पहले इन स्कूलों के नाम पढ़िए 1. मध्य विद्यालय तुलसीपुर, यादव टोला, भागलपुर 2. प्राथमिक विद्यालय रूकनपुरा (मुसहरी), पटना 3. प्राथमिक विद्यालय रुपसपुर हरिजन टोला, पटना दरअसल, ये बिहार सरकार के स्कूल के नाम हैं। जो जाति से जुड़े हुए हैं। इनमें सभी समाज के बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन नाम ऐसा कि एक ही जाति दर्शाती है। मानों इनमें किसी एक जाति या समाज के बच्चे ही पढ़ते हैं। कई बार तो बच्चे उस स्कूल का नाम बताते हुए भी संकोच करते हैं। वे पूरा नाम बताने की बजाए सिर्फ गांव का नाम बता देते हैं। जैसे–रूपसपुर स्कूल, तुलसीपुर स्कूल आदि। स्कूल के नाम में जातिसूचक शब्द किस तरह जुड़े? क्या वजह थी? अब सरकार क्या करने जा रही है? स्कूलों के नए नाम कैसे होंगे? क्या फायदा होगा? पढ़िए रिपोर्ट…। स्कूल के नाम में जाति वाले शब्द से बच्चों पर पड़ता है खराब असर पटना के रुपसपुर में जातिसूचक नाम वाला स्कूल (प्राथमिक विद्यालय रुपसपुर हरिजन टोला) है। हमने यहां के लोगों से स्कूल के नाम को लेकर बात की। कुमार चंदन रवि ने कहा, ‘इस तरह के नाम से बच्चों के दिमाग पर खराब असर पड़ता है। उनके मन में जाति वाली फिलिंग आती है। सरकार यदि इसकी जगह स्वतंत्रता सेनानी, गांव से वीर शहीदों आदि के नाम पर स्कूल का नाम रखे तो सराहनीय पहल होगी। बच्चों को जाति वाली भावना इन स्कूल से ही आनी शुरू हो जाती है।’ स्कूलों को कैसे मिले जातिसूचक नाम? बिहार में बड़ी संख्या में ऐसे सरकारी स्कूल हैं, जिनके नाम में जातिसूचक शब्द हैं। जैसे- डोम टोला, मुसहरी टोला, पासवान टोला, पंडित टोला, भूमिहार टोला, ब्राह्मण टोला, यादव टोला और मोची टोला। शिक्षाविद डॉ. लक्ष्मीकांत सजल जाति से जोड़कर स्कूलों के नाम रखे जाने के पीछे की वजह स्थानीय आबादी बताते हैं। स्कूल के आसपास जिस जाति के लोगों की संख्या ज्यादा थी, स्कूल के नाम भी उसी जाति से जोड़कर रख दिए गए। गांव में टोला के नाम जाति से जोड़कर रखे जाने का चलन है। टोला में सरकारी स्कूल खुले तो उसके नाम में भी जातिसूचक शब्द आ गए। जैसे यादव टोला में स्कूल खुला तो उसके नाम में यादव टोला जुड़ गया। लक्ष्मीकांत बताते हैं कि ऐसे नामकरण के पीछे सरकार नहीं, स्थानीय लोग थे। समुदाय ने स्कूल का नाम जाति से जोड़कर लिखा। हरिजन स्कूल नामकरण के पीछे है अलग कहानी आज बिहार में जिन स्कूलों के नाम में आप अनुसूचित जाति शब्द देखते हैं, संभव है पहले वे हरिजन स्कूल के नाम से जाने जाते हों। बिहार सरकार ने हर 5 km के दायरे में एक हाईस्कूल, 3 km में एक मिडिल स्कूल और 1 km में एक प्राइमरी स्कूल खोलने का फैसला किया था। शिक्षा विभाग के अनुसार सरकार के इस फैसले के आधार पर स्कूल खोले गए, लेकिन कई जगह यह परेशानी आई कि स्कूल दलित बस्ती से दूर थे, जिसके चलते इस समाज के कम बच्चे पढ़ने जाते थे। इस परेशानी को दूर करने के लिए सरकार ने ऐसे दलित बस्ती के पास स्कूल खोले। डॉ. लक्ष्मीकांत सजल बताते हैं, ‘जिस समय इन स्कूलों को नाम दिए जा रहे थे, उस वक्त अनुसूचित जाति शब्द प्रयोग में नहीं था। हरिजन शब्द प्रचलन में था। इसलिए स्कूलों का नाम हरिजन विद्यालय रखा गया।’ मौजूदा वक्त में इन स्कूलों के नाम बदलकर अनुसूचित जाति विद्यालय कर दिए गए हैं। शिक्षा विभाग ने आदेश जारी कर जातिसूचक (हरिजन) शब्द बदला था। जातिसूचक शब्द हटाकर क्या होगा स्कूलों का नया नाम? बिहार सरकार स्कूलों के नाम से जातिसूचक और अन्य अजीबो-गरीब शब्द (जैसे झुग्गी-झोपड़ी टोला, पूरब टोला, पश्चिम टोला, दक्षिण टोला) जैसे शब्द हटाने जा रही है। इसके लिए काम शुरू हो गया है। विभाग के स्थापना शाखा ने पूरी तैयारी कर ली है। सीएम की मंजूरी के बाद स्कूलों के नाम बदले जाएंगे। बिहार के सभी स्कूल एक अंब्रेला के नीचे आ जाएंगे। बिहार सरकार सभी स्कूल (बुनियादी समेत) का नाम राजकीय करने जा रही है। सभी स्कूलों के नाम का पहला शब्द राजकीय होगा। इसके बाद गांव का नाम, जिस व्यक्ति ने जमीन दी उसका नाम, उस गांव से कोई व्यक्ति शहीद हुए हों तो उनका नाम जोड़ा जा सकता है। मौजूदा शिक्षा मंत्री को स्कूलों के नए नाम पसंद आए हैं। राजकीय शब्द प्राइमरी से लेकर 10+2 तक के स्कूलों में प्रयोग किया जाएगा। सभी स्कूल एक अंब्रेला में लाने से क्या फायदा होगा? शिक्षा विभाग के मुताबिक, इस समय अलग-अलग तरह के स्कूलों का प्रबंधन भिन्न-भिन्न तरीके से हो रहा है। स्कूलों की आधारभूत संरचना, सुविधाएं आदि तैयार करने के लिए अलग-अलग स्तर पर काम और योजना राशि उपलब्ध करानी होती है। स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती भी स्कूलवार है। टीचर कैडर भी अनेक तरह के हैं। उनका संचालन डिफरेंट है। बिहार सरकार के स्कूलों की 10 कैटेगरी हैं। अब इन सबको मिलाकर एक कैटेगरी राजकीय में रखा जाएगा। इससे अलग-अलग तरह के स्कूलों को मैनेज करने के लिए अलग-अलग तरीके की योजनाएं चलाने और संसाधन लगाने की जरूरत नहीं रह जाएगी। बीपीएससी से बहाल टीचर प्रत्येक स्कूल में पोस्ट किए जाएंगे। सभी स्कूलों के लिए एक मापदंड होगा। शिक्षा विभाग के अधिकारी नाम नहीं छापने के शर्त पर कहते हैं कि सभी सरकारी स्कूलों को एक कैटेगरी राजकीय के तहत लाने से सरकार का काम आसान होगा। सरकारी योजनाओं का लाभ स्कूलों तक पहुंचाने में तेजी आएगी। बड़े ताम-झाम से छुटकारा मिलेगा। क्या है राजकीय का मतलब? राजकीय का अर्थ राज्य सरकार से होता है। सरल शब्दों में ‘राजकीय’ मतलब ‘सरकार या शासन’ है। राजकीय स्कूल का संचालन सीधे सरकार द्वारा किया जाता है। सभी स्कूलों के नाम में राजकीय शब्द पहले लाने का उद्देश्य लोगों को बताना है कि इन्हें सरकारी पैसे से चलाया जा रहा है। अभी बिहार में चल रहे 10 तरह के सरकारी स्कूल 1. प्राथमिक विद्यालय: इन स्कूलों में क्लास 1 से 5वीं तक पढ़ाई होती है। आमतौर पर 6 से 11 साल के बच्चे पढ़ते हैं। बच्चों को पढ़ना, लिखना और बुनियादी गणित (अंकगणित) सिखाए जाते हैं। भाषा (हिंदी, अंग्रेजी), गणित, पर्यावरण अध्ययन (EVS) और सामाजिक कौशल का ज्ञान दिया जाता है। 2.