राजस्थान में वाहनों से वसूले जा रहे करोड़ों रुपए के ‘ग्रीन टैक्स’ के कथित दुरुपयोग पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। पर्यावरणविद् बाबूलाल जाजू की याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी की सेंट्रल ज़ोन बेंच (भोपाल) ने प्रदेश सरकार से पूछा है कि आखिर प्रदूषण के नाम पर वसूली गई 2009.66 करोड़ की भारी-भरकम राशि कहां खर्च की गई।
न्यायाधिपति शिवकुमार सिंह एवं एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी की बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक संयुक्त जांच समिति का गठन किया है। यह समिति 6 सप्ताह में रिपोर्ट देगी कि क्या इस राशि का उपयोग वाकई हरियाली बढ़ाने और प्रदूषण रोकने में हुआ है या इसे अन्य मदों में डायवर्ट कर दिया गया।
हवा जहरीली, बीमार हो रहे लोग और पैसा तिजोरी में
जाजू की ओर से अधिवक्ता लोकेन्द्रसिंह कच्छावा ने बेंच को बताया कि राजस्थान में वाहनों का धुआं दमा, ब्रोंकाइटिस और हृदय रोग जैसी बीमारियां बांट रहा है। वर्ष 2017 में ग्रीन टैक्स लागू ही इसलिए किया गया था ताकि वायु प्रदूषण नियंत्रित हो सके। आरटीआई से खुलासा हुआ है कि 2015-16 से 2024-25 तक सरकार ने 2009.66 करोड़ तो वसूल लिए, लेकिन प्रदेश में वन क्षेत्र 13 प्रतिशत से घटकर महज 9 प्रतिशत रह गया है।
इन महकमों को नोटिस जारी
एनजीटी ने सचिव रोड ट्रांसपोर्ट एवं हाईवे मंत्रालय, परिवहन आयुक्त राजस्थान, सदस्य सचिव प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, प्रमुख सचिव पर्यावरण व नगरीय विकास और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को होगी।
एनजीटी ने बनाई कमेटी
जांच समिति में इन विभागों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इनमें पर्यावरण विभाग, परिवहन विभाग, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड शामिल है।
ग्रीन टैक्स राशि का नहीं हुआ सही उपयोग
ग्रीन टैक्स की इतनी बड़ी राशि का यदि सही उपयोग होता, तो आज राजस्थान के शहर जहरीली हवा के लिए बदनाम नहीं होते। यह पैसा केवल और केवल पर्यावरण संरक्षण पर ही खर्च होना चाहिए।
-बाबूलाल जाजू, याचिकाकर्ता एवं पर्यावरणविद


