मैं बिहार हूं…बुद्ध के ज्ञान से बढ़ा, नरसंहार में झुलसा:114 साल में क्या-क्या सहा, हमने दिल्ली-मुंबई बनाया, अब एक्सप्रेसवे और इंडस्ट्री की तरफ बढ़ रहा

मैं बिहार हूं…बुद्ध के ज्ञान से बढ़ा, नरसंहार में झुलसा:114 साल में क्या-क्या सहा, हमने दिल्ली-मुंबई बनाया, अब एक्सप्रेसवे और इंडस्ट्री की तरफ बढ़ रहा

मैं बिहार हूं… मेरी पहचान सिर्फ एक राज्य नहीं, एक सभ्यता है। मैंने महात्मा बुद्ध को ज्ञान दिया, चाणक्य को राजनीति सिखाई, आर्यभट्ट को आकाश मापने की समझ दी। मेरी मिट्टी में कभी नालंदा जलती थी- ज्ञान के दीपक की तरह और फिर एक दौर आया जब मेरे गांव जलने लगे नरसंहारों में। मैंने साम्राज्य देखे, गुलामी झेली, आजादी पाई… और फिर अपने ही लोगों के बीच टूट गया। मेरे नाम पर ‘जंगलराज’ भी लिखा गया और फिर ‘डेवलपमेंट मॉडल’ भी।
1912 में जन्मा…2026 तक एक लंबा सफर तय कर चुका हूं। दर्द, राजनीति, संघर्ष और बदलाव का सफर। यह कहानी है- मेरी, जहां हर दशक एक नया चेहरा लेकर आया। 114 वर्षों में बिहार कितना बदला, क्या-क्या सहा, कैसे-कैसे दाग झेले और फिर विकास की राह भी पकड़ी। पढ़िए, बिहार दिवस पर स्पेशल रिपोर्ट..। 1912-1920: जन्म तो हुआ, लेकिन पहचान अंग्रेजों के हाथ में थी मैं 22 मार्च 1912 को बना…। ब्रिटिश हुकूमत ने मुझे बंगाल से अलग कर दिया। नाम मिला-बिहार। लेकिन आत्मा अभी भी बंधी हुई थी। मेरी मिट्टी वही थी जहां कभी महात्मा बुद्ध ने शांति का संदेश दिया था, जहां चाणक्य ने राजनीति की रणनीति लिखी थी, जहां से ज्ञान की रोशनी पूरी दुनिया में गई थी। लेकिन अब… मेरे किसान नील की खेती करने को मजबूर थे। मेरे मजदूर शोषण झेल रहे थे। मेरे फैसले लंदन में लिखे जाते थे। गांवों में गरीबी थी, लेकिन अंदर एक बेचैनी भी थी। लोग पूछने लगे थे, ‘क्या हम सिर्फ हुक्म मानने के लिए बने हैं?’ मेरे शहरों में पढ़े-लिखे लोग उभर रहे थे, जो अंग्रेजी समझते थे… और अन्याय भी। यही वो दौर था जब, मेरी आत्मा ने पहली बार करवट ली। राजनीति अभी जनता तक नहीं पहुंची थी, लेकिन उसके बीज बोए जा चुके थे। मैं शांत था… लेकिन तूफान आने वाला था। 1920-1930: जब गांधी आए और मैंने अपनी आवाज पहचान ली अप्रैल 1917, मेरे जीवन का पहला बड़ा मोड़। चंपारण की मिट्टी पर एक आदमी आया, जिसे दुनिया बाद में महात्मा गांधी के नाम से जानती है। मेरे किसान टूट चुके थे। नील की खेती ने उन्हें गुलाम बना दिया था। गांधी ने कहा- ‘सत्य और अहिंसा से लड़ो।’ और पहली बार, मेरे गांवों ने डर को हराया। चंपारण सत्याग्रह सिर्फ आंदोलन नहीं था। यह मेरी आत्मा का पुनर्जन्म था। मेरे किसानों ने अंग्रेजों को चुनौती दी, मेरे युवाओं ने जेल जाना स्वीकार किया। अब राजनीति सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं थी, यह गांव-गांव पहुंच चुकी थी। हर चौपाल पर चर्चा थी, आजादी, अधिकार और सम्मान की। मैंने महसूस किया, यही मेरी आवाज है… और वह ताकतवर है। मैं अब सिर्फ एक प्रांत नहीं था। मैं एक आंदोलन बन चुका था। 