मध्य विद्यालय: इसे ‘उच्च प्राथमिक विद्यालय भी कहा जाता है। क्लास 6 से 8 तक पढ़ाई होती है। आमतौर पर 11 से 14 साल के किशोर यहां पढ़ाई करते हैं। इन स्कूलों में छात्र विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और भाषाओं (जैसे संस्कृत या क्षेत्रीय भाषा) की पढ़ाई करते हैं। 3. राजकीय बुनियादी विद्यालय: ये स्कूल महात्मा गांधी की ‘बुनियादी शिक्षा’ की अवधारणा पर आधारित हैं। इन्हें गांधीवादी सिद्धांतों के अनुरूप बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्थापित किया गया था। इसकी स्थापना महात्मा गांधी ने पहली बार 1939 में पश्चिम चंपारण जिले के वृंदावन गांव में की थी। ये विद्यालय पूर्णतः राज्य सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा मैनेज किए जाते हैं। सभी खर्च सरकार उठाती है। 4. राजकीय उच्च विद्यालय: इन स्कूलों की स्थापना बिहार सरकार ने की है। यहां क्लास 9 और 10 के बच्चे पढ़ते हैं। इसे ‘हाई स्कूल’ या ‘सेकेंडरी स्कूल’ भी कहा जाता है। आमतौर पर 14 से 16 साल के छात्र यहां पढ़ते हैं। 10वीं की क्लास पूरी करने के बाद वे मैट्रिक की परीक्षा देते हैं। 5.राजकीय कृत उच्च विद्यालय: ये वे स्कूल हैं, जिनकी स्थापना शुरुआत में स्थानीय लोगों, दानदाताओं या निजी समितियों द्वारा की गई थी। बाद में सरकार ने 1980 के राजकीयकरण अधिनियम के तहत इन प्राइवेट स्कूलों को टेक ओवर किया। शिक्षकों से वेतन से लेकर स्कूल के जुड़े सभी खर्च राज्य सरकार करती है। 6. उच्च माध्यमिक विद्यालय: यहां 11वीं और 12वीं क्लास के बच्चे पढ़ते हैं। इन्हें प्लस टू या इंटरमीडिएट स्कूल भी कहा जाता है। छात्र आमतौर पर 16 से 18 साल के होते हैं। इंटर में छात्र अपनी रुचि से साइंस, आर्ट्स या कॉमर्स की पढ़ाई कर सकते हैं।
7. राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय: यह पूरी तरह से राज्य सरकार द्वारा संचालित होता है। प्लस टू स्कूल या इंटरमीडिएट स्कूल भी कहा जाता है। ऐसे स्कूलों में व्यवस्था काफी मजबूत है। राजकीय स्कूल की स्थापना बिहार सरकार ने की थी। यहां क्लास 1 से 12 या 9 से 12 तक की पढ़ाई होती है। मुख्य फोकस 11वीं और 12वीं पर होता है। शिक्षकों की नियुक्ति, वेतन और स्कूल का सारा खर्च राज्य सरकार उठाती है। 8. उक्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय: ये वो सरकारी स्कूल हैं, जिन्हें सरकार ने छात्रों की सुविधा के लिए अपग्रेड किया है। यहां 12वीं तक की पढ़ाई होती है। बिहार सरकार की योजना है कि हर पंचायत में कम से कम एक 10+2 (इंटर) स्कूल हो। जिन पंचायतों में हाईस्कूल नहीं थे, वहां के मिडिल स्कूलों को अपग्रेड कर उक्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय बनाया गया। यहां 9वीं से 12वीं तक की पढ़ाई शुरू की गई। यहां अब क्लास 1 से 12 तक की पढ़ाई होती है। ऐसे में इस स्कूल के बच्चों को इंटर तक किसी दूसरे स्कूल में जाना नहीं पड़ता है। 