मतदान बढ़ने से राजनीतिक दलों और नेताओं की धड़कनें तेज हो गई है। वे इस बात का आकलन करने में जुटे रहे कि अधिक मतदान सत्ता परिवर्तन का संकेत है या मौजूदा सरकार के पक्ष में माहौल को दर्शाता है। तीनों ही गठबंधन इसे अपने पक्ष में बता रहे हैं। एलडीएफ को जर्बदस्त जीत का भरोसा तो भाजपा को त्रिशंकु जनादेश की आशंका
तिरुवनंतपुरम. केरल विधानसभा की 149 सीटों के लिए गुरुवार को हुए चुनाव में 78.25 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जो वर्ष 2021 के पिछले चुनाव के 75.39 प्रतिशत से करीब तीन प्रतिशत ज्यादा है। यह केरल के विधानसभा चुनावों के इतिहास में चौथा सबसे अधिक मतदान भी है।
मतदाताओं के उत्साह ने बढ़ाई नेताओं और राजनीतिक दलों की धड़कनें
मतदान बढ़ने से राजनीतिक दलों और नेताओं की धड़कनें तेज हो गई है। वे इस बात का आकलन करने में जुटे रहे कि अधिक मतदान सत्ता परिवर्तन का संकेत है या मौजूदा सरकार के पक्ष में माहौल को दर्शाता है। मध्य और दक्षिण केरल के कड़ी टक्कर वाले निर्वाचन क्षेत्रों में 2021 की तुलना में मतदाताओं की भागीदारी में बढ़ोतरी देखने को मिली। तीनों ही गठबंधन- मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाला सत्तारूढ़ लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ), कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्षी संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) अधिक मतदान को अपने पक्ष में बता रहे हैं।
केरल में सर्वाधिक मतदान 1960 में 85.72 प्रतिशत और उसके बाद 1987 में 80.64 प्रतिशत दर्ज हुआ था। इस बार शहरी और ग्रामीण, दोनों इलाकों में भारी भागीदारी ने मुकाबले को रोचक बना दिया है। अधिक मतदान को कड़े मुकाबले का संकेत माना जा रहा है। हालांकि, विश्लेषकों का मत है कि केरल के इतिहास को देखते हुए मतदान प्रतिशत के आधार पर चुनाव के नतीजों का अंदाजा लगाना मुमकिन नहीं है, दोनों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। कई बार ऐसा हुआ है कि ज्यादा मतदान होने पर एलडीएफ हार गई तो कई बार एलडीएफ जीत गई।
अभी तक नहीं टूट पाया 1960 का रेकॉर्ड
केरल के गठन के बाद बनी ई.एम. एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में 1957 में बनी पहली वामपंथी सरकार की बर्खास्तगी के कुछ महीने बाद वर्ष 1960 में हुए चुनाव कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में आई थी और 1987 में एलडीएफ जीती थी। 1960 में मतदान प्रतिशत में करीब 20 प्रतिशत का उछाल आया था और तब का मतदान प्रतिशत का रेकॉर्ड अभी तक कायम है।
आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में 79.19 प्रतिशत मतदान हुआ था और के. करुणाकरन के नेतृत्व में यूडीएफ की सरकार बनी थी। 1987 में 1982 के पिछले चुनाव के 73.51 प्रतिशत मतदान की तुलना में करीब 7 प्रतिशत ज्यादा मतदान हुआ था और करुणाकरन सरकार की विदाई हो गई थी।
2011 में 75.2 प्रतिशत मतदान के बाद यूडीएफ 72 सीटों के साथ सत्ता में आया था जबकि एलडीएफ को 68 सीटों के साथ विपक्ष में बैठना पड़ा था। मामूली अंतर से बदलाव हुआ था। 2016 के चुनाव में 77.30 प्रतिशत मतदान हुआ था जो पिछले चुनाव के 74.92 प्रतिशत से करीब ढाई प्रतिशत अधिक था। भ्रष्टाचार के आरोपों और सत्ता विरोधी लहर के कारण ओमन चांडी के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार को हार का सामना करना पड़ा और पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ सत्ता में वापस लौटा। हालांकि, कोविड के बाद 2021 में हुए चुनाव में मतदान प्रतिशत में डेढ़ प्रतिशत की गिरावट के बावजूद विजयन सरकार ने हर पांच साल में सरकार बदलने की परंपरा को तोड़ते हुए सत्ता में वापसी की थी।
एलडीएफ को तीसरी बार मिलेगी सत्त या यूडीएफ की होगी वापसी
2026 का चुनाव अपेक्षाकृत लहर रहित माना जा रहा है। मुख्य मुद्दा बदलाव या निरंतरता था और इसी के हिसाब से अलग-अलग गठबंधन अपनी-अपनी चुनावी मुहिम चला रहे थे। स्थानीय मुद्दे, कल्याणकारी योजनाएं, सामुदायिक समीकरण और हल्की सत्ता विरोधी भावना मिलकर परिणाम तय कर सकते हैं। परंपरागत द्वि-ध्रुवीय राजनीति के बीच भाजपा की बढ़ती मौजूदगी से कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले बने हैं। अब नजर इस पर है कि एलडीएफ तीसरी बार सत्ता में आ पाएगा या यूडीएफ वापसी करेगा और एनडीए नतीजों पर कितना असर डालेगा। कांग्रेस के लिए भी केरल महत्वपूर्ण बना हुआ है, क्योंकि कुछ राज्यों में हालिया चुनावी हार के बाद यहां बेहतर प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर उसके मनोबल को मजबूत कर सकता है। साथ ही अगर कांग्रेस जीतती है तो दक्षिण के राज्यों में उसकी राजनीतिक पकड़ भी मजबूत होगी। वह पहले से ही कर्नाटक और तेलंगाना में सत्ता में है। कयासों के बीच जनता का फैसला क्या है यह तो 25 दिन बाद 4 मई काे मतगणना के बाद ही सामने आएगा।


