Imperialism:अमेरिका को अक्सर दुनिया का सबसे ताकतवर देश माना जाता है, लेकिन उसकी विदेश नीति (Global Geopolitics) में कई बार दूसरे देशों की सरकारों को बदलने की कोशिशें (US Coup History) भी शामिल रही हैं। वेनेजुएला और ईरान ही नहीं,अमेरिका ने बीसवीं सदी से लेकर अब तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दर्जनों देशों में तख्तापलट , सैन्य हस्तक्षेप या गुप्त ऑपरेशन के जरिये सरकारें बदली हैं। इतिहासकारों के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका ने लगभग 70-80 बार ऐसी कोशिशें कीं, जिनमें से कई सफल रहीं। कुछ अनुमानों में यह संख्या 100 से भी ज्यादा बताई जाती है। ये हस्तक्षेप ज्यादातर शीत युद्ध (Cold War Coups) के दौरान कम्युनिज्म रोकने, तेल जैसे संसाधनों की सुरक्षा या अमेरिकी हितों की रक्षा के नाम पर किए गए। लेकिन इनमें से कई मामलों में लोकतांत्रिक रूप (US Foreign Policy) से चुनी गई सरकारें भी निशाना बनीं।
1953 – ईरान : शाह को फिर से सत्ता में लाया गया
अमेरिका और ब्रिटेन की खुफिया एजेंसियों ने प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग को हटाया, क्योंकि उन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था। शाह को फिर से सत्ता में लाया गया, लेकिन इससे बाद में 1979 की इस्लामी क्रांति हुई।
1954 – ग्वाटेमाला : दशकों तक गृहयुद्ध चला (CIA Interventions)
राष्ट्रपति जैकोबो आर्बेंज को हटाने के लिए अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी CIA ने ऑपरेशन चलाया। वजह थी यूनाइटेड फ्रूट कंपनी की जमीनों पर सुधार। इसके बाद दशकों तक गृहयुद्ध चला।
1961 – क्यूबा (बे ऑफ पिग्स): सरकार को गिराने की असफल कोशिश
फिदेल कास्त्रो की सरकार को गिराने की असफल कोशिश की गई। CIA ने प्रशिक्षित निर्वासितों को भेजा, लेकिन असफल रहे।
1963 – दक्षिण वियतनाम: तख्तापलट में मदद
दक्षिण वियतनाम में अमेरिका नेराष्ट्रपति न्गो दिन्ह दियेम के खिलाफ तख्तापलट में मदद की।
1964 – ब्राजील: सैन्य तख्तापलट को समर्थन
अमेरिका ने ब्राजील में राष्ट्रपति जोआओ गौलार्ट के खिलाफ सैन्य तख्तापलट को समर्थन दिया।
1973 – चिली: जनरल पिनोशे की तानाशाही
राष्ट्रपति साल्वाडोर अयेंदे (लोकतांत्रिक रूप से चुने गए),उन्हें हटाने में CIA की भूमिका रही। जनरल पिनोशे की तानाशाही आई।
1983 – ग्रेनेडा: मार्क्सवादी सरकार गिराई
अमेरिकी सेना ने सीधे आक्रमण कर मार्क्सवादी सरकार गिराई।
1989 – पनामा: नोरिएगा को हटाने के लिए हमला
जनरल मैनुअल नोरिएगा को हटाने के लिए सैन्य हमला किया गया।
2003 – इराक: सरकार गिराने के लिए आक्रमण
अमेरिका ने इराक में सद्दाम हुसैन की सरकार गिराने के लिए बड़ा आक्रमण किया।
2011 – लीबिया: हवाई हमलों से गद्दाफी का अंत
लीबिया में नाटो (अमेरिका सहित) के हवाई हमलों से मुअम्मर गद्दाफी का अंत हुआ।
कई देशों में बार-बार हस्तक्षेप हुआ
ये सिर्फ कुछ बड़े उदाहरण हैं। लैटिन अमेरिका में होंडुरास, निकारागुआ, हैती, डोमिनिकन रिपब्लिक जैसे कई देशों में बार-बार हस्तक्षेप हुआ। एशिया और अफ्रीका में भी कई ऑपरेशन चले।
तेल और ताक़त का खेल: लैटिन अमेरिका से मध्य पूर्व तक
- वेनेजुएला (Venezuela) – तेल का सबसे बड़ा भंडार
वेनेजुएला दुनिया में सबसे अधिक तेल भंडार वाला देश है। अमेरिका ने यहाँ ह्यूगो शावेज और बाद में निकोलस मादुरो की सरकार को गिराने के लिए कई प्रयास किए।
