ससुर का ‘वचन’, साले की ‘गवाही’ और जज की ‘शायरी’:इंदौर कोर्ट में 20 लाख में खत्म हुआ पति-पत्नी के बीच का विवाद

ससुर का ‘वचन’, साले की ‘गवाही’ और जज की ‘शायरी’:इंदौर कोर्ट में 20 लाख में खत्म हुआ पति-पत्नी के बीच का विवाद

इंदौर की फैमिली कोर्ट में हाल ही में एक ऐसा मुकदमा अपने अंजाम तक पहुंचा, जिसने कानूनी दांव-पेंच, मानवीय संवेदनाओं और भरोसे की एक मिसाल पेश की। चार साल से चल रहे पति-पत्नी के विवाद में जब आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच कोई रास्ता नहीं निकल रहा था, तब ससुर के एक भरोसे ने पूरे केस की दिशा बदल दी। मामला गहनों के विवाद से शुरू हुआ, बहू के भाई की गवाही पर आकर टिका और आखिर में जज साहब की सुनाई गईं साहिर लुधियानवी की मशहूर पंक्तियों के साथ एक भावुक लेकिन गरिमापूर्ण अंत पर खत्म हुआ। 20 लाख रुपए के समझौते के साथ दोनों ने सहमति से तलाक ले लिया, लेकिन यह केस कोर्टरूम में मौजूद हर शख्स के लिए एक यादगार सबक छोड़ गया। चार साल का सफर: शादी से अदालत तक
यह कहानी इंदौर की रहने वाली शैफाली और गुड़गांव के एक आईटी प्रोफेशनल अमित (बदले हुए नाम) की है। साल 2021 में दोनों की शादी बड़े धूमधाम से हुई। शुरुआती कुछ महीने तो ठीक-ठाक गुजरे, लेकिन जल्द ही दोनों के बीच मतभेद और मनमुटाव की दीवार खड़ी होने लगी। विचारों का टकराव, अपेक्षाओं का बोझ और रोज-रोज के झगड़ों ने रिश्ते में ऐसी कड़वाहट घोल दी कि साथ रहना मुश्किल हो गया। परिवार और रिश्तेदारों ने अपने स्तर पर सुलह-समझौते की अनगिनत कोशिशें कीं, लेकिन हर प्रयास नाकाम रहा। आखिरकार, 22 जुलाई 2022 को शैफाली अपना ससुराल छोड़कर इंदौर अपने मायके वापस आ गई। इसके साथ ही रिश्ते की डोर अदालत तक पहुंच गई। शैफाली ने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और भरण-पोषण (मेंटेनेंस) के लिए कानूनी कार्रवाई शुरू की। इसके बाद शुरू हुआ चार साल लंबा कानूनी संघर्ष। तारीखें लगती रहीं, गवाहियां होती रहीं, और काउंसलिंग के कई दौर चले। विवाद का केंद्र: शादी के गहने
हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान यह केस एक ऐसे मोड़ पर आकर अटक गया, जहां से आगे बढ़ना लगभग नामुमकिन लग रहा था। विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा थे शादी के गहने, जिन्हें कानून की भाषा में ‘स्त्रीधन’ कहा जाता है। अमित का पक्ष: शैफाली जब घर छोड़कर गई, तो सारे गहने अपने साथ ले गई थी। यह एक ऐसा गतिरोध था, जिसे तोड़ना मुश्किल था। बिना किसी ठोस सबूत के यह तय करना लगभग असंभव था कि सच कौन बोल रहा है। गहनों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप इतने बढ़ गए कि कोर्ट की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ पा रही थी। ससुर का एक बयान, जिसने सबको चौंका दिया जब मामला गहनों पर आकर पूरी तरह फंस गया, तभी कोर्टरूम में एक अप्रत्याशित घटना घटी। लड़के के पिता, जो खुद पेशे से एक वकील हैं, अपनी जगह पर खड़े हुए और उन्होंने जज साहब से जो कहा, उसे सुनकर एक पल के लिए पूरे कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया। यह एक असाधारण क्षण था। फैमिली कोर्ट के बंद कमरों