1930-1940: क्रांति, जेल और आजादी की कीमत अब मैं जाग चुका था। 1930 का दशक मेरे लिए संघर्ष का दशक था। नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन, ब्रिटिश कानूनों का विरोध… अब मेरे लोग हर मोर्चे पर थे। मेरे गांवों में पुलिस आती थी, लोगों को पकड़ती थी, लेकिन डर खत्म हो चुका था। राजनीति अब बलिदान मांग रही थी। मेरे हजारों बेटे जेल गए, कई शहीद भी हुए। लेकिन मैं टूट नहीं रहा था, मैं मजबूत हो रहा था। मेरी पहचान अब साफ थी- मैं आजादी चाहता हूं। 1940-1950: आजादी मिली, लेकिन जिम्मेदारियों का बोझ भी 1947… देश आजाद हुआ। मैं भी आजाद हुआ। लेकिन आजादी के साथ मेरे सामने नई चुनौतियां भी आईं। मेरे पास युवाओं को नौकरी, रोजगार देने के लिए उद्योग नहीं थे, मेरे पास मजबूत अर्थव्यवस्था भी नहीं थी। मेरे लोग गरीब थे, भुखमरी का शिकार हो रहे थे। बहुत बड़ी आबादी ऐसी थी, जिसे दो टाइम भी खाना नसीब नहीं हो रहा था। और बड़ी बात ये कि सरकार भी नई थी। राजनीति, सत्ता अब अंग्रेजों के खिलाफ नहीं, बल्कि खुद को संभालने की थी। मैंने सीखा, आजादी सिर्फ जीत नहीं, जिम्मेदारी भी है। राज्य को संभालने की अपने लोगों के लिए सभी व्यवस्थाएं करने की और जीने की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की। 1950-1960: विकास की शुरुआत, लेकिन रफ्तार धीमी आजादी के बाद अब मैं खुद को बनाने की कोशिश कर रहा था। सरकार ने योजनाएं शुरू की, सिंचाई, स्कूल, स्वास्थ्य इन पर बातचीत और चिंतन तो शुरू हुआ, लेकिन सच यह था कि मैं अभी भी बहुत पिछड़ा था। राजनीति शुरू हो चुकी थी, लेकिन विकास धीमा था। भुखमरी और बेरोजगारी का असर ये हुआ कि मेरे लोग काम के लिए बाहर जाने लगे। पलायन शुरू हो चुका था। इसका दर्द मैं आज ही नहीं वर्षों पहले से झेल रहा हूं। हमने दिल्ली-मुंबई जैसे शहर अपने खून-पशीने से बनाए। 1960-1970: राजनीति बढ़ी, विकास पीछे रह गया अब राजनीति मजबूत हो रही थी। नेतृत्व बदल रहा था, लेकिन जमीन पर बदलाव कम था। मेरे गांव आज भी गरीब थे, मेरे शहर छोटे। मैं एक ऐसे मोड़ पर था, जहां दिशा साफ नहीं थी। छोटी-छोटी योजनाओं में भ्रष्टाचार शुरू हो चुका था। जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर और विकास योजनाओं के नाम पर नेताओं ने लड़ाई शुरू कर दी थी। भ्रष्टाचार ऐसे बढ़ रहा था मानो वो सभी को पीछे छोड़ देगा। मैं इस विषय पर देशभर में सबसे ज्यादा बदनाम होने लगा था। 1970-1980: जब मेरी सड़कों पर क्रांति उतरी और नए नेताओं का जन्म हुआ 1970 का दशक मेरे लिए उबाल का दशक था। मेरे भीतर गुस्सा जमा हो चुका था, भ्रष्टाचार के खिलाफ, बेरोजगारी के खिलाफ, उस व्यवस्था के खिलाफ जो आम आदमी को सिर्फ भीड़ समझती थी। फिर एक दिन मेरी सड़कों पर आवाज गूंजी ‘संपूर्ण क्रांति।’ यह आवाज थी जयप्रकाश नारायण की और मैं हिल गया। पटना से लेकर छोटे कस्बों तक छात्र, युवा, किसान… सब सड़कों पर थे। यह सिर्फ आंदोलन नहीं था। यह मेरे भीतर का विस्फोट था। इसी आंदोलन ने मुझे एक नई राजनीति दी। मेरी मिट्टी से कुछ नए राजनीतिक चेहरे उभरे। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान व इनके जैसे कई और युवा, क्रांतिकारी नेता। ये सिर्फ नेता नहीं थे। ये मेरे समाज की नई आकांक्षाओं के प्रतीक थे। पहली बार, मेरे गांवों के गरीब, पिछड़े, दलित लोग राजनीति में अपनी जगह देख रहे थे। लेकिन इस जागरण के साथ एक और चीज जन्म ले रही थी, पहचान की राजनीति। जाति अब सिर्फ सामाजिक व्यवस्था नहीं रही। वह राजनीतिक हथियार बन रही थी। मेरे समाज में छोटे-छोटे समूह बनने लगे। हर कोई अपनी पहचान के लिए लड़ रहा था। मैं गर्व और चिंता दोनों महसूस कर रहा था। एक तरफ मेरे लोग जाग रहे थे। दूसरी तरफ मैं धीरे-धीरे जातियों में, क्षेत्र में बंट रहा था। मुझे तब अंदाजा नहीं था, यही बीज आगे चलकर, एक बड़े टकराव में बदलेंगे। 1980-1990: जब जाति, सत्ता और अपराध ने मेरे भविष्य को घेर लिया 1980 का दशक मेरे लिए एक अंधेरी सुरंग जैसा था। जेपी आंदोलन की ऊर्जा अब राजनीति में बदल चुकी थी, लेकिन दिशा भटक गई थी। मेरी राजनीति अब विकास की नहीं, जाति की गणित की हो गई। नेताओं ने समाज को जोड़ने के बजाय, टुकड़ों में बांटना शुरू किया। मेरे गांवों में तनाव बढ़ने लगा। जातीय टकराव अब खुले संघर्ष में बदलने लगा। और इसी के साथ, अपराध ने मेरे भीतर अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दीं। अपहरण अब खबर नहीं, एक ‘इंडस्ट्री’ बन चुका था। व्यापारी, डॉक्टर, इंजीनियर हर कोई डर में जी रहा था। मेरे शहरों में एक अजीब सन्नाटा था, जो डर से पैदा हुआ था। राजनीति और अपराध का रिश्ता गहरा होता गया। गैंग लीडर चुनाव लड़ने लगे और नेता गैंग को संरक्षण देने लगे। बाहुबलियों का दौर शुरू हो चुका था। मैं खुद को पहचान नहीं पा रहा था। जिस मिट्टी ने कभी बुद्ध को जन्म दिया, वहां अब बंदूकें, तलवारें और हथियार बोल रहे थे। यह वो समय था जब मेरी छवि देश में बदलने लगी। लोग कहते थे, ‘बिहार मतलब खतरा।’ और मैं…चुपचाप यह सब देख रहा था। 1990-2000: लालू का दौर, जब मेरी जमीन खून से रंग गई 1990 में मेरे इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ आया। लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए। पिछड़ों को आवाज दी, लेकिन नफरत के आधार पर समाज बांट दिया। उन्होंने कहा, ‘भूरा बाल साफ करो’ और ‘सत्ता अब गरीब की है।’ यहां भूरा बाल का मतलब सवर्ण समाज की चार जातियों से था। लालू ने मेरे समाज के उस हिस्से को आवाज दी जो सदियों से दबा हुआ था। दलित, पिछड़े और वंचित तबका। इन्होंने पहली बार महसूस किया कि सत्ता उनकी भी हो सकती है। यह मेरे लिए गर्व का पल था। लेकिन, लालू राज में मेरी जमीन खून से रंग गई। 