कैथल में दो बार विधायक रहे एवं पूर्व मंत्री सुरेंद्र मदान के निधन को जिले की राजनीतिक पार्टियों ने अपूर्णिय राजनीतिक क्षति बताया है। कांग्रेस से लेकर, भाजपा, इनेलो व अन्य राजनीतिक संगठनों ने उनके निधन पर गहरा शोक जताया है। उनके अंतिम संस्कार में पहुंचे हरेक नेता के मुंह पर उनकी प्रशंसा और उनके कैथल के लिए किए गए कार्यों का जिक्र देखने को मिला कि सुरेंद्र मदान कॉलेज के प्रथम वर्ष में ही छात्र संगठन के चुनाव में उतर गए थे और पहली ही बार में जीत गए। कैथल को जिला बनवाने और शुगर मिल लाने में भी उनका योगदान रहा। शुरू से था राजनीति का शौक मदान के दोस्त और राजनीतिक पारी में उनके सहायक रहे विशंबर सिंह बताते हैं कि शुरू से ही उनको राजनीति का शौक था। पहले वे नगरपालिका में ठेकेदारी का काम करते थे, तब भी चौटाला परिवार से लगाव रखते थे। 1987 में ताऊ देवीलाल के साथ साथ कैथल में सुरेंद्र मदान की भी आंधी थी। विशंबर बताते हैं कि उनकी एक वीडियो में उन्होंने अपने राजनीतिक सफर का जिक्र किया। इसमें मदान ने बताया था कि उन्होंने पहली बार 1971 में आरकेएसडी कॉलेज में छात्र संगठन का चुनाव लड़ा और 32 वोटों से जीते। उस समय उनके सामने पूर्व विधायक और जमींदार सरपंच के बेटे चुनाव में थे। जीत के बाद ही उनका रूझान राजनीति की ओर हो गया। वाजपेयी से प्रभावित होकर जनता पाटी से जुड़े इसके बाद 1973 में वे दिल्ली चले गए और वहां पर चाचा की टीवी असेम्बल करने की फैक्ट्री में मैनेजमेंट संभाली। उस समय 4 हजार रुपए का टीवी आता था। 1977 में इमरजेंसी हटने के बाद जब चुनाव आए तो अटल बिहारी वाजपेयी से प्रभावित होकर वे उनसे जुड़ गए। उस समय जनता पार्टी होती थी। भारतीय जनता पार्टी बाद में बनी। 1980 में वे फिर कैथल आ गए ओर भाजयुमो के प्रधान बन गए। 1984 तक कैथल मण्डल के अध्यक्ष रहे। तब सुषमा स्वराज और रामबिलास शर्मा के कैथल में कार्यक्रम करवाए। 1984 में वे ताऊ देवीलाल से प्रभावित होकर लोकदल से जुड़े। महम के बैंसी गांव में वे ताऊ देवीलाल से मिले। ताऊ देवीलाल ने दिलाई थी कैथल से टिकट उस समय वे आनंद सिंह डांगी के सम्पर्क में आए, जो लोकदल पार्टी में सेवा करते थे। प्रोग्राम के बाद ताऊ देवीलाल की गाड़ी खराब हो गई, तब डांगी उनको छोड़ने के लिए सिरसा गए और उनको भी साथ ले गए। तब ताऊ ने उन्हें मिलने के लिए डबवाली में बुलाया वे उनसे मिले। तब ताऊ ने उनको कैथल से टिकट देने की बात कही। फिर टिकट मिली तो उनका नाम भी लिस्ट में आ गया। उस समय कैथल में 82 हजार वोट थी, 27 हजार उनको मिली। कांग्रेस से रोशन लाल तिवारी और आजाद प्रत्याशी लाला चरणदास उनके चुनाव प्रतिद्वंद्वी थे। मदान चुनाव जीत गए। उसके बाद 1990 में उनको मंत्री पद भी मिल गया। 35 साल उम्र में उन्होंने सोचा भी नहीं था कि वे मंत्री बन जाएंगे। अगले चुनाव में इसके बाद उन्होंने कांग्रेस जॉइन कर ली। लोकदल छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने वालों में से वे अकेले विधायक बने। तब उनको पब्लिक रिलेशन में मंत्री पद मिला। कैथल को जिला बनाया सुरेंद्र मदान के भतीजे योगेश मदान ने बताया कि कैथल को जिला बनाने की मांग उन्होंने ही की थी। 1989 में ताऊ देवीलाल ने यह मांग पूरी की। उस समय वकीलों ने उनसे कैथल को जिला बनाने की मांग की। तब उन्होंने कहा कि अगर कैथल जिला नहीं बना तो वे रिजाइन कर देंगे। इस पर ताऊ देवीलाल ने इसे मंजूरी दी। शुगर मिल और कई माइनरों की मांग भी उन्होंने ही रखी और उनको बनवाया। 1996 में भजनलाल के कार्यकाल में उनको टिकट नहीं मिली, लेकिन वे फिर भी उनकी प्रशंसा करते थे। अब वे कांग्रेस के साथ जुड़े हुए थे। बता दें पूर्व मंत्री सुरेंद्र मदान का 11 फरवरी की रात को हार्ट अटैक के कारण निधन हो गया। वे अपने परिवार के साथ नोएडा में एक शादी समारोह में गए थे। बुधवार को उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें कैथल के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।


