केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने आज बेगूसराय में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जमकर तारीफ की। उन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल के बाद देश का दूसरा लौह पुरुष कहा। कहा कि अमित शाह ने उग्रवाद को खत्म किया, कश्मीर से धारा- 370 हटाया, अब घुसपैठियों को हटाएंगे। गिरिराज सिंह ने कहा कि अमित शाह ने गृह मंत्री के रूप में ऐतिहासिक काम किए हैं, जो दशकों से लंबित थे। उन्होंने कहा कि अमित शाह ने जो कहा, वो करके दिखाया। उन्होंने देश से उग्रवाद की समाप्ति का बीड़ा उठाया और उसमें सफलता पाई। धारा 370 को हटाकर उन्होंने कश्मीर को मुख्यधारा में शामिल किया। यह काम किसी भी अन्य नेता के लिए नामुमकिन सा लगता था। अमित शाह के तीन दिवसीय दौरे का मुख्य उद्देश्य सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करना और घुसपैठियों पर लगाम लगाना है। उन्होंने सीधे तौर पर बिहार और पश्चिम बंगाल का जिक्र करते हुए कहा कि अब अमित शाह का एकमात्र लक्ष्य इन राज्यों से घुसपैठियों को चुन-चुनकर बाहर निकालना है। कूटनीतिक कमजोरी ने भारत का भूगोल बदल दिया गिरिराज सिंह ने घुसपैठ की समस्या को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि चाहे बिहार हो या बंगाल, घुसपैठिये देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। खासकर घुसपैठिये मुसलमान देश के आंतरिक सौहार्द और सुरक्षा तंत्र के लिए चुनौती हैं। गृह मंत्री की अब इन पर पैनी नजर है और जल्द ही इन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। इसके साथ ही गिरिराज सिंह ने बगैर नाम लिए कांग्रेस और पंडित जवाहरलाल नेहरू पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति की कूटनीतिक कमजोरी ने भारत का भूगोल बदल दिया और इसे दूरदर्शिता का नाम दिया गया। तिब्बत हाथ से गया, अक्साई चीन पर कब्जा हुआ, बरुबरी समझौते में छोड़ा गया, कच्छ में झुकाव दिखा, कश्मीर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उलझा। नदियों के प्रवाह पर बड़े समझौते हुए। UNSC की स्थायी सीट का अवसर ठुकराया गया। नेताजी की धरोहर पर सवाल उठे, लेकिन जवाब नहीं आए और फिर दशकों तक सत्ता एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटी रही। संस्थाएं व्यक्ति केंद्रित होती गई, निर्णय राष्ट्र से अधिक परिवार के हितों के इर्द-गिर्द घूमते रहे।
राष्ट्र को समझौतों की राह पर धकेला गया कहा कि जहां लोकतंत्र के नाम पर ताज एक ही खानदान के सिर सजता रहा और देश बार-बार समझौतों की कीमत चुकाता रहा। कुर्सी बचाने की राजनीति ने राष्ट्रहित को गिरवी रखा। फैसले परिवार केंद्रित रहे और भारत अपनी अपार संभावनाओं के बावजूद बंधा रहा। सत्ता एक ही परिवार के पास बनी रहे, इसके लिए पूरे राष्ट्र को समझौतों की राह पर धकेला गया। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने आज बेगूसराय में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जमकर तारीफ की। उन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल के बाद देश का दूसरा लौह पुरुष कहा। कहा कि अमित शाह ने उग्रवाद को खत्म किया, कश्मीर से धारा- 370 हटाया, अब घुसपैठियों को हटाएंगे। गिरिराज सिंह ने कहा कि अमित शाह ने गृह मंत्री के रूप में ऐतिहासिक काम किए हैं, जो दशकों से लंबित थे। उन्होंने कहा कि अमित शाह ने जो कहा, वो करके दिखाया। उन्होंने देश से उग्रवाद की समाप्ति का बीड़ा उठाया और उसमें सफलता पाई। धारा 370 को हटाकर उन्होंने कश्मीर को मुख्यधारा में शामिल किया। यह काम किसी भी अन्य नेता के लिए नामुमकिन सा लगता था। अमित शाह के तीन दिवसीय दौरे का मुख्य उद्देश्य सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करना और घुसपैठियों पर लगाम लगाना है। उन्होंने सीधे तौर पर बिहार और पश्चिम बंगाल का जिक्र करते हुए कहा कि अब अमित शाह का एकमात्र लक्ष्य इन राज्यों से घुसपैठियों को चुन-चुनकर बाहर निकालना है। कूटनीतिक कमजोरी ने भारत का भूगोल बदल दिया गिरिराज सिंह ने घुसपैठ की समस्या को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि चाहे बिहार हो या बंगाल, घुसपैठिये देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। खासकर घुसपैठिये मुसलमान देश के आंतरिक सौहार्द और सुरक्षा तंत्र के लिए चुनौती हैं। गृह मंत्री की अब इन पर पैनी नजर है और जल्द ही इन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। इसके साथ ही गिरिराज सिंह ने बगैर नाम लिए कांग्रेस और पंडित जवाहरलाल नेहरू पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति की कूटनीतिक कमजोरी ने भारत का भूगोल बदल दिया और इसे दूरदर्शिता का नाम दिया गया। तिब्बत हाथ से गया, अक्साई चीन पर कब्जा हुआ, बरुबरी समझौते में छोड़ा गया, कच्छ में झुकाव दिखा, कश्मीर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उलझा। नदियों के प्रवाह पर बड़े समझौते हुए। UNSC की स्थायी सीट का अवसर ठुकराया गया। नेताजी की धरोहर पर सवाल उठे, लेकिन जवाब नहीं आए और फिर दशकों तक सत्ता एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटी रही। संस्थाएं व्यक्ति केंद्रित होती गई, निर्णय राष्ट्र से अधिक परिवार के हितों के इर्द-गिर्द घूमते रहे।
राष्ट्र को समझौतों की राह पर धकेला गया कहा कि जहां लोकतंत्र के नाम पर ताज एक ही खानदान के सिर सजता रहा और देश बार-बार समझौतों की कीमत चुकाता रहा। कुर्सी बचाने की राजनीति ने राष्ट्रहित को गिरवी रखा। फैसले परिवार केंद्रित रहे और भारत अपनी अपार संभावनाओं के बावजूद बंधा रहा। सत्ता एक ही परिवार के पास बनी रहे, इसके लिए पूरे राष्ट्र को समझौतों की राह पर धकेला गया।


