झारखंड उच्च न्यायालय में गुरुवार को एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति एस. एन. प्रसाद और न्यायमूर्ति गौतम कुमार चौधरी की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए लिव-इन रिलेशनशिप पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि विवाह से पहले पति द्वारा महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए जाते हैं और पत्नी की सहमति धोखे से ली जाती है, तो ऐसा विवाह कानून की नजर में टिकाऊ नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप जैसी गंभीर जानकारी छिपाना धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है। इस आधार पर किया गया विवाह निरस्त किया जाना पूरी तरह से न्यायसंगत है। अदालत ने कहा कि इस मामले में दोनों पक्ष वर्ष 2016 से अलग रह रहे हैं। ऐसे में वैवाहिक संबंध लगभग शून्य अवस्था में पहुंच चुका है। ऐसे रिश्ते का जबरन निर्वहन करना किसी भी पक्ष के हित में नहीं है। इसी के साथ अदालत ने गढ़वा परिवार न्यायालय के 16 फरवरी 2017 के फैसले को बरकरार रखते हुए विवाह को निरस्त करने के आदेश को सही ठहराया। झारखंड उच्च न्यायालय में गुरुवार को एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति एस. एन. प्रसाद और न्यायमूर्ति गौतम कुमार चौधरी की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए लिव-इन रिलेशनशिप पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि विवाह से पहले पति द्वारा महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए जाते हैं और पत्नी की सहमति धोखे से ली जाती है, तो ऐसा विवाह कानून की नजर में टिकाऊ नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप जैसी गंभीर जानकारी छिपाना धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है। इस आधार पर किया गया विवाह निरस्त किया जाना पूरी तरह से न्यायसंगत है। अदालत ने कहा कि इस मामले में दोनों पक्ष वर्ष 2016 से अलग रह रहे हैं। ऐसे में वैवाहिक संबंध लगभग शून्य अवस्था में पहुंच चुका है। ऐसे रिश्ते का जबरन निर्वहन करना किसी भी पक्ष के हित में नहीं है। इसी के साथ अदालत ने गढ़वा परिवार न्यायालय के 16 फरवरी 2017 के फैसले को बरकरार रखते हुए विवाह को निरस्त करने के आदेश को सही ठहराया।


