Gen- Z Survey: आजकल के ऑफिसों में माहौल बदल चुका है। अगर आपको लगता है कि एक शाबाशी या थोड़ा सा बोनस देकर आप अपनी टीम के यूथ को खुश रख लेंगे, तो आप किसी गलतफहमी में हैं। 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए युवा, जिन्हें हम Gen Z कहते हैं, उन्होंने कॉरपोरेट लाइफ के वहीं घिसे- पिटे कल्चर को पूरी तरह नकार दिया है। नौकरी डॉट कॉम के एक बड़े सर्वे (जिसमें 23,000 लोग शामिल थे) ने कुछ ऐसी बातें बताई हैं, जिन्हें सुनकर पुराने जमाने के मैनेजर्स के होश उड़ सकते हैं। आइए जानते हैं क्या है ये नया ट्रेंड।
Gen Z Survey: हमें पैसा नहीं, पर्सनल ग्रोथ चाहिए
सुनने में यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है, लेकिन सच यही है। सर्वे बताता है कि 81% Gen Z के लिए ऑफिस में मिलने वाले किसी भी इनाम या मेडल से ज्यादा जरूरी ‘ग्रोथ’ है। केवल 10% लोग ही है जो कैश बोनस के पीछे भाग रहे हैं। और उनमें से भी केवल 9% लोगों को इससे फर्क पड़ता है कि ऑफिस में उनकी पब्लिकली तारीफ हो रही है या नहीं।
स्किल्स और कुछ नया सीखने की चाह (New Skills Learning)
आज के यूथ के लिए तरक्की का मतलब बड़ा केबिन या ऊंची कुर्सी नहीं है। 57% Gen Z का मानना है कि असली ग्रोथ तब है जब वे नई स्किल्स (Skills) सीखें। खासकर एनिमेशन, डिजाइन और विज्ञापन जैसे क्रिएटिव फील्ड्स में 78% युवा चाहते हैं कि कंपनी उन्हें वर्कशॉप कराए और नए कोर्स सिखाएं। वे काम करने वाली मशीन बनने के जगह ‘फ्यूचर रेडी’ बनना चाहते हैं।
मेंटल हेल्थ सबसे ऊपर, टॉक्सिक बॉस को ‘बाय-बाय’ (Toxic Work Culture)
- Gen Z के लिए काम ही सब कुछ नहीं है। वे अपनी पर्सनल लाइफ और मेंटल पीस को ज्यादा इम्पोर्टेंस देते हैं।
- 34% युवाओं को खराब वर्क-लाइफ बैलेंस से सख्त नफरत है।
- वे ऐसे मैनेजर के साथ काम नहीं करना चाहते जो हर छोटी बात पर रोक-टोक करें।
- अगर माहौल ‘टॉक्सिक’ लगा या करियर रुकता हुआ दिखा, तो 14% युवा एक साल के अंदर ही रिजाइन कर देते हैं। (जबकि पुरानी पीढ़ी में यह सिर्फ 3% है)।
कंपनियों को बदलना होगा अपना तरीका
2030 तक भारत के ऑफिसों में 40% हिस्सा इसी पीढ़ी का होगा। तो इसलिए बात साफ है, अगर कंपनियों को बेस्ट टैलेंट बचाकर रखना है, तो उन्हें पुराने रिवॉर्ड सिस्टम छोड़कर फ्लेक्सिबल वर्किंग, मेंटल हेल्थ सपोर्ट और लर्निंग पर ध्यान देना होगा। वरना ये यूथ स्टार्टअप्स या उन जगहों पर चले जाएंगे जहां उनकी वैल्यू की जाती है।