1996 में बथानी टोला, 1997 में लक्ष्मणपुर बाथे और 1999 में सेनारी जैसे कई नरसंहार हुए। गांवों में रात के अंधेरे में गोलियां चलती थीं। बच्चे, महिलाएं… कोई सुरक्षित नहीं। जातीय सेनाएं बन चुकी थीं। रणवीर सेना, नक्सली संगठन। जैसे हर कोई एक-दूसरे के खून का प्यासा हो। मैं युद्धभूमि बन गया था। कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज जमीन पर दिख नहीं रही थी। पुलिस कमजोर और अपराधी मजबूत बन गए थे। अपहरण, लूट और हत्या जैसे जघन्य वारदात आम हो गए थे। गांव हो या शहर अंधेरा होने के बाद लोग घर से निकलने से डरते थे। बेटा-बेटी के घर से निकलने के बाद लौटने तक मां-बाप का कलेजा कांपता रहता था। एक डर उनके जेहन में बनी रहता था कि सुरक्षित लौटेंगे न। यह दौर था जब देश ने मुझे एक नाम दिया- जंगलराज। मैं विरोधाभास बन चुका था। एक ओर सामाजिक न्याय की बात होती दूसरी ओर सामाजिक अराजकता हर कदम पर दिखाई देती। मैं टूट रहा था। 2000-2010: जब मैंने खुद को संभाला, कानून ने वापसी की

2000 में मैं बंट गया। झारखंड अलग हो गया। मेरी खनिज संपदा चली गई। तब लोगों ने कहा- ‘अब बिहार खत्म।’ लेकिन…, यहीं से मैंने खुद को फिर से बनाना शुरू किया। नीतीश कुमार सत्ता में आए। कहा, ‘अब कानून का राज होगा।’ और पहली बार मैंने कानून को वापस आते देखा। नीतीश के राज में पुलिस के हाथ बंधे नहीं थे। तेज एक्शन लेने की छूट थी। असर जमीन पर दिखा। सीना तानकर दनदनाते फिरने वाले बदमाश जान बचाने को छिपने लगे। अपराधियों की गिरफ्तारी हुई। स्पीडी ट्रायल चलाकर उन्हें उनके किए की सजा दिलाई गई। माफियाओं पर शिकंजा कसा। पुलिस ने उन खूंखार अपराधियों को जेल में डाला जो चंद माह पहले अपने इलाके में खुद की सरकार चला रहे थे। सबसे बड़ा नाम था मोहम्मद शहाबुद्दीन। वह नाम, जिसे सुनकर लोग कांपते थे। वह जेल में बंद हुआ। जेल में ही उसका अंत हो गया। यह सिर्फ एक मौत नहीं थी। एक संदेश था। नीतीश राज में बदलाव हुए। शहरों से लेकर गांव तक सड़कें बनीं। स्कूल खुले। विकास के काम हुए। मैं धीरे-धीरे डर के माहौल से बाहर निकल रहा था। 2010-2020: जब मैंने स्थिरता पाई, लेकिन सपने बड़े हो गए नीतीश के 5 साल के राज में मैं खड़ा हुआ। राजनीतिक स्थिरता पाई। अब लोगों के दिलों में डर नहीं, भविष्य की उम्मीदें थीं। उनके सपने बड़े हो गए थे। अब मुझे दौड़ना था। तभी बिहार की सियासत हिचकोले खाने लगी। कुर्सी के लिए पलटासन शुरू हो गया। सुशासन के प्रतीक बने नीतीश बाबू कभी लालू के साथ तो कभी वापस भाजपा के साथ सरकार चलाने लगे। इसका असर हुआ कि विकास की रफ्तार कुछ कम हुई और कुर्सी का खेल अधिक हुआ। नेता साल दर साल कुर्सी का जतन करते दिखे। हालांकि, मेरे गांवों में सड़क थी, घरों में बिजली। लड़कियां साइकिल से स्कूल जा रही थीं। यह नया बिहार था। अब मेरे बेटे-बेटी स्कूल-कॉलेज जा रहे थे। पढ़-लिख रहे थे। सवाल कर रहे थे, ‘नौकरी कहां है?’ 2020-2026: जब मैं डर से निकलकर विकास की कहानी लिख रहा हूं अब मैं बदल चुका हूं। मेरी पहचान अब अपराध नहीं, इंफ्रास्ट्रक्चर है। एक्सप्रेसवे, इंडस्ट्री, डिजिटल नेटवर्क, दिल्ली अब 10-12 घंटे दूर है। अब मेरे युवा बाहर जाने के बजाय, यहीं अवसर खोज रहे हैं। मैंने क्रांति, अराजकता, सुधार और विकास तक का लंबा सफर तय किया है। अब मैं एक नए मोड़ पर हूं। जहां मेरी कहानी डर की नहीं, संभावना की है। उम्मीदों की है। बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने की है। मैं बिहार हूं। मैंने अपने अंधेरे देखे हैं। इसलिए अब मेरी रोशनी और भी तेज होगी। मैं बिहार हूं… मेरी पहचान सिर्फ एक राज्य नहीं, एक सभ्यता है। मैंने महात्मा बुद्ध को ज्ञान दिया, चाणक्य को राजनीति सिखाई, आर्यभट्ट को आकाश मापने की समझ दी। मेरी मिट्टी में कभी नालंदा जलती थी- ज्ञान के दीपक की तरह और फिर एक दौर आया जब मेरे गांव जलने लगे नरसंहारों में। मैंने साम्राज्य देखे, गुलामी झेली, आजादी पाई… और फिर अपने ही लोगों के बीच टूट गया। मेरे नाम पर ‘जंगलराज’ भी लिखा गया और फिर ‘डेवलपमेंट मॉडल’ भी।
1912 में जन्मा…2026 तक एक लंबा सफर तय कर चुका हूं। दर्द, राजनीति, संघर्ष और बदलाव का सफर। यह कहानी है- मेरी, जहां हर दशक एक नया चेहरा लेकर आया। 114 वर्षों में बिहार कितना बदला, क्या-क्या सहा, कैसे-कैसे दाग झेले और फिर विकास की राह भी पकड़ी। पढ़िए, बिहार दिवस पर स्पेशल रिपोर्ट..। 1912-1920: जन्म तो हुआ, लेकिन पहचान अंग्रेजों के हाथ में थी मैं 22 मार्च 1912 को बना…। ब्रिटिश हुकूमत ने मुझे बंगाल से अलग कर दिया। नाम मिला-बिहार। लेकिन आत्मा अभी भी बंधी हुई थी। मेरी मिट्टी वही थी जहां कभी महात्मा बुद्ध ने शांति का संदेश दिया था, जहां चाणक्य ने राजनीति की रणनीति लिखी थी, जहां से ज्ञान की रोशनी पूरी दुनिया में गई थी। लेकिन अब… मेरे किसान नील की खेती करने को मजबूर थे। मेरे मजदूर शोषण झेल रहे थे। मेरे फैसले लंदन में लिखे जाते थे। गांवों में गरीबी थी, लेकिन अंदर एक बेचैनी भी थी। लोग पूछने लगे थे, ‘क्या हम सिर्फ हुक्म मानने के लिए बने हैं?’ मेरे शहरों में पढ़े-लिखे लोग उभर रहे थे, जो अंग्रेजी समझते थे… और अन्याय भी। यही वो दौर था जब, मेरी आत्मा ने पहली बार करवट ली। राजनीति अभी जनता तक नहीं पहुंची थी, लेकिन उसके बीज बोए जा चुके थे। मैं शांत था… लेकिन तूफान आने वाला था। 1920-1930: जब गांधी आए और मैंने अपनी आवाज पहचान ली अप्रैल 1917, मेरे जीवन का पहला बड़ा मोड़। चंपारण की मिट्टी पर एक आदमी आया, जिसे दुनिया बाद में महात्मा गांधी के नाम से जानती है। मेरे किसान टूट चुके थे। नील की खेती ने उन्हें गुलाम बना दिया था। गांधी ने कहा- ‘सत्य और अहिंसा से लड़ो।’ और पहली बार, मेरे गांवों ने डर को हराया। चंपारण सत्याग्रह सिर्फ आंदोलन नहीं था। यह मेरी आत्मा का पुनर्जन्म था। मेरे किसानों ने अंग्रेजों को चुनौती दी, मेरे युवाओं ने जेल जाना स्वीकार किया। अब राजनीति सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं थी, यह गांव-गांव पहुंच चुकी थी। हर चौपाल पर चर्चा थी, आजादी, अधिकार और सम्मान की। मैंने महसूस किया, यही मेरी आवाज है… और वह ताकतवर है। मैं अब सिर्फ एक प्रांत नहीं था। मैं एक आंदोलन बन चुका था। 1930-1940: क्रांति, जेल और आजादी की कीमत अब मैं जाग चुका था। 