-कहीं ताले में कैद आधुनिक शौचालय, कहीं पानी और सफाई का संकट, नगरपालिका की उदासीनता से आमजन बेहाल।
बैतूल। स्वच्छ भारत मिशन और स्मार्ट सिटी जैसे दावों के बीच बैतूल शहर के पब्लिक टायलेट हकीकत की कड़वी तस्वीर पेश कर रहे हैं। नगरपालिका द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर आमजन की सुविधा के लिए बनाए गए शौचालय आज अव्यवस्था, अनदेखी और जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति के चलते बदहाली का शिकार हैं। हालात यह हैं कि कहीं लाखों रुपए खर्च कर बनाए गए आधुनिक शौचालय दो महीने से ताले में कैद हैं, तो कहीं पानी और सफाई के अभाव में लोगों को नाक पर कपड़ा रखकर गुजरना पड़ रहा है। तीन अलग-अलग स्थानों बने पब्लिक टायलेट सिर्फ एक सवाल खड़े करते हैं कि,क्या बैतूल में पब्लिक टायलेट सिर्फ बजट खर्च करने और योजनाओं की फोटो खिंचवाने के लिए बनाए जा रहे हैं? यदि समय पर संचालन, पानी, सफाई और निगरानी नहीं हो सकती तो ऐसे निर्माणों का क्या औचित्य है?।
टायलेट 01-
25 लाख का शौचालय बना शोपीस
शहर के सदर क्षेत्र स्थित गेंदा चौक पर नगरपालिका ने पुराने शौचालय को तोडकऱ करीब 25 लाख रुपए की लागत से दस सीटर आधुनिक पब्लिक टायलेट का निर्माण कराया। शौचालय पूरी तरह बनकर तैयार है, लेकिन दो महीने बीतने के बाद भी इसका संचालन शुरू नहीं हो सका है। वजह है नगरपालिका के भीतर जिम्मेदारी को लेकर मची खींचतान। इंजीनियरिंग शाखा का कहना है कि संचालन की जिम्मेदारी स्वास्थ्य शाखा की है और चाबी सौंप दी गई है, जबकि स्वास्थ्य शाखा इससे साफ इनकार कर रही है। नियमों का हवाला देकर टेंडर प्रक्रिया की बात कही जा रही है। नतीजा यह कि अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं और जनता सुविधा से वंचित है। करोड़ों के बजट और स्वच्छता अभियानों के बीच यह शौचालय केवल शोपीस बनकर रह गया है।
टायलेट 02-
कोठीबाजार का टायलेट सुविधाएं कागजों में
कोठीबाजार के व्यस्त बाजार क्षेत्र में लाखों रुपए की लागत से दो मंजिला पब्लिक टायलेट बनाया गया था, ताकि बाजार आने वाले लोगों को राहत मिल सके, लेकिन आज यह शौचालय खुद बदबू और गंदगी का केंद्र बन चुका है। ट्यूबवेल की मोटर खराब होने से महीनों से पानी की समस्या बनी हुई है। मोटर सुधार के लिए भेजी गई, लेकिन तीन महीने बाद भी वापस नहीं आई। पानी के अभाव में सफाई व्यवस्था चरमरा गई है। बदबू इतनी तेज है कि लोगों को मुंह ढककर अंदर जाना पड़ता है। कर्मचारी की नियुक्ति होने के बावजूद सफाई न होना नगर प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि टायलेट की नियमित सफाई की व्यवस्था हो, तो यह वास्तव में आमजन के काम आ सकता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जिम्मेदार विभाग इस ओर कब ध्यान देता है।
टायलेट 03-
पीडब्ल्यूडी चौक का टायलेट दिखता ही नहीं
पीडब्ल्यूडी चौक पर आमजन की सुविधा के लिए बनाया गया पब्लिक टायलेट आज अव्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन गया है। टायलेट के ठीक सामने होर्डिंग लगाए जाने के कारण यह दूर से नजर तक नहीं आता, जिससे बाहरी क्षेत्र से आने वाले लोग इसे ढूंढ ही नहीं पाते। जानकारी के अभाव में लोग आसपास भटकते नजर आते हैं। साफ-सफाई की कोई ठोस व्यवस्था न होने से टायलेट परिसर में गंदगी पसरी हुई है। बदबू इतनी तेज रहती है कि लोग अंदर जाने से कतराते हैं। कई बार मजबूरी में लोग बिना उपयोग किए ही बाहर लौट जाते हैं, वहीं कुछ लोग खुले में शौच को विवश हो रहे हैं, जिससे आसपास का वातावरण भी दूषित हो रहा है।शहर में सौंदर्यीकरण और स्वच्छता को लेकर किए जा रहे दावों के बीच पीडब्ल्यूडी चौक स्थित इस पब्लिक टायलेट की बदहाल स्थिति प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करती है।


