1971 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी बॉर्डर 2 सिर्फ एक युद्ध फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सेनाओं के साहस, बलिदान और टीमवर्क की कहानी है। यह फिल्म पहली बॉर्डर की विरासत को आगे बढ़ाते हुए कहानी का स्केल बड़ा करती है और यह दिखाती है कि वह जंग सिर्फ लोंगेवाला तक सीमित नहीं थी, बल्कि जमीन, हवा और समुद्र तीनों मोर्चों पर लड़ी गई थी। कहानी में इमोशन भी है और गंभीरता भी। यह सिर्फ गोलियों और धमाकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सैनिकों के अंदर चल रहे डर, भरोसे और जिम्मेदारी के एहसास को भी सामने लाती है। कुछ सीन्स थोड़े लंबे जरूर हैं, लेकिन वे कहानी को और गहराई देते हैं और दर्शक को आखिर तक जोड़े रखते हैं। फिल्म की कहानी फिल्म की कहानी कई मोर्चों पर एक साथ चलती है। अलग-अलग इलाकों में तैनात भारतीय सैनिक, अलग-अलग हालात, लेकिन एक ही लक्ष्य देश की रक्षा। फिल्म यह दिखाती है कि कैसे पाकिस्तान ने कई दिशाओं से हमला करने की कोशिश की और कैसे भारतीय सैनिकों की समझदारी, रणनीति और हिम्मत के आगे हर कोशिश नाकाम हो गई। कहानी में इमोशन भी है और गंभीरता भी। यह सिर्फ गोलियों और विस्फोटों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सैनिकों के भीतर चल रहे डर, भरोसे और कर्तव्य को भी सामने लाती है। कुछ सीन्स थोड़े लंबे जरूर हैं, लेकिन वे कहानी की भावना को गहराई देते हैं और दर्शक को अंत तक बांधे रखते हैं। फिल्म में एक्टिंग सनी देओल पूरी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनकी डायलॉग डिलीवरी इतनी दमदार है कि कई मौकों पर तालियां और सीटियां बजने पर मजबूर हो जाती हैं। उनका आक्रामक अंदाज, आंखों में दिखता जुनून और देशभक्ति का जोश फिल्म को ऊंचाई देता है। यह सनी देओल अपने पूरे रंग में नजर आते हैं। दिलजीत दोसांझ फिल्म की आत्मा हैं। गंभीर और तनावपूर्ण सीन्स में भी वह अपनी सहज एक्टिंग और हल्के हास्य से माहौल को संतुलित रखते हैं। उनका किरदार मानवीय लगता है और युद्ध की कठोरता के बीच एक अपनापन पैदा करता है। वरुण धवन सधे हुए और गंभीर रूप में नजर आते हैं। उन्होंने अपने किरदार को बिना शोर के मजबूती दी है और भावनात्मक सीन्स में असर छोड़ा है। अहान शेट्टी का रोल भले ही छोटा हो, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस ध्यान खींचती है। स्क्रीन पर उनका जोश और ईमानदारी साफ नजर आती है। फिल्म की फीमेल करेक्टर्स की मौजूदगी सीमित है, जो थोड़ी कमी लगती है, लेकिन इसकी वजह यह है कि कहानी पूरी तरह युद्ध और सैनिकों के नजरिए पर फोकस रखती है। फिल्म में डायरेक्शन और राइटिंग अनुराग सिंह का डायरेक्शन बैलेंस्ड है। उन्होंने इमोशन, डायलॉग्स और वॉर सीन्स के बीच अच्छा तालमेल बनाया है। राइटिंग में देशभक्ति है, लेकिन ओवरड्रामैटिक नहीं। कई डायलॉग्स सीधे दिल पर असर छोड़ते हैं और कहानी को मजबूती देते हैं। फिल्म में सिनेमैटोग्राफी और साउंड फिल्म की सिनेमैटोग्राफी ग्रैंड है। वॉर जोन, धमाके और सैनिकों की मूवमेंट को बहुत असरदार तरीके से दिखाया गया है। साउंड डिजाइन भी स्ट्रॉन्ग है, जो हर सीन का इम्पैक्ट और रोमांच बढ़ा देता है। फिल्म का संगीत संगीत भावनाओं का साथ देता है। पुराने यादगार गानों की विरासत को छूना आसान नहीं था, फिर भी नए गाने कहानी के मूड के मुताबिक हैं। कुछ गाने दिल को छूते हैं, हालांकि पहले जैसी गहरी छाप छोड़ना स्वाभाविक रूप से कठिन था। बॉर्डर की तुलना में कैसी है बॉर्डर 2?
बॉर्डर 2 की कहानी और सिनेमैटोग्राफी पहली बॉर्डर से ज्यादा बड़ी और आधुनिक नजर आती है। जहां बॉर्डर लोंगेवाला की जंग पर फोकस थी, वहीं बॉर्डर 2 जमीन, हवा और समुद्र तीनों मोर्चों को दिखाती है। सनी देओल की एक्टिंग इस बार और ज्यादा दमदार है, खासकर एक्शन सीन्स पहले से ज्यादा शार्प और इंटेंस लगते हैं। हालांकि म्यूजिक के मामले में बॉर्डर की यादगार धुनों जैसी गहराई यहां थोड़ी कम महसूस होती है। अगर आप उसी लेवल की उम्मीद लेकर जाएंगे तो हल्की निराशा हो सकती है, लेकिन आज के समय के हिसाब से बॉर्डर 2 का म्यूजिक भी अच्छा है। फिल्म पर अंतिम फैसला बॉर्डर 2 एक बड़े स्केल की, इमोशनल और दमदार वॉर फिल्म है। कुछ जगह फिल्म थोड़ी लंबी जरूर लगती है और महिला किरदार सीमित हैं, लेकिन मजबूत एक्टिंग, सॉलिड डायरेक्शन और पावरफुल कहानी इसे देखने लायक बनाती है। फिल्म खत्म होने के बाद दिल में गर्व, सम्मान और भारतीय सैनिकों के लिए गहरा रिस्पेक्ट छोड़ जाती है।
फिल्म रिव्यू – ‘बॉर्डर 2’:सनी देओल की एक्टिंग से लेकर एक्शन तक सब दमदार, लेकिन जानिए, क्या फिल्म में है पहली बॉर्डर जैसी बात?


