सीमा से परे सौहार्द: बेलगावी के ‘दोस्त’ अजित पवार

सीमा से परे सौहार्द: बेलगावी के ‘दोस्त’ अजित पवार

व्यावहारिक राजनीति और सांस्कृतिक समझ से विवादों पर सहयोग का संदेश

बेलगावी. कर्नाटक–महाराष्ट्र सीमा विवाद दशकों से राजनीतिक बयानबाजी और तनाव का कारण रहा है। लेकिन इस पृष्ठभूमि में कुछ नेता ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने विवाद से ऊपर उठकर जमीनी सच्चाई को समझा और सहयोग का रास्ता चुना। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार इसी श्रेणी में आते हैं, जिनका बेलगावी से रिश्ता अपेक्षाकृत सौहार्दपूर्ण रहा है।

पवार का दृष्टिकोण हमेशा व्यावहारिक रहा है। उनका मानना है कि सीमा किसी दीवार की तरह नहीं, बल्कि सहयोग और समन्वय का माध्यम होनी चाहिए। यही सोच उनके सार्वजनिक बयानों और प्रशासनिक रवैए में झलकती है।

कागज की रेखा, जमीनी रिश्ते

बेलगावी और महाराष्ट्र के सीमावर्ती जिलों के बीच कृषि, व्यापार और श्रमिकों के रिश्ते लंबे समय से जुड़े हैं। चीनी मिलें, दुग्ध उत्पादन और कृषि बाजारों में दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे पर निर्भर है। ऐसे में सीमा केवल नक्शे पर खींची गई रेखा बनकर रह जाती है। पवार ने कई बार स्वीकार किया कि दोनों राज्यों के किसानों की समस्याएं लगभग समान हैं और इन्हें हल करने के लिए सहयोग आवश्यक है।

संवाद और सहयोग पर ज़ोर

सिंचाई परियोजनाएं, सड़क संपर्क और व्यापारिक सुगमता जैसे मुद्दों पर पवार ने निरंतर संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। उनका रुख सीमावर्ती इलाकों के लिए व्यावहारिक समाधान की ओर इशारा करता है, जिससे जनहित के कामों में सीमा विवाद बाधा न बने।

संस्कृति की साझा जमीन

बेलगावी में मराठी और कन्नड़ संस्कृतियां एक-दूसरे में घुली-मिली दिखाई देती हैं। भाषा, त्योहार और खानपान में यह सांस्कृतिक संगम सहज रूप से देखने को मिलता है। इस सामाजिक सच्चाई को समझने वाला नेतृत्व ही सीमा क्षेत्रों में शांति और सौहार्द बनाए रख सकता है। अजित पवार की राजनीति में यही समझ स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

इस प्रकार, बेलगावी के संदर्भ में अजित पवार का दृष्टिकोण व्यावहारिक राजनीति और सांस्कृतिक समझ का उदाहरण है, जो सीमा विवाद से परे सहयोग और सौहार्द का संदेश देता है।

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