1930 का दशक मेरे लिए संघर्ष का दशक था। नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन, ब्रिटिश कानूनों का विरोध… अब मेरे लोग हर मोर्चे पर थे। मेरे गांवों में पुलिस आती थी, लोगों को पकड़ती थी, लेकिन डर खत्म हो चुका था। राजनीति अब बलिदान मांग रही थी। मेरे हजारों बेटे जेल गए, कई शहीद भी हुए। लेकिन मैं टूट नहीं रहा था, मैं मजबूत हो रहा था। मेरी पहचान अब साफ थी- मैं आजादी चाहता हूं। 1940-1950: आजादी मिली, लेकिन जिम्मेदारियों का बोझ भी 1947… देश आजाद हुआ। मैं भी आजाद हुआ। लेकिन आजादी के साथ मेरे सामने नई चुनौतियां भी आईं। मेरे पास युवाओं को नौकरी, रोजगार देने के लिए उद्योग नहीं थे, मेरे पास मजबूत अर्थव्यवस्था भी नहीं थी। मेरे लोग गरीब थे, भुखमरी का शिकार हो रहे थे। बहुत बड़ी आबादी ऐसी थी, जिसे दो टाइम भी खाना नसीब नहीं हो रहा था। और बड़ी बात ये कि सरकार भी नई थी। राजनीति, सत्ता अब अंग्रेजों के खिलाफ नहीं, बल्कि खुद को संभालने की थी। मैंने सीखा, आजादी सिर्फ जीत नहीं, जिम्मेदारी भी है। राज्य को संभालने की अपने लोगों के लिए सभी व्यवस्थाएं करने की और जीने की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की। 1950-1960: विकास की शुरुआत, लेकिन रफ्तार धीमी आजादी के बाद अब मैं खुद को बनाने की कोशिश कर रहा था। सरकार ने योजनाएं शुरू की, सिंचाई, स्कूल, स्वास्थ्य इन पर बातचीत और चिंतन तो शुरू हुआ, लेकिन सच यह था कि मैं अभी भी बहुत पिछड़ा था। राजनीति शुरू हो चुकी थी, लेकिन विकास धीमा था। भुखमरी और बेरोजगारी का असर ये हुआ कि मेरे लोग काम के लिए बाहर जाने लगे। पलायन शुरू हो चुका था। इसका दर्द मैं आज ही नहीं वर्षों पहले से झेल रहा हूं। हमने दिल्ली-मुंबई जैसे शहर अपने खून-पशीने से बनाए। 1960-1970: राजनीति बढ़ी, विकास पीछे रह गया अब राजनीति मजबूत हो रही थी। नेतृत्व बदल रहा था, लेकिन जमीन पर बदलाव कम था। मेरे गांव आज भी गरीब थे, मेरे शहर छोटे। मैं एक ऐसे मोड़ पर था, जहां दिशा साफ नहीं थी। छोटी-छोटी योजनाओं में भ्रष्टाचार शुरू हो चुका था। जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर और विकास योजनाओं के नाम पर नेताओं ने लड़ाई शुरू कर दी थी। भ्रष्टाचार ऐसे बढ़ रहा था मानो वो सभी को पीछे छोड़ देगा। मैं इस विषय पर देशभर में सबसे ज्यादा बदनाम होने लगा था। 1970-1980: जब मेरी सड़कों पर क्रांति उतरी और नए नेताओं का जन्म हुआ 1970 का दशक मेरे लिए उबाल का दशक था। मेरे भीतर गुस्सा जमा हो चुका था, भ्रष्टाचार के खिलाफ, बेरोजगारी के खिलाफ, उस व्यवस्था के खिलाफ जो आम आदमी को सिर्फ भीड़ समझती थी। फिर एक दिन मेरी सड़कों पर आवाज गूंजी ‘संपूर्ण क्रांति।’ यह आवाज थी जयप्रकाश नारायण की और मैं हिल गया। पटना से लेकर छोटे कस्बों तक छात्र, युवा, किसान… सब सड़कों पर थे। यह सिर्फ आंदोलन नहीं था। यह मेरे भीतर का विस्फोट था। इसी आंदोलन ने मुझे एक नई राजनीति दी। मेरी मिट्टी से कुछ नए राजनीतिक चेहरे उभरे। