इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 35 वर्ष पुराने हत्या के मामले में निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द करते हुए अभियुक्त बकुनी को दोषमुक्त कर दे दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह असफल रहा और यह मामला “ब्लाइंड मर्डर” प्रतीत होता है। यह फैसला न्यायमूर्ति संजीव कुमार एवं न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की खंडपीठ ने क्रिमिनल अपील संख्या 618/1990 में सुनाया। फैसला 19 नवंबर 2025 को सुरक्षित रखा गया था। मामले में अभियुक्तों की ओर से अधिवक्ता राम अवध मिश्रा एवं अधिवक्ता सिद्धार्थ मिश्रा ने पक्ष रखा, जबकि राज्य की ओर से एजीए ने बहस की। अभियोजन के अनुसार, वर्ष 1985 में थाना कोखराज, जनपद इलाहाबाद क्षेत्र में कल्लू नामक व्यक्ति की लाठी-डंडों से पीटकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में रहिसे उर्फ रहीसे, छिकानी, बकुनी एवं नज़ीर को धारा 302/34 आईपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए सत्र न्यायालय ने 21 मार्च 1990 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि मुख्य प्रत्यक्षदर्शी की गवाही अविश्वसनीय है, घटना का कोई ठोस उद्देश्य (मोटिव) सिद्ध नहीं हो पाया और स्वतंत्र गवाहों को भी अदालत में प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अभियोजन की कहानी परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, जो आपस में जुड़ नहीं पाते। अदालत ने यह भी नोट किया कि अपील की लंबी सुनवाई के दौरान तीन अभियुक्तों—रहिसे उर्फ रहीसे, छिकानी और नज़ीर—की मृत्यु हो चुकी है, जिसके कारण उनके विरुद्ध अपील पहले ही समाप्त हो चुकी थी। केवल बकुनी की अपील पर सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को “अनुमान और अटकलों पर आधारित” बताते हुए रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि अभियुक्त बकुनी को तत्काल रिहा किया जाए, यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो। यह फैसला एक बार फिर यह रेखांकित करता है कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के लिए ठोस, विश्वसनीय और संदेह से परे साक्ष्य अनिवार्य हैं।


