किशनगंज में ऐतिहासिक खगड़ा मेला शुरू:ब्रिटिश काल से लग रहा, कभी था एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला

किशनगंज में ऐतिहासिक खगड़ा मेला शुरू:ब्रिटिश काल से लग रहा, कभी था एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला

किशनगंज में ऐतिहासिक खगड़ा मेला का उद्घाटन सोमवार को किया गया। जिला पदाधिकारी विशाल राज, जिला परिषद अध्यक्षा रुकिया बेगम, एमजीएम मेडिकल कॉलेज के रजिस्ट्रार सह रेडक्रॉस सोसाइटी के चेयरमैन डॉ. इच्छित भारत सहित अन्य अतिथियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर और फीता काटकर इसका शुभारंभ किया। इस दौरान मेला संयोजक सुबीर कुमार और बबलू साह भी मौजूद रहे। उद्घाटन समारोह में डीएम विशाल राज ने कहा कि खगड़ा मेला की एक समृद्ध ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि इसे साल-दर-साल आगे बढ़ाया जा रहा है और सभी इस इतिहास का हिस्सा बन रहे हैं। डीएम ने यह भी बताया कि मेले का स्वरूप समय के साथ बदल रहा है और यह आधुनिक दौर में खुद को अपडेट कर रहा है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के रजिस्ट्रार डॉ. इच्छित भारत ने अपने संबोधन में कहा कि किशनगंज जिला गंगा-जमुनी तहजीब की जीती-जागती मिसाल है। उन्होंने बताया कि खगड़ा नवाब ने इस ऐतिहासिक मेले की शुरुआत की थी। डॉ. भारत ने खगड़ा मेले को पूरे देश में विख्यात और अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान वाला बताया, साथ ही कहा कि किशनगंज को संवारने में इसका अहम योगदान है। मेले के आयोजक बबलू साह ने खगड़ा मेले के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका इतिहास काफी पुराना है। उन्होंने बताया कि एक समय खगड़ा मेला से ही किशनगंज की पहचान हुआ करती थी और अब इसके अस्तित्व को बचाए रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। ब्रिटिश काल से लगने वाला यह मेला मूल रूप से 1883 में खगड़ा एस्टेट के नवाब सैयद अता हुसैन खान द्वारा शुरू किया गया था। पूर्णिया के ओल्ड गजेटियर (1911) में इसका जिक्र मिलता है, जहां सूफी फकीर बाबा कमली शाह ने नवाब को रोजगार सृजन के लिए मेले की सलाह दी थी। नवाब ने इस प्रस्ताव को प्रशासनिक अधिकारियों, जिनमें पूर्णिया के डीएम ए. विक्स भी शामिल थे, के समक्ष रखा, जिसे मंजूरी मिल गई। शुरुआत में यह पशु मेला के रूप में प्रसिद्ध था और सोनपुर के बाद एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता था। उस समय उत्तर प्रदेश, ढाका, मुर्शिदाबाद, बंगाल सहित नेपाल, अफगानिस्तान, म्यांमार और बांग्लादेश से भी व्यापारी इस मेले में आते थे। हालांकि, 1832 एकड़ में लगने वाला यह विशाल मेला अब घटकर 4-5 एकड़ में सिमट गया है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक विरासत आज भी बरकरार है। इस वर्ष मेले में नौ प्रकार के झूले लगाए गए हैं, जो बच्चों और बड़ों के लिए प्रमुख आकर्षण हैं। लकड़ी से बनी सामग्री, बर्तन, खिलौने और अन्य दुकानें सजी हुई हैं। मेला का नजारा सोनपुर मेले जैसा दिख रहा है, जहां सभी भागों में दुकानें लगी हैं। झूले, खेल-तमाशा और विविध सामान लोगों को खींच रहे हैं।