IGIMS में पहली रोबोटिक फिजियोथेरेपी शुरू, मरीजों को राहत:लकवा, स्ट्रोक और रीढ़ की चोट वाले मरीजों की रिकवरी होगी तेज; कई सुविधाएं उपलब्ध

IGIMS में पहली रोबोटिक फिजियोथेरेपी शुरू, मरीजों को राहत:लकवा, स्ट्रोक और रीढ़ की चोट वाले मरीजों की रिकवरी होगी तेज; कई सुविधाएं उपलब्ध

बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि जुड़ गई है। पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में राज्य की पहली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित रोबोटिक फिजियोथेरेपी सेवा का शुभारंभ किया गया है। यह अत्याधुनिक तकनीक लकवा (पैरालिसिस), स्ट्रोक और रीढ़ की गंभीर चोट से जूझ रहे मरीजों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई है। अब तक ऐसी उन्नत सुविधाएँ केवल मुंबई, चेन्नई और दिल्ली जैसे बड़े महानगरों तक ही सीमित थीं। इस पहल के साथ, बिहार के मरीजों को बेहतर पुनर्वास के लिए अब राज्य से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं होगी। अस्पताल प्रशासन ने बताया कि रोबोटिक फिजियोथेरेपी का परीक्षण चरण सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है और अब मरीजों को नियमित रूप से इसका लाभ मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक न केवल मरीजों की रिकवरी की गति को बढ़ाती है, बल्कि उपचार को अधिक वैज्ञानिक और सटीक भी बनाती है। रोबोटिक फिजियोथेरेपी मरीजों के लिए होती फायदेमंद रोबोटिक फिजियोथेरेपी एक कंप्यूटर नियंत्रित प्रणाली है जो मरीज की शारीरिक गतिविधियों में सहायता करती है। इसमें मरीज की शारीरिक स्थिति के अनुसार मशीन में विशेष प्रोग्राम फीड किए जाते हैं। अत्याधुनिक सेंसर मांसपेशियों की प्रतिक्रिया और मूवमेंट पर लगातार नज़र रखते हैं, जिससे मशीन नियंत्रित, दोहराव वाली और सटीक एक्सरसाइज कराती है। प्रत्येक सत्र का डेटा रिकॉर्ड किया जाता है, जिससे डॉक्टर प्रगति का विश्लेषण कर पाते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि स्ट्रोक या स्पाइनल इंजरी के बाद शरीर के कुछ हिस्सों की मूवमेंट कमजोर हो जाती है। ऐसी स्थिति में बार-बार एक जैसी सटीक एक्सरसाइज बेहद आवश्यक होती है। रोबोटिक सिस्टम इस प्रक्रिया को बिना थके और समान तीव्रता के साथ लंबे समय तक दोहरा सकता है, जो पारंपरिक थेरेपी में संभव नहीं होता। यह तकनीक कई मायनों में खास है। पारंपरिक फिजियोथेरेपी में थेरेपिस्ट की शारीरिक सीमाएँ होती हैं, जबकि रोबोट लगातार काम कर सकता है। यह नसों और मांसपेशियों की ट्रेनिंग को अधिक प्रभावी ढंग से करता है, जिससे रिकवरी का समय कम हो सकता है। इसके अतिरिक्त, डेटा आधारित मॉनिटरिंग उपचार में पारदर्शिता और सटीकता को बढ़ाती है। किन मरीजों को होगा अधिक लाभ?
* लकवा (स्ट्रोक) से पीड़ित मरीज
* स्पाइनल कॉर्ड इंजरी वाले मरीज
* सर्जरी के बाद पुनर्वास की जरूरत वाले मरीज
* सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बच्चे
* घुटना या हिप रिप्लेसमेंट के बाद रिकवरी कर रहे मरीज

चिकित्सा विशेषज्ञ मनीष मंडल (अधीक्षक,IGIMS) का मानना है कि आने वाले वर्षों में रोबोटिक फिजियोथेरेपी पुनर्वास चिकित्सा का अहम हिस्सा बनेगी। IGIMS की यह पहल बिहार में न्यूरो और स्पाइन मरीजों के उपचार को नई दिशा देगी।

