Glaucoma Awareness: भारत में अंधेपन के प्रमुख कारणों में ग्लूकोमा का नाम तेजी से उभर रहा है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह बीमारी आज भी बड़ी संख्या में लोगों में पहचान में ही नहीं आ पाती। इसे अक्सर साइलेंट थीफ ऑफ साइट यानी आंखों की रोशनी चुपचाप चुराने वाली बीमारी कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण लगभग नजर नहीं आते। न दर्द होता है, न आंखों में लालिमा और न ही कोई साफ चेतावनी संकेत। ऐसे में कई लोग तब डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, जब आंखों की रोशनी को स्थायी नुकसान हो चुका होता है।
एचटी लाइफस्टाइल से बातचीत में डॉ पूजा प्रभु ने बताया कि ग्लूकोमा को हल्के में लेना आंखों की रोशनी के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है।
ग्लूकोमा क्यों है इतना खतरनाक
डॉ पूजा के अनुसार, “ग्लूकोमा आंखों से जुड़ी बीमारियों का एक समूह है, जिसमें आंख की ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता है। यही नर्व आंखों से दिमाग तक देखने की जानकारी पहुंचाती है। ज्यादातर मामलों में यह नुकसान आंखों के बढ़े हुए प्रेशर की वजह से होता है, हालांकि कई बार सामान्य प्रेशर में भी ग्लूकोमा हो सकता है।”
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसमें नजर का नुकसान किनारों (Peripheral Vision) से शुरू होता है, जबकि बीच की नजर लंबे समय तक ठीक रहती है। इसी कारण व्यक्ति पढ़ना, गाड़ी चलाना और रोजमर्रा के काम करता रहता है और उसे अंदाजा ही नहीं होता कि उसकी आंखों की रोशनी धीरे-धीरे खत्म हो रही है। मार्च 2023 में इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत में करीब 90% ग्लूकोमा मरीजों को अपनी बीमारी की जानकारी ही नहीं होती, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।
लक्षण दिखें तो देर हो चुकी होती है
डॉ पूजा बताती हैं, “जब टनल विजन या बहुत ज्यादा नजर कमजोर होने जैसे लक्षण सामने आते हैं, तब तक ऑप्टिक नर्व को काफी नुकसान हो चुका होता है। मोतियाबिंद की तरह ग्लूकोमा का इलाज करके खोई हुई नजर वापस नहीं लाई जा सकती। इलाज सिर्फ आगे होने वाले नुकसान को रोक सकता है।”
कौन लोग ज्यादा जोखिम में हैं
ग्लूकोमा किसी को भी हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है। इनमें
- 40 साल से अधिक उम्र के लोग
- जिनके परिवार में ग्लूकोमा का इतिहास हो
- डायबिटीज के मरीज
- ज्यादा पावर का चश्मा पहनने वाले
- लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाएं लेने वाले
- आंखों में चोट लगने का इतिहास रखने वाले लोग
समय पर जांच ही बचाव का रास्ता
डॉ पूजा कहती हैं कि सिर्फ नजर की सामान्य जांच काफी नहीं होती। ग्लूकोमा की पहचान के लिए आंखों का प्रेशर, ऑप्टिक नर्व की जांच, नजर के किनारों की जांच और जरूरत पड़ने पर खास स्कैन किए जाते हैं। उनकी सलाह है, “इस ग्लूकोमा अवेयरनेस मंथ में लक्षणों का इंतजार न करें। नियमित और पूरी आंखों की जांच से ग्लूकोमा को समय रहते पकड़ा जा सकता है। आज की एक साधारण जांच आपको जीवनभर के अंधेपन से बचा सकती है।”