कार्यक्रम में उप विकास आयुक्त प्रदीप कुमार झा, वरीय उपसमाहर्ता, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी कुंदन कुमार सिंह, डीएसपी मुख्यालय अशोक कुमार, वरीय जदयू नेता प्रो. बुलंद अख्तर हाशमी, रेड क्रॉस के सचिव मिक्की साहा, वार्ड पार्षद मनीष जालान सहित बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित थे। खगड़ा मेला किशनगंज की सांस्कृतिक धरोहर है, जो गंगा-जमुनी तहजीब और व्यापारिक इतिहास को जीवंत रखता है। किशनगंज में ऐतिहासिक खगड़ा मेला का उद्घाटन सोमवार को किया गया। जिला पदाधिकारी विशाल राज, जिला परिषद अध्यक्षा रुकिया बेगम, एमजीएम मेडिकल कॉलेज के रजिस्ट्रार सह रेडक्रॉस सोसाइटी के चेयरमैन डॉ. इच्छित भारत सहित अन्य अतिथियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर और फीता काटकर इसका शुभारंभ किया। इस दौरान मेला संयोजक सुबीर कुमार और बबलू साह भी मौजूद रहे। उद्घाटन समारोह में डीएम विशाल राज ने कहा कि खगड़ा मेला की एक समृद्ध ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि इसे साल-दर-साल आगे बढ़ाया जा रहा है और सभी इस इतिहास का हिस्सा बन रहे हैं। डीएम ने यह भी बताया कि मेले का स्वरूप समय के साथ बदल रहा है और यह आधुनिक दौर में खुद को अपडेट कर रहा है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के रजिस्ट्रार डॉ. इच्छित भारत ने अपने संबोधन में कहा कि किशनगंज जिला गंगा-जमुनी तहजीब की जीती-जागती मिसाल है। उन्होंने बताया कि खगड़ा नवाब ने इस ऐतिहासिक मेले की शुरुआत की थी। डॉ. भारत ने खगड़ा मेले को पूरे देश में विख्यात और अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान वाला बताया, साथ ही कहा कि किशनगंज को संवारने में इसका अहम योगदान है। मेले के आयोजक बबलू साह ने खगड़ा मेले के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका इतिहास काफी पुराना है। उन्होंने बताया कि एक समय खगड़ा मेला से ही किशनगंज की पहचान हुआ करती थी और अब इसके अस्तित्व को बचाए रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। ब्रिटिश काल से लगने वाला यह मेला मूल रूप से 1883 में खगड़ा एस्टेट के नवाब सैयद अता हुसैन खान द्वारा शुरू किया गया था। पूर्णिया के ओल्ड गजेटियर (1911) में इसका जिक्र मिलता है, जहां सूफी फकीर बाबा कमली शाह ने नवाब को रोजगार सृजन के लिए मेले की सलाह दी थी। नवाब ने इस प्रस्ताव को प्रशासनिक अधिकारियों, जिनमें पूर्णिया के डीएम ए. विक्स भी शामिल थे, के समक्ष रखा, जिसे मंजूरी मिल गई। शुरुआत में यह पशु मेला के रूप में प्रसिद्ध था और सोनपुर के बाद एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता था। उस समय उत्तर प्रदेश, ढाका, मुर्शिदाबाद, बंगाल सहित नेपाल, अफगानिस्तान, म्यांमार और बांग्लादेश से भी व्यापारी इस मेले में आते थे। हालांकि, 1832 एकड़ में लगने वाला यह विशाल मेला अब घटकर 4-5 एकड़ में सिमट गया है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक विरासत आज भी बरकरार है। इस वर्ष मेले में नौ प्रकार के झूले लगाए गए हैं, जो बच्चों और बड़ों के लिए प्रमुख आकर्षण हैं। लकड़ी से बनी सामग्री, बर्तन, खिलौने और अन्य दुकानें सजी हुई हैं। मेला का नजारा सोनपुर मेले जैसा दिख रहा है, जहां सभी भागों में दुकानें लगी हैं। झूले, खेल-तमाशा और विविध सामान लोगों को खींच रहे हैं।कार्यक्रम में उप विकास आयुक्त प्रदीप कुमार झा, वरीय उपसमाहर्ता, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी कुंदन कुमार सिंह, डीएसपी मुख्यालय अशोक कुमार, वरीय जदयू नेता प्रो. बुलंद अख्तर हाशमी, रेड क्रॉस के सचिव मिक्की साहा, वार्ड पार्षद मनीष जालान सहित बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित थे। खगड़ा मेला किशनगंज की सांस्कृतिक धरोहर है, जो गंगा-जमुनी तहजीब और व्यापारिक इतिहास को जीवंत रखता है।  

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