9. आदर्श विद्यालय: ये वो सरकारी स्कूल हैं जिन्हें ‘रोल मॉडल’ के रूप में विकसित किया गया है। ये सरकार द्वारा संचालित ‘सुपर स्कूल’ हैं। इनमें सामान्य सरकारी स्कूलों की तुलना में बेहतर संसाधनों से लैस किया गया है। यहां स्मार्ट क्लासरूम, कंप्यूटर लैब, आधुनिक विज्ञान प्रयोगशाला और एक बड़ी लाइब्रेरी होती है। यहां विशेष रूप से प्रशिक्षित शिक्षक होते हैं। पढ़ाई के साथ-साथ कौशल विकास पर जोर दिया जाता है। खेलकूद, संगीत, कला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए विशेष संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। 10. प्रोजेक्ट स्कूल: इन स्कूलों को 1980 के दशक में खोला गया था। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में क्षेत्रीय असमानता दूर करना और पिछड़े इलाकों में अच्छी शिक्षा पहुंचाना था। यह स्कूल उन प्रखंडों में खोला गया था जहां हाईस्कूल नहीं थे। इसमें विशेष रूप से बालिका शिक्षा पर जोर दिया गया था। 1981-82 और 1984-85 के दौरान ‘प्रोजेक्ट योजना’ के तहत बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल खोले गए थे। शुरुआत में ये स्कूल एक ‘प्रोजेक्ट’ के रूप में शुरू हुए थे, लेकिन बाद में सरकार ने इन्हें पूरी तरह राजकीय घोषित कर दिया। इनके शिक्षकों का वेतन और प्रबंधन पूरी तरह सरकार के हाथ में है। अधिकांश प्रोजेक्ट स्कूल ‘प्रोजेक्ट कन्या उच्च विद्यालय’ के नाम से जाने जाते हैं। इन्हें ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों को मैट्रिक तक की पढ़ाई की सुविधा देने के लिए खोला गया था। पहले इन स्कूलों के नाम पढ़िए 1. मध्य विद्यालय तुलसीपुर, यादव टोला, भागलपुर 2. प्राथमिक विद्यालय रूकनपुरा (मुसहरी), पटना 3. प्राथमिक विद्यालय रुपसपुर हरिजन टोला, पटना दरअसल, ये बिहार सरकार के स्कूल के नाम हैं। जो जाति से जुड़े हुए हैं। इनमें सभी समाज के बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन नाम ऐसा कि एक ही जाति दर्शाती है। मानों इनमें किसी एक जाति या समाज के बच्चे ही पढ़ते हैं। कई बार तो बच्चे उस स्कूल का नाम बताते हुए भी संकोच करते हैं। वे पूरा नाम बताने की बजाए सिर्फ गांव का नाम बता देते हैं। जैसे–रूपसपुर स्कूल, तुलसीपुर स्कूल आदि। स्कूल के नाम में जातिसूचक शब्द किस तरह जुड़े? क्या वजह थी? अब सरकार क्या करने जा रही है? स्कूलों के नए नाम कैसे होंगे? क्या फायदा होगा? पढ़िए रिपोर्ट…। स्कूल के नाम में जाति वाले शब्द से बच्चों पर पड़ता है खराब असर पटना के रुपसपुर में जातिसूचक नाम वाला स्कूल (प्राथमिक विद्यालय रुपसपुर हरिजन टोला) है। हमने यहां के लोगों से स्कूल के नाम को लेकर बात की। कुमार चंदन रवि ने कहा, ‘इस तरह के नाम से बच्चों के दिमाग पर खराब असर पड़ता है। उनके मन में जाति वाली फिलिंग आती है। सरकार यदि इसकी जगह स्वतंत्रता सेनानी, गांव से वीर शहीदों आदि के नाम पर स्कूल का नाम रखे तो सराहनीय पहल होगी। बच्चों को जाति वाली भावना इन स्कूल से ही आनी शुरू हो जाती है।’ स्कूलों को कैसे मिले जातिसूचक नाम? बिहार में बड़ी संख्या में ऐसे सरकारी स्कूल हैं, जिनके नाम में जातिसूचक शब्द हैं। जैसे- डोम टोला, मुसहरी टोला, पासवान टोला, पंडित टोला, भूमिहार टोला, ब्राह्मण टोला, यादव टोला और मोची टोला। शिक्षाविद डॉ. लक्ष्मीकांत सजल जाति से जोड़कर स्कूलों के नाम रखे जाने के पीछे की वजह स्थानीय आबादी बताते हैं। स्कूल के आसपास जिस जाति के लोगों की संख्या ज्यादा थी, स्कूल के नाम भी उसी जाति से जोड़कर रख दिए गए। गांव में टोला के नाम जाति से जोड़कर रखे जाने का चलन है। टोला में सरकारी स्कूल खुले तो उसके नाम में भी जातिसूचक शब्द आ गए। जैसे यादव टोला में स्कूल खुला तो उसके नाम में यादव टोला जुड़ गया। लक्ष्मीकांत बताते हैं कि ऐसे नामकरण के पीछे सरकार नहीं, स्थानीय लोग थे। समुदाय ने स्कूल का नाम जाति से जोड़कर लिखा। हरिजन स्कूल नामकरण के पीछे है अलग कहानी आज बिहार में जिन स्कूलों के नाम में आप अनुसूचित जाति शब्द देखते हैं, संभव है पहले वे हरिजन स्कूल के नाम से जाने जाते हों। बिहार सरकार ने हर 5 km के दायरे में एक हाईस्कूल, 3 km में एक मिडिल स्कूल और 1 km में एक प्राइमरी स्कूल खोलने का फैसला किया था। शिक्षा विभाग के अनुसार सरकार के इस फैसले के आधार पर स्कूल खोले गए, लेकिन कई जगह यह परेशानी आई कि स्कूल दलित बस्ती से दूर थे, जिसके चलते इस समाज के कम बच्चे पढ़ने जाते थे। इस परेशानी को दूर करने के लिए सरकार ने ऐसे दलित बस्ती के पास स्कूल खोले। डॉ. लक्ष्मीकांत सजल बताते हैं, ‘जिस समय इन स्कूलों को नाम दिए जा रहे थे, उस वक्त अनुसूचित जाति शब्द प्रयोग में नहीं था। हरिजन शब्द प्रचलन में था। इसलिए स्कूलों का नाम हरिजन विद्यालय रखा गया।’ मौजूदा वक्त में इन स्कूलों के नाम बदलकर अनुसूचित जाति विद्यालय कर दिए गए हैं। शिक्षा विभाग ने आदेश जारी कर जातिसूचक (हरिजन) शब्द बदला था। जातिसूचक शब्द हटाकर क्या होगा स्कूलों का नया नाम? बिहार सरकार स्कूलों के नाम से जातिसूचक और अन्य अजीबो-गरीब शब्द (जैसे झुग्गी-झोपड़ी टोला, पूरब टोला, पश्चिम टोला, दक्षिण टोला) जैसे शब्द हटाने जा रही है। इसके लिए काम शुरू हो गया है। विभाग के स्थापना शाखा ने पूरी तैयारी कर ली है। सीएम की मंजूरी के बाद स्कूलों के नाम बदले जाएंगे। बिहार के सभी स्कूल एक अंब्रेला के नीचे आ जाएंगे। बिहार सरकार सभी स्कूल (बुनियादी समेत) का नाम राजकीय करने जा रही है। सभी स्कूलों के नाम का पहला शब्द राजकीय होगा। इसके बाद गांव का नाम, जिस व्यक्ति ने जमीन दी उसका नाम, उस गांव से कोई व्यक्ति शहीद हुए हों तो उनका नाम जोड़ा जा सकता है। मौजूदा शिक्षा मंत्री को स्कूलों के नए नाम पसंद आए हैं। राजकीय शब्द प्राइमरी से लेकर 10+2 तक के स्कूलों में प्रयोग किया जाएगा। सभी स्कूल एक अंब्रेला में लाने से क्या फायदा होगा? शिक्षा विभाग के मुताबिक, इस समय अलग-अलग तरह के स्कूलों का प्रबंधन भिन्न-भिन्न तरीके से हो रहा है। स्कूलों की आधारभूत संरचना, सुविधाएं आदि तैयार करने के लिए अलग-अलग स्तर पर काम और योजना राशि उपलब्ध करानी होती