दुर्ग के गोंडपेंड्री में 45 साल से नहीं जली होलिका:दो पक्षों में हुआ था बलवा, बुजुर्गों के फैसले का युवा भी कर रहे सम्मान

दुर्ग के गोंडपेंड्री में 45 साल से नहीं जली होलिका:दो पक्षों में हुआ था बलवा, बुजुर्गों के फैसले का युवा भी कर रहे सम्मान

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक ऐसा गांव है, जहां होली का दिन बाकी जगहों जैसा नहीं होता। आमतौर पर होली का नाम आते ही रंग, गुलाल, ढोल-नगाड़े, गीत-संगीत और उत्साह की तस्वीर सामने आती है। लेकिन इस गांव में न होलिका दहन होता है और न ही त्योहार जैसी रौनक दिखती है। जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर गोंडपेंड्री गांव में करीब 45 साल से होलिका दहन नहीं हुआ है। इसके पीछे एक पुराना विवाद है, जिसकी याद आज भी ग्रामीणों के मन में ताजा है। जब आसपास के गांवों में होलिका की आग जलती है और लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। लेकिन, गोंडपेंड्री में सामान्य दिनों जैसा माहौल रहता है। न ढोल की आवाज सुनाई देती है, न सामूहिक उत्सव का माहौल दिखता है। जानिए इस रिपोर्ट में आखिर वह पुराना विवाद क्या है, क्यों उस घटना के बाद ग्रामीण हालिका दहन नहीं किया… होलिका दहन लेकर शुरू हुई थी बहस गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि सालों पहले होलिका दहन की जगह को लेकर दो समुदायों के बीच बहस शुरू हुई थी। कुछ लोग दूसरी जगह दहन करना चाहते थे, जबकि दूसरा पक्ष पुरानी जगह पर ही परंपरा निभाने के पक्ष में था। विवाद बढ़ते-बढ़ते थाने तक पहुंच गया। इसी दौरान एक पक्ष ने तय स्थान पर होलिका जला दी। इसके बाद दोनों पक्षों में जमकर मारपीट हुई। मामला गंभीर हो गया और खून-खराबे तक पहुंच गया। केस अदालत में चला गया। जिन परिवारों के बीच विवाद हुआ, वे लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में उलझे रहे। बुजुर्गों का फैसला बना परंपरा घटना के बाद गांव के बुजुर्गों ने बैठक कर बड़ा निर्णय लिया। तय किया गया कि अब गांव में होलिका दहन नहीं होगा। उनका मानना था कि एक पर्व की वजह से अगर आपसी दुश्मनी बढ़ रही है तो उस पर रोक लगाना ही ठीक है। ग्रामीणों ने इस निर्णय को स्वीकार कर लिया। तब से आज तक गांव में होलिका दहन नहीं किया जाता। लोग इस फैसले को गांव की शांति से जोड़कर देखते हैं। पहले होती थी धूमधाम गांव के पुराने लोग बताते हैं कि पहले यहां होली पूरे उत्साह से मनाई जाती थी। होलिका दहन के दिन पूरी बस्ती एकत्र होती थी। नगाड़े बजते थे, डंडा नाच होता था और देर रात तक उत्सव चलता था। उस एक घटना के बाद सब कुछ बदल गया। अब न नगाड़ों की गूंज सुनाई देती है और न ही सामूहिक नाच-गाना होता है। नई पीढ़ी की अलग सोच समय के साथ नई पीढ़ी बड़ी हो रही है। गांव के बच्चे थोड़ा-बहुत रंग और गुलाल लगा लेते हैं। फिर भी बुजुर्ग इन गतिविधियों से दूरी बनाए रखते हैं। वे न होलिका दहन के पक्ष में हैं और न ही पहले जैसी सामूहिक होली मनाने के इच्छुक। गांव के एक निवासी का कहना है कि यहां होली का नाम सुनते ही पुरानी घटना याद आ जाती है। इसी कारण कोई भी पहले जैसा आयोजन करने की पहल नहीं करता। आज भी कायम है शांति का फैसला ग्रामीणों का मानना है कि छोटी-छोटी बातों पर भी मतभेद हो जाते हैं। ऐसे में बड़े सामूहिक आयोजन से तनाव बढ़ने की आशंका रहती है। इसी सोच के साथ गांव अब भी पुराने निर्णय पर कायम है। करीब तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन उस दिन की यादें लोगों के मन में बनी हुई हैं। देशभर में जहां होली भाईचारे और खुशियों का प्रतीक है, वहीं गोंडपेंड्री में यह दिन शांति के साथ सामान्य रूप से गुजर जाता है।

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