2002 का तख्तापलट: शावेज को कुछ घंटों के लिए सत्ता से हटा दिया गया था, जिसमें अमेरिका का मौन समर्थन था।
हालिया संकट: 2019 में अमेरिका ने जुआन गुआइदो को राष्ट्रपति के रूप में मान्यता देकर मादुरो को हटाने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया और कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए।
- ईरान (Iran) – ऑपरेशन एजाक्स (1953)
यह तेल के लिए किए गए हस्तक्षेप का सबसे क्लासिक उदाहरण है। जब प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग ने ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया, तो CIA ने ब्रिटिश खुफिया एजेंसी के साथ मिलकर उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया और शाह की निरंकुश सत्ता को मजबूत किया। - लेबनान (Lebanon) – रणनीतिक दखल
लेबनान में अमेरिका का हस्तक्षेप मुख्य रूप से इजरायल की सुरक्षा और ईरान के प्रभाव (हिजबुल्लाह) को कम करने के लिए रहा है।
1958 का हस्तक्षेप: ‘आइजनहावर सिद्धांत’ के तहत अमेरिकी मरीन लेबनान में उतरे ताकि पश्चिमी समर्थक सरकार को गिरने से बचाया जा सके।
हालिया भूमिका: अमेरिका यहाँ राजनीतिक गुटों को वित्तपोषित करने और प्रतिबंधों के जरिए लेबनान की राजनीति को अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास करता रहा है।
आधुनिक युग के सैन्य हस्तक्षेप
इक्कीसवीं सदी में भी अमेरिका का ‘रेजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) का सिलसिला नहीं थमा:
इराक (2003): सद्दाम हुसैन के पास ‘विनाशकारी हथियार’ होने का दावा कर हमला किया गया, जो बाद में झूठा निकला।
लीबिया (2011): नाटो के साथ मिलकर मुअम्मर गद्दाफी के शासन को खत्म किया गया, जिससे देश आज भी अस्थिरता झेल रहा है।
अफगानिस्तान (2001): तालिबान को हटाने के लिए 20 साल तक युद्ध चला, लेकिन अंत में तालिबान की ही वापसी हुई।
दुनिया को क्या मिला ?
अमेरिकी हस्तक्षेपों का ट्रैक रिकॉर्ड मिला-जुला नहीं बल्कि विनाशकारी रहा है।
अस्थिरता: इराक और लीबिया जैसे देश गृहयुद्ध और आतंकवाद की चपेट में आ गए।
तानाशाही: कई बार लोकतंत्र बचाने के नाम पर अमेरिका ने क्रूर तानाशाहों का समर्थन किया।
अविश्वास: आज दुनिया के कई देशों में अमेरिका की मंशा को लेकर भारी संदेह रहता है।
इन हस्तक्षेपों के परिणाम
कई बार ये बदलाव अस्थिरता, गृहयुद्ध, आतंकवाद या नई तानाशाही लाए। जैसे ईरान में शाह की वापसी से बाद में इस्लामी क्रांति हुई, इराक और लीबिया में अराजकता फैली।
क्या ये हमेशा सही थे?
अमेरिका का कहना रहा है कि ये कदम लोकतंत्र और सुरक्षा के लिए थे। लेकिन आलोचक मानते हैं कि ज्यादातर मामलों में आर्थिक हित (तेल, फल कंपनियां) या साम्यवाद का डर मुख्य वजह था। कई लोकतांत्रिक नेता भी निशाने पर आए।
कुल मिलाकर, यह इतिहास दिखाता है कि महाशक्तियां अक्सर अपने हितों के लिए दूसरे देशों की सरकारों को प्रभावित करती हैं। क्या भविष्य में ऐसी घटनाएं कम होंगी? समय बताएगा।
आम जनता का जीवन संघर्षपूर्ण बना
बहरहाल, इतिहास गवाह है कि जहाँ भी अमेरिका ने ‘लोकतंत्र’ के नाम पर तख्तापलट किए, वहां अक्सर गृहयुद्ध, भुखमरी और शरणार्थी संकट पैदा हुआ। इराक और लीबिया इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। वहीं, वेनेजुएला जैसे देशों में कड़े प्रतिबंधों ने आम जनता का जीवन संघर्षपूर्ण बना दिया है।


