कटिहार के मांसाही प्रखंड के चकमा गांव में रविवार की सुबह खुशी और हल्की कसक दोनों लेकर आई। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा 10वीं परीक्षा का परिणाम घोषित होते ही किसान के बेटे अमन ने 479 अंक (95.8%) हासिल कर जिले में पहला स्थान प्राप्त किया। लेकिन यह सफलता एक अधूरी ख्वाहिश भी साथ लाई सिर्फ 2 अंकों से अमन बिहार टॉपर बनने से चूक गए। एक हफ्ते में दो बड़े रिजल्ट, टॉपर में बेटियों का दबदबा रविवार को मैट्रिक का रिजल्ट जारी किया गया, जबकि इससे एक सप्ताह पहले 23 मार्च 2026 को इंटरमीडिएट के नतीजे घोषित हुए थे। इस वर्ष मैट्रिक परीक्षा में जमुई के सिमुलतला आवासीय विद्यालय की पुष्पांजलि कुमारी और वैशाली की सबरीन प्रवीण ने 98.4% अंक प्राप्त कर संयुक्त रूप से राज्य में पहला स्थान हासिल किया। गांव में जश्न, घर पर बधाई देने वालों की भीड़ अमन के शानदार प्रदर्शन की खबर जैसे ही गांव पहुंची, उनके घर पर बधाई देने वालों का तांता लग गया। रिश्तेदार, पड़ोसी और गांव के लोग इस सफलता को अपनी खुशी मानकर जश्न मनाने लगे। अमन के पिता निर्मल कुमार साह एक साधारण किसान हैं। वे खेती-बाड़ी के साथ-साथ राजमिस्त्री का काम कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। छह सदस्यों वाले इस परिवार में संसाधनों की कमी जरूर है, लेकिन हौसले की कोई कमी नहीं। स्कूल में सम्मान, प्रिंसिपल ने पहनाई माला अमन की सफलता पर उनके स्कूल में भी खुशी का माहौल रहा। स्कूल के प्रिंसिपल रविकांत कुमार ने उन्हें माला पहनाकर सम्मानित किया और मिठाई खिलाकर उनकी उपलब्धि की सराहना की। इस मौके पर अमन ने अपने शिक्षकों, माता-पिता और सभी शुभचिंतकों का आशीर्वाद लिया। उनके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आंखों में दो अंकों की कसक भी साफ झलक रही थी। हर दिन 6 घंटे पढ़ाई, यही बना सफलता का मंत्र अमन ने अपनी सफलता का श्रेय नियमित मेहनत और अनुशासन को दिया। उन्होंने बताया कि वे प्रतिदिन करीब 6 घंटे सेल्फ स्टडी करते थे। इसके अलावा सभी विषयों पर समान ध्यान दिया। स्कूल की नियमित कक्षाओं में शामिल हुए। शिक्षकों के मार्गदर्शन को गंभीरता से अपनाया। अमन कहते हैं कि माता-पिता का आशीर्वाद और शिक्षकों का सहयोग उनकी सफलता की सबसे बड़ी ताकत रही। सिर्फ 2 अंक… और रह गया सपना अधूरा अमन की कहानी में सबसे भावुक पहलू यही है कि वह सिर्फ दो अंकों से स्टेट टॉपर बनने से चूक गए। उन्होंने बताया कि थ्योरी और प्रैक्टिकल में अच्छे अंक मिले थे, लेकिन इंटरव्यू के दौरान हिंदी विषय से जुड़े एक सवाल कहानी और उसके लेखक का जवाब नहीं दे पाए। यही दो अंक उनके लिए निर्णायक साबित हुए। अमन ने कहा, अगर वो सवाल बता पाता, तो शायद आज मैं भी टॉपर होता। गरीबी के बीच बड़ा सपना: इंजीनियर बनना है अमन का सपना साफ है—उन्हें आगे चलकर इंजीनियर बनना है। लेकिन आर्थिक स्थिति उनके इस सपने के रास्ते में बड़ी चुनौती है। उनके पिता निर्मल कुमार साह कहते हैं, अमन बहुत मेहनती और मेधावी है। हम और मेहनत करेंगे, लेकिन उसके सपनों को पूरा जरूर करेंगे। मां सुनीता देवी भी बेटे की सफलता से बेहद खुश हैं। उन्होंने कहा, मेरा आशीर्वाद हमेशा अमन के साथ है। संघर्ष, मेहनत और हौसले की कहानी अमन की सफलता सिर्फ अंकों की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, मेहनत और हौसले की मिसाल है। एक छोटे से गांव में सीमित संसाधनों के बीच रहकर, किसान पिता के बेटे ने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो हालात भी रास्ता नहीं रोक सकते। दो अंक भले ही उन्हें टॉपर बनने से रोक गए, लेकिन उन्होंने यह दिखा दिया कि असली जीत रैंक में नहीं, बल्कि मेहनत और जिद में होती है। कटिहार के मांसाही प्रखंड के चकमा गांव में रविवार की सुबह खुशी और हल्की कसक दोनों लेकर आई। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा 10वीं परीक्षा का परिणाम घोषित होते ही किसान के बेटे अमन ने 479 अंक (95.8%) हासिल कर जिले में पहला स्थान प्राप्त किया। लेकिन यह सफलता एक अधूरी ख्वाहिश भी साथ लाई सिर्फ 2 अंकों से अमन बिहार टॉपर बनने से चूक गए। एक हफ्ते में दो बड़े रिजल्ट, टॉपर में बेटियों का दबदबा रविवार को मैट्रिक का रिजल्ट जारी किया गया, जबकि इससे एक सप्ताह पहले 23 मार्च 2026 को इंटरमीडिएट के नतीजे घोषित हुए थे। इस वर्ष मैट्रिक परीक्षा में जमुई के सिमुलतला आवासीय विद्यालय की पुष्पांजलि कुमारी और वैशाली की सबरीन प्रवीण ने 98.4% अंक प्राप्त कर संयुक्त रूप से राज्य में पहला स्थान हासिल किया। गांव में जश्न, घर पर बधाई देने वालों की भीड़ अमन के शानदार प्रदर्शन की खबर जैसे ही गांव पहुंची, उनके घर पर बधाई देने वालों का तांता लग गया। रिश्तेदार, पड़ोसी और गांव के लोग इस सफलता को अपनी खुशी मानकर जश्न मनाने लगे। अमन के पिता निर्मल कुमार साह एक साधारण किसान हैं। वे खेती-बाड़ी के साथ-साथ राजमिस्त्री का काम कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। छह सदस्यों वाले इस परिवार में संसाधनों की कमी जरूर है, लेकिन हौसले की कोई कमी नहीं। स्कूल में सम्मान, प्रिंसिपल ने पहनाई माला अमन की सफलता पर उनके स्कूल में भी खुशी का माहौल रहा। स्कूल के प्रिंसिपल रविकांत कुमार ने उन्हें माला पहनाकर सम्मानित किया और मिठाई खिलाकर उनकी उपलब्धि की सराहना की। इस मौके पर अमन ने अपने शिक्षकों, माता-पिता और सभी शुभचिंतकों का आशीर्वाद लिया। उनके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आंखों में दो अंकों की कसक भी साफ झलक रही थी। हर दिन 6 घंटे पढ़ाई, यही बना सफलता का मंत्र अमन ने अपनी सफलता का श्रेय नियमित मेहनत और अनुशासन को दिया। उन्होंने बताया कि वे प्रतिदिन करीब 6 घंटे सेल्फ स्टडी करते थे। इसके अलावा सभी विषयों पर समान ध्यान दिया। स्कूल की नियमित कक्षाओं में शामिल हुए। शिक्षकों के मार्गदर्शन को गंभीरता से अपनाया। अमन कहते हैं कि माता-पिता का आशीर्वाद और शिक्षकों का सहयोग उनकी सफलता की सबसे बड़ी ताकत रही। सिर्फ 2 अंक… और रह गया सपना अधूरा अमन की कहानी में सबसे भावुक पहलू यही है कि वह सिर्फ दो अंकों से स्टेट टॉपर बनने से चूक गए। उन्होंने बताया कि थ्योरी और प्रैक्टिकल में अच्छे अंक मिले थे, लेकिन इंटरव्यू के दौरान हिंदी विषय से जुड़े एक सवाल कहानी और उसके लेखक का जवाब नहीं दे पाए। यही दो अंक उनके लिए निर्णायक साबित हुए। अमन ने कहा, अगर वो सवाल बता पाता, तो शायद आज मैं भी टॉपर होता। गरीबी के बीच बड़ा सपना: इंजीनियर बनना है अमन का सपना साफ है—उन्हें आगे चलकर इंजीनियर बनना है। लेकिन आर्थिक स्थिति उनके इस सपने के रास्ते में बड़ी चुनौती है। उनके पिता निर्मल कुमार साह कहते हैं, अमन बहुत मेहनती और मेधावी है। हम और मेहनत करेंगे, लेकिन उसके सपनों को पूरा जरूर करेंगे। मां सुनीता देवी भी बेटे की सफलता से बेहद खुश हैं। उन्होंने कहा, मेरा आशीर्वाद हमेशा अमन के साथ है। संघर्ष, मेहनत और हौसले की कहानी अमन की सफलता सिर्फ अंकों की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, मेहनत और हौसले की मिसाल है। एक छोटे से गांव में सीमित संसाधनों के बीच रहकर, किसान पिता के बेटे ने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो हालात भी रास्ता नहीं रोक सकते। दो अंक भले ही उन्हें टॉपर बनने से रोक गए, लेकिन उन्होंने यह दिखा दिया कि असली जीत रैंक में नहीं, बल्कि मेहनत और जिद में होती है।


