इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कुशीनगर के पुलिस अधीक्षक केशव कुमार के हलफनामे की भाषा पर नाराजगी जताई है।
कोर्ट ने इसे विरोधाभासी और अपमानजनक मानते हुए एसपी से एक सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा के माध्यम से स्पष्टीकरण मांगा है। जवाब संतोषजनक न होने पर एसपी को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा। यह आदेश न्यायमूर्ति हरबीर सिंह ने गोलू पांडेय की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। मामला कुशीनगर के सलीम अंसारी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत से जुड़ा है।
जानिये क्या है मामला
इस मामले में एसपी कुशीनगर केशव कुमार ने व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल किया है। कोर्ट ने इस हलफनामे का अवलोकन किया तो उसमें कई गंभीर विरोधाभास और आपत्तिजनक बातें सामने आईं। एसपी ने हलफनामे के पैरा छह में कहा कि सलीम अंसारी की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई। पैराग्राफ आठ में कहा कि मौत के कारण का पता नहीं चल सका।
वहीं, पैरा 11 में उन्होंने लिखा कि 22 अक्टूबर 2025 को जब घायल नबी रसूल को मेडिकल स्टोर ले जाया गया तो सलीम वहां पहुंचा था और वह पूरी तरह फिट था। बाद में दीपक उसे अस्पताल ले गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। इसके अलावा एसपी ने अपने हलफनामे के पैरा 10 में जिला अदालत के लिए विद्वान अधीनस्थ अदालत शब्द का इस्तेमाल किया। एसपी की भाषा अपमान वाली हाईकोर्ट ने इस शब्द पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पुलिस अधीक्षक द्वारा हलफनामे में इस्तेमाल की गई भाषा अपमानजनक प्रतीत होती है। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जिला अदालतों के लिए अधीनस्थ अदालत जैसे शब्दों के इस्तेमाल की कड़े शब्दों में निंदा की है। कोर्ट ने एसपी कुशीनगर को यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि उन्होंने किस कानूनी अधिकार के तहत ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया है। यह भी कहा कि एसपी कुशीनगर की ओर से दाखिल हलफनामा प्रथमदृष्टया टालमटोल से भरा और अपने आप में ही विरोधाभासी प्रतीत होता है।


