पहचान और परंपराओं को जीवित रखने का गर्वपूर्ण अवसर
होली के रंग और उल्लास के बीच एक ऐसी परंपरा भी जीवित है, जो वर्षों से समाज की सांस्कृतिक पहचान को सहेजे हुए है। बांस के सामान का उपयोग कर तैयार किया जाने वाला म्यदार कामना इसी विरासत का सशक्त प्रतीक है। कर्नाटक के हुब्बल्ली में म्यदार समुदाय के लोग होली से लगभग एक महीने पहले इसकी तैयारी शुरू कर देते हैं। बांस को काटना, उसे आकार देना, मजबूत गांठों से बांधना और पारंपरिक ढंग से ढांचा खड़ा करना। यह पूरी प्रक्रिया सामूहिक श्रम और समर्पण का उदाहरण होती है। करीब बीस फीट ऊंचा यह ढांचा केवल एक संरचना नहीं, बल्कि आस्था, एकता और उत्सव का प्रतीक है। होली के त्योहार के जश्न में म्यदार कामना विशेष आकर्षण का केंद्र बनता है। इसे देखने के लिए आसपास के लोग भी उत्सुक रहते हैं। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती आई है और आधुनिकता के दौर में भी अपनी मूल भावना के साथ कायम है। म्यदार समुदाय के लिए यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी पहचान और परंपराओं को जीवित रखने का गर्वपूर्ण अवसर है।
बांस की खुशबू में बसती परंपरा की पहचान