में जहां रिश्ते तार-तार होते हैं और एक-दूसरे पर कीचड़ उछाला जाता है, वहां एक ससुर का अपनी बहू के भाई की ईमानदारी पर ऐसा विश्वास जताना किसी चमत्कार से कम नहीं था। दो घंटे का सस्पेंस और भाई की गवाही ससुर के इस बयान के बाद कोर्ट ने तुरंत शैफाली के भाई को समन जारी कर कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया। सुनवाई को दो घंटे के लिए रोक दिया गया। यह दो घंटे कोर्टरूम में मौजूद सभी लोगों के लिए भारी सस्पेंस से भरे थे। अब इस चार साल पुराने केस का पूरा भविष्य एक व्यक्ति की गवाही पर टिक गया था। तय समय पर शैफाली का भाई कोर्ट पहुंचा। सभी की निगाहें उसी पर थीं। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के पूरी सच्चाई बयान की। उसने साफ शब्दों में कहा- गहने मेरी बहन के पास नहीं हैं। वे ससुराल पक्ष के पास ही हैं। वचन का मान और केस का समाधान भाई की गवाही के बाद अब सबकी नजरें फिर से ससुर पर टिक गईं। क्या वह अपने कहे शब्दों से मुकर जाएंगे? क्या वह इस गवाही को मानने से इनकार कर देंगे? लेकिन उन्होंने एक बार फिर सबको हैरान करते हुए अपने बड़प्पन का परिचय दिया। उन्होंने कहा- मैं अपने वचन पर कायम हूं। बहू के भाई ने जो कहा है, वह हमें स्वीकार है। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है। इस एक वाक्य ने चार साल से चल रही कड़वाहट को खत्म कर दिया। जब जज ने सुनाईं साहिर की पंक्तियां समझौते के बाद जज साहब ने एक आखिरी कोशिश करते हुए पति-पत्नी को साथ रहने और अपने रिश्ते को एक और मौका देने के लिए समझाया। लेकिन दोनों ही अपने फैसले पर अडिग थे। शैफाली ने स्पष्ट रूप से कहा, “यह रिश्ता अब मेरे लिए एक बोझ बन गया है।” अमित की ओर से भी साथ रहने की कोई इच्छा जाहिर नहीं की गई। जब यह स्पष्ट हो गया कि अब सुलह की कोई गुंजाइश नहीं है, तो जज साहब ने माहौल को गरिमापूर्ण बनाते हुए साहिर लुधियानवी के एक मशहूर गीत की पंक्तियां सुनाईं: “वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा… ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा…” इन पंक्तियों ने कोर्टरूम के माहौल को भावुक कर दिया। यह इस बात का संकेत था कि जब रिश्ते को बचाया न जा सके, तो उसे कड़वाहट और आरोपों के साथ घसीटने के बजाय एक सम्मानजनक विदाई देना ही बेहतर होता है। एक नजीर है यह फैसला इस केस पर टिप्पणी करते हुए एडवोकेट प्रीति महना कहती हैं, “यह केस पिछले चार सालों से स्त्रीधन और मेंटेनेंस के विवाद में उलझा हुआ था। सबसे बड़ा गतिरोध शादी के गहनों को लेकर था। सुनवाई के दौरान जब ससुर ने बहू के भाई की सच्चाई पर दांव लगाया, तो वह एक ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ। फैमिली कोर्ट में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि एक पक्ष दूसरे पक्ष के परिजन की बात को अंतिम मानने पर सहमत हो।” यह फैसला इस बात की नजीर है कि आपसी कड़वाहट को सालों तक खींचने के बजाय, उसे एक ‘खूबसूरत मोड़’ देकर खत्म करना ही दोनों परिवारों के हित में होता है। यह केस कानून की किताबों से नहीं, बल्कि भरोसे और इंसानियत से सुलझा।

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