झज्जर के डीघल में फाइनेंस का जाल बना ‘कैंसर:ब्याज का लालच , कर्ज–रंजिश के बीच बढ़ती मौतें; पंचायत और खापों से हस्तक्षेप की मांग तेज

झज्जर के डीघल में फाइनेंस का जाल बना ‘कैंसर:ब्याज का लालच , कर्ज–रंजिश के बीच बढ़ती मौतें; पंचायत और खापों से हस्तक्षेप की मांग तेज

झज्जर जिले का डीघल गांव इन दिनों एक ऐसे आर्थिक जाल में फंसा है, जिसने सामाजिक संतुलन को भी हिला दिया है। ऊंचे ब्याज और जल्दी कमाई के लालच में शुरू हुआ फाइनेंस का काम अब विवाद, रंजिश और मौतों की वजह बनता जा रहा है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि अब सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर एकजुट होकर इस समस्या का समाधान निकालने की जरूरत महसूस की जा रही है। फाइनेंस का जाल: कमाई से संकट तक बड़ी आबादी के इस गांव में करीब 800 से 1000 युवा इस फाइनेंस नेटवर्क से जुड़े बताए जाते हैं। कोई अकेले तो कोई समूह बनाकर पैसा इकट्ठा कर ब्याज पर आगे चलाता है। अनुमान के मुताबिक, 300 से 400 करोड़ रुपये तक का लेन-देन इस अनौपचारिक सिस्टम में हो रहा है। शुरुआत में 10 से 20 प्रतिशत तक के रिटर्न का लालच लोगों को आकर्षित करता है, लेकिन धीरे-धीरे पैसा फंसता है, कर्ज बढ़ता है और विवाद शुरू हो जाते हैं। यही विवाद कई बार हिंसक रूप ले लेते हैं। घटनाएं: जब फाइनेंस बना जानलेवा डीघल गांव और आसपास के क्षेत्र में पिछले कुछ समय में कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनका संबंध सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से फाइनेंस विवादों से जोड़ा जा रहा है। हाल ही में साहिल उर्फ सोनू हत्याकांड ने पूरे इलाके को हिला दिया। वहीं मंजीत की मौत का मामला भी बहुत ज्यादा चर्चा में रहा, जिसमें दुबई में बैठे राव इंद्रजीत पर आरोप लगे थे। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि यह समस्या अब केवल एक गांव तक सीमित नहीं रही। भाईचारे में दरार, बढ़ता सामाजिक तनाव फाइनेंस के इस खेल ने गांव के सामाजिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया है। जहां पहले आपसी विश्वास और भाईचारा मजबूत था, वहीं अब पैसों के लेन-देन ने रिश्तों में खटास भर दी है। छोटे विवाद बड़े झगड़ों में बदल रहे हैं और कई बार हिंसा तक पहुंच रहे हैं। फैलता दायरा और बढ़ता खतरा डीघल के अलावा झज्जर जिले के अन्य गांवों में भी यह फाइनेंस मॉडल तेजी से फैल रहा है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी, तो यह पूरे क्षेत्र के लिए बड़ा सामाजिक और आपराधिक संकट बन सकता है। सरकारी सख्ती के बावजूद जारी खेल हरियाणा सरकार इस तरह के अवैध फाइनेंस नेटवर्क पर रोक लगाने के आदेश दे चुकी है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी सख्त निर्देश दिए, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर सीमित ही नजर आ रहा है। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि इस नेटवर्क के न रुकने के पीछे कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका हो सकती है, इतना ही नही कुछ सिस्टम के लोग भी अपनी हिस्सेदारी रखते हैं। सामाजिक पहल ही समाधान की कुंजी अब गांव के जागरूक लोगों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल कानून से नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता से भी निकलेगा। गांव में इस मुद्दे पर पंचायत और सामूहिक बैठकें आयोजित की जानी चाहिए, ताकि लोगों को जागरूक किया जा सके। भाईचारे में बढ़ते तनाव को कम किया जा सके और इस फाइनेंस के “कैंसर” पर सामूहिक रूप से अंकुश लगाया जा सके इस दिशा में अहलावत खाप जैसी सम्मानित सामाजिक संस्थाओं से बड़ी उम्मीदें जुड़ी हैं। इसके साथ ही कादियान खाप और दलाल खाप को भी