कलाकार प्रमोद पंडित बताते हैं कि उनके परिवार के 16 लोग विभिन्न अवसरों पर मिट्टी की प्रतिमा बनाते हैं। उनके बड़े भाई चंदेश्वर पंडित को सरकार ने मिट्टी कला के क्षेत्र में अवार्ड भी दिया था। इस कला को उनके परिवारों ने जीवित रखा है, लेकिन मुनाफा नहीं मिलने के कारण अब लोग इस ओर से मुख मोड़ रहे हैं। 5 फीट की सरस्वती प्रतिमा बनाने और उसे फाइनल टच देने तक करीब 7000 रुपए तक का खर्च आता है। मेहनत को देखते हुए इस प्रतिमा की कीमत 12 से 15000 रुपए होनी चाहिए। तब कलाकारों को बचत हो पता। लेकिन कंपटीशन की इस दौड़ में प्रतिमा को लोग ज्यादा से ज्यादा 8000 तक में बेच देते हैं। जिससे उन्हें मुनाफा नहीं हो पता। जबकि एक प्रतिमा बनाने में कम से कम एक सप्ताह का समय लगता है। बंगाल, झारखंड और यूपी की तरफ बिहार में भी हो माटी कला बोर्ड का गठन प्रमोद पंडित बताते हैं कि बिहार को छोड़ झारखंड, बंगाल और उत्तर प्रदेश में मिट्टी कला को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने माटी कला बोर्ड का गठन कर रखा है। जिस कारण इसे कुटीर उद्योग का दर्जा प्रदान होता है। उद्योग को बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से कई तरह से आर्थिक मदद दी जाती है। अगर बिहार में भी माटी कला बोर्ड का गठन कर दिया जाए तो विलुप्त हो रहे इस कला को पुनर्जीवित किया जा सकता है। नए लोगों को इस क्षेत्र में लाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे लोगों को रोजगार मिलेगा तो लोग इस कला को आगे बढ़ाएंगे अन्यथा धीरे-धीरे यह कला समाप्त हो जाएगी।  

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