हड़िया-शराब का काम छोड़ा, हेमावती ने बदली जिंदगी:लाह-आलू की खेती से मिली नई पहचान, बनीं आत्मनिर्भर; हो रही अच्छी आमदनी

हड़िया-शराब का काम छोड़ा, हेमावती ने बदली जिंदगी:लाह-आलू की खेती से मिली नई पहचान, बनीं आत्मनिर्भर; हो रही अच्छी आमदनी

गुमला जिले के कामडारा प्रखंड के तुरबूल डाड़ टोली गांव की हेमावती कुमारी ने ‘फूलो-झानो आशीर्वाद अभियान’ के तहत अपनी जिंदगी बदल ली है। कभी हड़िया-शराब बेचकर गुजारा करने वाली हेमावती अब लाह और आलू की खेती कर आत्मनिर्भर बन गई हैं। हेमावती दीदी ने चांदनी आजीविका सखी मंडल और तुरबूल आजीविका ग्राम संगठन से जुड़कर सम्मानजनक आजीविका के महत्व को समझा। इसके बाद उन्होंने परंपरागत हड़िया-शराब के काम को छोड़कर खेती को अपनी आय का मुख्य साधन बनाने का निर्णय लिया। आवश्यक प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराए गए सरकार और सहयोगी संस्थाओं के समन्वित प्रयासों से हेमावती को आवश्यक प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराए गए। इन प्रयासों ने उन्हें एक नई दिशा प्रदान की। लाह की खेती के लिए उन्हें रांची स्थित नामकुम आईसीएआर (ICAR) द्वारा प्रशिक्षित किया गया। साथ ही, उन्हें टूल किट और 5 किलोग्राम लाह बीज भी प्रदान किए गए। ओरेकल प्रोजेक्ट के माध्यम से आलू की खेती के लिए 50 किलोग्राम बीज उपलब्ध कराए गए। आज हेमावती अपने घर पर लाह और आलू की उन्नत खेती कर रही हैं। उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, और अब वे हर तीन माह में लाखों रुपए कमा रही हैं। इससे वे आत्मसम्मान के साथ अपने परिवार का भरण-पोषण कर पा रही हैं। हेमावती दीदी का कहना है, “इस योजना ने मुझे अंधेरे से बाहर निकाला है। अब मैं सम्मान के साथ खेती कर रही हूं और आत्मनिर्भर जीवन जी रही हूं।” हेमावती की यह सफलता कहानी ‘फूलो-झानो आशीर्वाद अभियान’ के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन, आजीविका सृजन और महिलाओं के सशक्तिकरण का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है। गुमला जिले के कामडारा प्रखंड के तुरबूल डाड़ टोली गांव की हेमावती कुमारी ने ‘फूलो-झानो आशीर्वाद अभियान’ के तहत अपनी जिंदगी बदल ली है। कभी हड़िया-शराब बेचकर गुजारा करने वाली हेमावती अब लाह और आलू की खेती कर आत्मनिर्भर बन गई हैं। हेमावती दीदी ने चांदनी आजीविका सखी मंडल और तुरबूल आजीविका ग्राम संगठन से जुड़कर सम्मानजनक आजीविका के महत्व को समझा। इसके बाद उन्होंने परंपरागत हड़िया-शराब के काम को छोड़कर खेती को अपनी आय का मुख्य साधन बनाने का निर्णय लिया। आवश्यक प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराए गए सरकार और सहयोगी संस्थाओं के समन्वित प्रयासों से हेमावती को आवश्यक प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराए गए। इन प्रयासों ने उन्हें एक नई दिशा प्रदान की। लाह की खेती के लिए उन्हें रांची स्थित नामकुम आईसीएआर (ICAR) द्वारा प्रशिक्षित किया गया। साथ ही, उन्हें टूल किट और 5 किलोग्राम लाह बीज भी प्रदान किए गए। ओरेकल प्रोजेक्ट के माध्यम से आलू की खेती के लिए 50 किलोग्राम बीज उपलब्ध कराए गए। आज हेमावती अपने घर पर लाह और आलू की उन्नत खेती कर रही हैं। उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, और अब वे हर तीन माह में लाखों रुपए कमा रही हैं। इससे वे आत्मसम्मान के साथ अपने परिवार का भरण-पोषण कर पा रही हैं। हेमावती दीदी का कहना है, “इस योजना ने मुझे अंधेरे से बाहर निकाला है। अब मैं सम्मान के साथ खेती कर रही हूं और आत्मनिर्भर जीवन जी रही हूं।” हेमावती की यह सफलता कहानी ‘फूलो-झानो आशीर्वाद अभियान’ के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन, आजीविका सृजन और महिलाओं के सशक्तिकरण का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है।  

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