है। स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती भी स्कूलवार है। टीचर कैडर भी अनेक तरह के हैं। उनका संचालन डिफरेंट है। बिहार सरकार के स्कूलों की 10 कैटेगरी हैं। अब इन सबको मिलाकर एक कैटेगरी राजकीय में रखा जाएगा। इससे अलग-अलग तरह के स्कूलों को मैनेज करने के लिए अलग-अलग तरीके की योजनाएं चलाने और संसाधन लगाने की जरूरत नहीं रह जाएगी। बीपीएससी से बहाल टीचर प्रत्येक स्कूल में पोस्ट किए जाएंगे। सभी स्कूलों के लिए एक मापदंड होगा। शिक्षा विभाग के अधिकारी नाम नहीं छापने के शर्त पर कहते हैं कि सभी सरकारी स्कूलों को एक कैटेगरी राजकीय के तहत लाने से सरकार का काम आसान होगा। सरकारी योजनाओं का लाभ स्कूलों तक पहुंचाने में तेजी आएगी। बड़े ताम-झाम से छुटकारा मिलेगा। क्या है राजकीय का मतलब? राजकीय का अर्थ राज्य सरकार से होता है। सरल शब्दों में ‘राजकीय’ मतलब ‘सरकार या शासन’ है। राजकीय स्कूल का संचालन सीधे सरकार द्वारा किया जाता है। सभी स्कूलों के नाम में राजकीय शब्द पहले लाने का उद्देश्य लोगों को बताना है कि इन्हें सरकारी पैसे से चलाया जा रहा है। अभी बिहार में चल रहे 10 तरह के सरकारी स्कूल 1. प्राथमिक विद्यालय: इन स्कूलों में क्लास 1 से 5वीं तक पढ़ाई होती है। आमतौर पर 6 से 11 साल के बच्चे पढ़ते हैं। बच्चों को पढ़ना, लिखना और बुनियादी गणित (अंकगणित) सिखाए जाते हैं। भाषा (हिंदी, अंग्रेजी), गणित, पर्यावरण अध्ययन (EVS) और सामाजिक कौशल का ज्ञान दिया जाता है। 2.मध्य विद्यालय: इसे ‘उच्च प्राथमिक विद्यालय भी कहा जाता है। क्लास 6 से 8 तक पढ़ाई होती है। आमतौर पर 11 से 14 साल के किशोर यहां पढ़ाई करते हैं। इन स्कूलों में छात्र विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और भाषाओं (जैसे संस्कृत या क्षेत्रीय भाषा) की पढ़ाई करते हैं। 3. राजकीय बुनियादी विद्यालय: ये स्कूल महात्मा गांधी की ‘बुनियादी शिक्षा’ की अवधारणा पर आधारित हैं। इन्हें गांधीवादी सिद्धांतों के अनुरूप बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्थापित किया गया था। इसकी स्थापना महात्मा गांधी ने पहली बार 1939 में पश्चिम चंपारण जिले के वृंदावन गांव में की थी। ये विद्यालय पूर्णतः राज्य सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा मैनेज किए जाते हैं। सभी खर्च सरकार उठाती है। 4. राजकीय उच्च विद्यालय: इन स्कूलों की स्थापना बिहार सरकार ने की है। यहां क्लास 9 और 10 के बच्चे पढ़ते हैं। इसे ‘हाई स्कूल’ या ‘सेकेंडरी स्कूल’ भी कहा जाता है। आमतौर पर 14 से 16 साल के छात्र यहां पढ़ते हैं। 10वीं की क्लास पूरी करने के बाद वे मैट्रिक की परीक्षा देते हैं। 5.राजकीय कृत उच्च विद्यालय: ये वे स्कूल हैं, जिनकी स्थापना शुरुआत में स्थानीय लोगों, दानदाताओं या निजी समितियों द्वारा की गई थी। बाद में सरकार ने 1980 के राजकीयकरण अधिनियम के तहत इन प्राइवेट स्कूलों को टेक ओवर किया। शिक्षकों से वेतन से लेकर स्कूल के जुड़े सभी खर्च राज्य सरकार करती है। 6. उच्च माध्यमिक विद्यालय: यहां 11वीं और 12वीं क्लास के बच्चे पढ़ते हैं। इन्हें प्लस टू या इंटरमीडिएट स्कूल भी कहा जाता है। छात्र आमतौर पर 16 से 18 साल के होते हैं। इंटर में छात्र अपनी रुचि से साइंस, आर्ट्स या कॉमर्स की पढ़ाई कर सकते हैं।
7. राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय: यह पूरी तरह से राज्य सरकार द्वारा संचालित होता है। प्लस टू स्कूल या इंटरमीडिएट स्कूल भी कहा जाता है। ऐसे स्कूलों में व्यवस्था काफी मजबूत है। राजकीय स्कूल की स्थापना बिहार सरकार ने की थी। यहां क्लास 1 से 12 या 9 से 12 तक की पढ़ाई होती है। मुख्य फोकस 11वीं और 12वीं पर होता है। शिक्षकों की नियुक्ति, वेतन और स्कूल का सारा खर्च राज्य सरकार उठाती है। 8. उक्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय: ये वो सरकारी स्कूल हैं, जिन्हें सरकार ने छात्रों की सुविधा के लिए अपग्रेड किया है। यहां 12वीं तक की पढ़ाई होती है। बिहार सरकार की योजना है कि हर पंचायत में कम से कम एक 10+2 (इंटर) स्कूल हो। जिन पंचायतों में हाईस्कूल नहीं थे, वहां के मिडिल स्कूलों को अपग्रेड कर उक्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय बनाया गया। यहां 9वीं से 12वीं तक की पढ़ाई शुरू की गई। यहां अब क्लास 1 से 12 तक की पढ़ाई होती है। ऐसे में इस स्कूल के बच्चों को इंटर तक किसी दूसरे स्कूल में जाना नहीं पड़ता है। 9. आदर्श विद्यालय: ये वो सरकारी स्कूल हैं जिन्हें ‘रोल मॉडल’ के रूप में विकसित किया गया है। ये सरकार द्वारा संचालित ‘सुपर स्कूल’ हैं। इनमें सामान्य सरकारी स्कूलों की तुलना में बेहतर संसाधनों से लैस किया गया है। यहां स्मार्ट क्लासरूम, कंप्यूटर लैब, आधुनिक विज्ञान प्रयोगशाला और एक बड़ी लाइब्रेरी होती है। यहां विशेष रूप से प्रशिक्षित शिक्षक होते हैं। पढ़ाई के साथ-साथ कौशल विकास पर जोर दिया जाता है। खेलकूद, संगीत, कला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए विशेष संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। 10. प्रोजेक्ट स्कूल: इन स्कूलों को 1980 के दशक में खोला गया था। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में क्षेत्रीय असमानता दूर करना और पिछड़े इलाकों में अच्छी शिक्षा पहुंचाना था। यह स्कूल उन प्रखंडों में खोला गया था जहां हाईस्कूल नहीं थे। इसमें विशेष रूप से बालिका शिक्षा पर जोर दिया गया था। 1981-82 और 1984-85 के दौरान ‘प्रोजेक्ट योजना’ के तहत बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल खोले गए थे। शुरुआत में ये स्कूल एक ‘प्रोजेक्ट’ के रूप में शुरू हुए थे, लेकिन बाद में सरकार ने इन्हें पूरी तरह राजकीय घोषित कर दिया। इनके शिक्षकों का वेतन और प्रबंधन पूरी तरह सरकार के हाथ में है। अधिकांश प्रोजेक्ट स्कूल ‘प्रोजेक्ट कन्या उच्च विद्यालय’ के नाम से जाने जाते हैं। इन्हें ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों को मैट्रिक तक की पढ़ाई की सुविधा देने के लिए खोला गया था।