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान व इनके जैसे कई और युवा, क्रांतिकारी नेता। ये सिर्फ नेता नहीं थे। ये मेरे समाज की नई आकांक्षाओं के प्रतीक थे। पहली बार, मेरे गांवों के गरीब, पिछड़े, दलित लोग राजनीति में अपनी जगह देख रहे थे। लेकिन इस जागरण के साथ एक और चीज जन्म ले रही थी, पहचान की राजनीति। जाति अब सिर्फ सामाजिक व्यवस्था नहीं रही। वह राजनीतिक हथियार बन रही थी। मेरे समाज में छोटे-छोटे समूह बनने लगे। हर कोई अपनी पहचान के लिए लड़ रहा था। मैं गर्व और चिंता दोनों महसूस कर रहा था। एक तरफ मेरे लोग जाग रहे थे। दूसरी तरफ मैं धीरे-धीरे जातियों में, क्षेत्र में बंट रहा था। मुझे तब अंदाजा नहीं था, यही बीज आगे चलकर, एक बड़े टकराव में बदलेंगे। 1980-1990: जब जाति, सत्ता और अपराध ने मेरे भविष्य को घेर लिया 1980 का दशक मेरे लिए एक अंधेरी सुरंग जैसा था। जेपी आंदोलन की ऊर्जा अब राजनीति में बदल चुकी थी, लेकिन दिशा भटक गई थी। मेरी राजनीति अब विकास की नहीं, जाति की गणित की हो गई। नेताओं ने समाज को जोड़ने के बजाय, टुकड़ों में बांटना शुरू किया। मेरे गांवों में तनाव बढ़ने लगा। जातीय टकराव अब खुले संघर्ष में बदलने लगा। और इसी के साथ, अपराध ने मेरे भीतर अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दीं। अपहरण अब खबर नहीं, एक ‘इंडस्ट्री’ बन चुका था। व्यापारी, डॉक्टर, इंजीनियर हर कोई डर में जी रहा था। मेरे शहरों में एक अजीब सन्नाटा था, जो डर से पैदा हुआ था। राजनीति और अपराध का रिश्ता गहरा होता गया। गैंग लीडर चुनाव लड़ने लगे और नेता गैंग को संरक्षण देने लगे। बाहुबलियों का दौर शुरू हो चुका था। मैं खुद को पहचान नहीं पा रहा था। जिस मिट्टी ने कभी बुद्ध को जन्म दिया, वहां अब बंदूकें, तलवारें और हथियार बोल रहे थे। यह वो समय था जब मेरी छवि देश में बदलने लगी। लोग कहते थे, ‘बिहार मतलब खतरा।’ और मैं…चुपचाप यह सब देख रहा था। 1990-2000: लालू का दौर, जब मेरी जमीन खून से रंग गई 1990 में मेरे इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ आया। लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए। पिछड़ों को आवाज दी, लेकिन नफरत के आधार पर समाज बांट दिया। उन्होंने कहा, ‘भूरा बाल साफ करो’ और ‘सत्ता अब गरीब की है।’ यहां भूरा बाल का मतलब सवर्ण समाज की चार जातियों से था। लालू ने मेरे समाज के उस हिस्से को आवाज दी जो सदियों से दबा हुआ था। दलित, पिछड़े और वंचित तबका। इन्होंने पहली बार महसूस किया कि सत्ता उनकी भी हो सकती है। यह मेरे लिए गर्व का पल था। लेकिन, लालू राज में मेरी जमीन खून से रंग गई। 1996 में बथानी टोला, 1997 में लक्ष्मणपुर बाथे और 1999 में सेनारी जैसे कई नरसंहार हुए। गांवों में रात के अंधेरे में गोलियां चलती थीं। बच्चे, महिलाएं… कोई सुरक्षित नहीं। जातीय सेनाएं बन चुकी थीं। रणवीर सेना, नक्सली संगठन। जैसे हर कोई एक-दूसरे के खून का प्यासा हो। मैं युद्धभूमि बन गया था। कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज जमीन पर दिख नहीं रही थी। पुलिस कमजोर और अपराधी मजबूत बन गए थे। अपहरण, लूट और हत्या जैसे जघन्य वारदात आम हो गए थे। गांव हो या शहर अंधेरा होने के बाद लोग घर से निकलने से डरते थे। बेटा-बेटी के घर से निकलने के बाद लौटने तक मां-बाप का कलेजा कांपता रहता था। एक डर उनके जेहन में बनी रहता था कि सुरक्षित लौटेंगे न। यह दौर था जब देश ने मुझे एक नाम दिया- जंगलराज। मैं विरोधाभास बन चुका था। एक ओर सामाजिक न्याय की बात होती दूसरी ओर सामाजिक अराजकता हर कदम पर दिखाई देती। मैं टूट रहा था। 2000-2010: जब मैंने खुद को संभाला, कानून ने वापसी की