अग्रणी भूमिका निभाते हुए इस मुद्दे पर आगे आना चाहिए। यदि ये खापें मिलकर ठोस निर्णय लेती हैं, तो गांव में फैल रहे इस खतरनाक फाइनेंस नेटवर्क पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। डीघल गांव आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां आर्थिक लालच ने सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर दिया है। जरूरत है सामूहिक जागरूकता, सख्त निर्णय और एकजुट प्रयासों की—ताकि इस “फाइनेंस के कैंसर” को समय रहते रोका जा सके और गांव के घरों के चिराग बुझने से बचाए जा सकें। इतिहास, विरासत और पहचान झज्जर-रोहतक नेशनल हाईवे पर स्थित डीघल गांव एक ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित गांव माना जाता है। इस गांव की स्थापना 1181 ईस्वी में चौधरी डीघा अहलावत द्वारा की गई थी। वर्तमान में लगभग 35,000 की आबादी वाला यह गांव अहलावत गोत्र का प्रमुख केंद्र है और हरियाणा के बड़े व वीआईपी गांवों में गिना जाता है। बसावट का इतिहास इतिहास के अनुसार, राजस्थान के अलकांद क्षेत्र से शरीया, बीनिया और डीघा तीन भाई पानी की कमी के कारण अजमेर की ओर आए। वहां भी जल संकट के चलते उन्होंने अलग-अलग स्थानों पर बसने का निर्णय लिया। शरीया ने शेरिया गांव बसाया, बीनिया ने बरहाणा गांव बसाया, और डीघा ने आगे बढ़कर डीघल गांव की स्थापना की। देश सेवा में अग्रणी गांव डीघल गांव का देश सेवा में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस गांव के लोग प्रथम विश्व युद्ध से लेकर आधुनिक समय तक कई युद्धों में शामिल रहे हैं। गांव के कई वीर जवान शहीद भी हुए हैं। उनके सम्मान में गांव में एक वीर सैनिक स्मारक बनाया गया है, जिस पर सभी शहीदों के नाम अंकित हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व गांव में स्थित बाबा मोहजमा का मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां आसपास के गांवों से भी लोग दर्शन के लिए आते हैं। इसके अलावा, अहलावत खाप के कुलदेवता दादा साधु का मंदिर भी यहां स्थित है, जहां देशभर से अहलावत गोत्र के लोग माथा टेकने आते हैं। डीघल गांव में आधुनिक सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। यहां छोटे से लेकर बड़े स्कूल, अस्पताल, पंचायत भवन और कई ऐतिहासिक इमारतें मौजूद हैं। गांव शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में भी आगे है। खेल और पहलवानी की परंपरा डीघल गांव के युवा खेलों में भी अपना दबदबा बनाए हुए हैं। यहां के पहलवान दूर-दूर तक प्रसिद्ध रहे हैं। कहा जाता है कि इस गांव में 7 फीट तक के पहलवान हुए हैं, और स्वयं गांव के संस्थापक चौधरी डीघा भी एक मजबूत पहलवान थे। जाट इतिहास को लिखित रूप देने वाले कप्तान दलीप सिंह अहलावत भी इसी गांव से थे। उन्होंने 1987-88 में जाटों की गाथा लिखी, जिसे पूरे देश में सराहा गया। अहलावत गोत्र का विस्तार अहलावत गोत्र हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में व्यापक रूप से फैला हुआ है। हरियाणा में इस गोत्र के लगभग 112 गांव हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में लगभग 554 गांव बसे हुए हैं। बिजनौर जिले में सबसे अधिक अहलावत गांव पाए जाते हैं, जहां लोग आज भी खुद को “डीघलिया” कहते हैं। वर्तमान खाप नेतृत्व हरियाणा में डीघल स्थित अहलावत खाप के प्रधान चौधरी जय सिंह नंबरदार हैं, जो खाप के साथ-साथ चौधरी छोटूराम विचार मंच, गढ़ी सांपला के कार्यक्रमों को भी संभालते हैं। यह गांव न केवल अपने गौरवशाली इतिहास के लिए जाना जाता है, बल्कि आज भी शिक्षा, खेल, समाज सेवा और देशभक्ति में अपनी मजबूत पहचान बनाए हुए है। लेकिन आज ये गांव फाईनेंस की चपेट में आ चुका हैं।

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