अब राज्य के गरीब और मध्यमवर्गीय मरीज भी कम खर्च में आधुनिक तकनीक से इलाज पा सकेंगे। यह न केवल चिकित्सा सुविधा का विस्तार है, बल्कि मरीजों को तेजी से सामान्य जीवन में लौटाने की दिशा में एक मजबूत कदम भी माना जा रहा हैं। बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि जुड़ गई है। पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में राज्य की पहली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित रोबोटिक फिजियोथेरेपी सेवा का शुभारंभ किया गया है। यह अत्याधुनिक तकनीक लकवा (पैरालिसिस), स्ट्रोक और रीढ़ की गंभीर चोट से जूझ रहे मरीजों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई है। अब तक ऐसी उन्नत सुविधाएँ केवल मुंबई, चेन्नई और दिल्ली जैसे बड़े महानगरों तक ही सीमित थीं। इस पहल के साथ, बिहार के मरीजों को बेहतर पुनर्वास के लिए अब राज्य से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं होगी। अस्पताल प्रशासन ने बताया कि रोबोटिक फिजियोथेरेपी का परीक्षण चरण सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है और अब मरीजों को नियमित रूप से इसका लाभ मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक न केवल मरीजों की रिकवरी की गति को बढ़ाती है, बल्कि उपचार को अधिक वैज्ञानिक और सटीक भी बनाती है। रोबोटिक फिजियोथेरेपी मरीजों के लिए होती फायदेमंद रोबोटिक फिजियोथेरेपी एक कंप्यूटर नियंत्रित प्रणाली है जो मरीज की शारीरिक गतिविधियों में सहायता करती है। इसमें मरीज की शारीरिक स्थिति के अनुसार मशीन में विशेष प्रोग्राम फीड किए जाते हैं। अत्याधुनिक सेंसर मांसपेशियों की प्रतिक्रिया और मूवमेंट पर लगातार नज़र रखते हैं, जिससे मशीन नियंत्रित, दोहराव वाली और सटीक एक्सरसाइज कराती है। प्रत्येक सत्र का डेटा रिकॉर्ड किया जाता है, जिससे डॉक्टर प्रगति का विश्लेषण कर पाते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि स्ट्रोक या स्पाइनल इंजरी के बाद शरीर के कुछ हिस्सों की मूवमेंट कमजोर हो जाती है। ऐसी स्थिति में बार-बार एक जैसी सटीक एक्सरसाइज बेहद आवश्यक होती है। रोबोटिक सिस्टम इस प्रक्रिया को बिना थके और समान तीव्रता के साथ लंबे समय तक दोहरा सकता है, जो पारंपरिक थेरेपी में संभव नहीं होता। यह तकनीक कई मायनों में खास है। पारंपरिक फिजियोथेरेपी में थेरेपिस्ट की शारीरिक सीमाएँ होती हैं, जबकि रोबोट लगातार काम कर सकता है। यह नसों और मांसपेशियों की ट्रेनिंग को अधिक प्रभावी ढंग से करता है, जिससे रिकवरी का समय कम हो सकता है। इसके अतिरिक्त, डेटा आधारित मॉनिटरिंग उपचार में पारदर्शिता और सटीकता को बढ़ाती है। किन मरीजों को होगा अधिक लाभ?
* लकवा (स्ट्रोक) से पीड़ित मरीज
* स्पाइनल कॉर्ड इंजरी वाले मरीज
* सर्जरी के बाद पुनर्वास की जरूरत वाले मरीज
* सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बच्चे
* घुटना या हिप रिप्लेसमेंट के बाद रिकवरी कर रहे मरीज

चिकित्सा विशेषज्ञ मनीष मंडल (अधीक्षक,IGIMS) का मानना है कि आने वाले वर्षों में रोबोटिक फिजियोथेरेपी पुनर्वास चिकित्सा का अहम हिस्सा बनेगी। IGIMS की यह पहल बिहार में न्यूरो और स्पाइन मरीजों के उपचार को नई दिशा देगी।

अब राज्य के गरीब और मध्यमवर्गीय मरीज भी कम खर्च में आधुनिक तकनीक से इलाज पा सकेंगे। यह न केवल चिकित्सा सुविधा का विस्तार है, बल्कि मरीजों को तेजी से सामान्य जीवन में लौटाने की दिशा में एक मजबूत कदम भी माना जा रहा हैं।  

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