यूरिया की गुणवत्ता व मात्रा से समझौते के मूड में नहीं किसान

यूरिया की गुणवत्ता व मात्रा से समझौते के मूड में नहीं किसान

डॉ. रमेश ठाकुर – स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

खेतीबाड़ी के लिए यूरिया बुनियादी जरूरत है, लेकिन इसकी कालाबाजारी व दुरुपयोग की समस्या बनी रहती है। यूरिया माफियाओं की ओर से बॉर्डर के रास्ते नेपाल, भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में इसके ब्लैक करने की खबरें सामने आती रही हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूरिया की कालाबाजारी करने वालों पर एनएसए कानून के तहत कार्रवाई करने का निर्णय लिया है।

केंद्र सरकार ने यूरिया नीति में बदलाव किया है, लेकिन किसान इससे नाखुश हैं और धरने-आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं। नई नीति के तहत यूरिया के बोरे के वजन में 10 किलो की कटौती की गई है। सालों से यूरिया की एक बोरी 50 किलो वजन की होती थी जिसे अब 40 किलो किया गया है। साथ ही उसमें प्रयुक्त नाइट्रोजन की मात्रा को भी कम किया है। पहले एक बोरे में 46 फीसदी नाइट्रोजन होता था, उसमें कटौती करके अब 36 फीसदी किया है, जबकि किसानों की मांग सालों से यूरिया के प्रत्येक कट्टे में नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाने और सब्सिडी ज्यादा करने की रही है।

इस बदलाव के पीछे सरकार की मंशा ‘नीम कोटेड’ और ‘नैनो यूरिया’ पर ज्यादा जोर देना है जिसका मुख्य उद्देश्य यूरिया की कालाबाजारी को रोकना, उर्वरक की खपत को संतुलित करना और कृषि उत्पादकता में बढ़ोतरी करना है। इस कड़ी में नई निवेश नीति के तहत समान 12.7 लाख मीट्रिक टन वार्षिक क्षमता वाली छह नई यूरिया इकाइयों की स्थापना भी देश के विभिन्न हिस्सों में की गई है। तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड और राजस्थान में नई इकाइयों ने काम करना आरंभ भी कर दिया है। बावजूद इसके किसान यूरिया की गुणवत्ता व मात्रा से समझौते के मूड में नहीं हैं।

नई यूरिया नीति पर सरकार के फैसले से सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर दबाव और ग्रामीण असंतोष जैसे दुष्परिणाम की आशंकाएं हैं। खाद सुरक्षा किसी भी मुल्क की क्षमता-सुरक्षा, संप्रभुता और सामाजिक स्थिरता का अटूट आधार होती है। भारत में यूरिया का सबसे बड़ा उत्पादक हब ‘इफको’ है जो सालाना 84 लाख टन यूरिया का विपणनकर्ता है। केंद्र सरकार अब इफको पर निर्भर नहीं रहना चाहती। इसलिए उनका नवीनतम नीम कोटेड यूरिया और नैनो यूरिया पर ज्यादा फोकस है।

नैनो यूरिया उत्पादन का एशिया में सबसे बड़ा संयंत्र गुजरात में लग चुका है। कृषि कल्याण कानून के तहत दशकों से किसानों को यूरिया पर सब्सिडी मिलती आई है। सरकार सब्सिडी का भार कम करना चाहती है। इसलिए यूरिया के रेट में इस सीजन से बढ़ोतरी भी की गई है; इससे भी किसानों के भीतर आक्रोश है। इनका कहना है कि कृषि पर फैसले जमीन की भौगोलिक परिस्थितियों और वैज्ञानिक निर्णयों के आधार पर किए जाने चाहिए।

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