2000 में मैं बंट गया। झारखंड अलग हो गया। मेरी खनिज संपदा चली गई। तब लोगों ने कहा- ‘अब बिहार खत्म।’ लेकिन…, यहीं से मैंने खुद को फिर से बनाना शुरू किया। नीतीश कुमार सत्ता में आए। कहा, ‘अब कानून का राज होगा।’ और पहली बार मैंने कानून को वापस आते देखा। नीतीश के राज में पुलिस के हाथ बंधे नहीं थे। तेज एक्शन लेने की छूट थी। असर जमीन पर दिखा। सीना तानकर दनदनाते फिरने वाले बदमाश जान बचाने को छिपने लगे। अपराधियों की गिरफ्तारी हुई। स्पीडी ट्रायल चलाकर उन्हें उनके किए की सजा दिलाई गई। माफियाओं पर शिकंजा कसा। पुलिस ने उन खूंखार अपराधियों को जेल में डाला जो चंद माह पहले अपने इलाके में खुद की सरकार चला रहे थे। सबसे बड़ा नाम था मोहम्मद शहाबुद्दीन। वह नाम, जिसे सुनकर लोग कांपते थे। वह जेल में बंद हुआ। जेल में ही उसका अंत हो गया। यह सिर्फ एक मौत नहीं थी। एक संदेश था। नीतीश राज में बदलाव हुए। शहरों से लेकर गांव तक सड़कें बनीं। स्कूल खुले। विकास के काम हुए। मैं धीरे-धीरे डर के माहौल से बाहर निकल रहा था। 2010-2020: जब मैंने स्थिरता पाई, लेकिन सपने बड़े हो गए नीतीश के 5 साल के राज में मैं खड़ा हुआ। राजनीतिक स्थिरता पाई। अब लोगों के दिलों में डर नहीं, भविष्य की उम्मीदें थीं। उनके सपने बड़े हो गए थे। अब मुझे दौड़ना था। तभी बिहार की सियासत हिचकोले खाने लगी। कुर्सी के लिए पलटासन शुरू हो गया। सुशासन के प्रतीक बने नीतीश बाबू कभी लालू के साथ तो कभी वापस भाजपा के साथ सरकार चलाने लगे। इसका असर हुआ कि विकास की रफ्तार कुछ कम हुई और कुर्सी का खेल अधिक हुआ। नेता साल दर साल कुर्सी का जतन करते दिखे। हालांकि, मेरे गांवों में सड़क थी, घरों में बिजली। लड़कियां साइकिल से स्कूल जा रही थीं। यह नया बिहार था। अब मेरे बेटे-बेटी स्कूल-कॉलेज जा रहे थे। पढ़-लिख रहे थे। सवाल कर रहे थे, ‘नौकरी कहां है?’ 2020-2026: जब मैं डर से निकलकर विकास की कहानी लिख रहा हूं अब मैं बदल चुका हूं। मेरी पहचान अब अपराध नहीं, इंफ्रास्ट्रक्चर है। एक्सप्रेसवे, इंडस्ट्री, डिजिटल नेटवर्क, दिल्ली अब 10-12 घंटे दूर है। अब मेरे युवा बाहर जाने के बजाय, यहीं अवसर खोज रहे हैं। मैंने क्रांति, अराजकता, सुधार और विकास तक का लंबा सफर तय किया है। अब मैं एक नए मोड़ पर हूं। जहां मेरी कहानी डर की नहीं, संभावना की है। उम्मीदों की है। बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने की है। मैं बिहार हूं। मैंने अपने अंधेरे देखे हैं। इसलिए अब मेरी रोशनी और भी तेज होगी।  

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