भास्कर न्यूज|मधुबनी जिले में एक बार फिर मौसम में आईं बदलाव से ठंड में इजाफा हुआ है। शनिवार को कुहासे के साथ बही पछिया हवा ने लोगों को कंपकपी भरी ठंड का एहसास कराया। जिले में लगातार जारी कड़ाके की ठंड व शीतलहर की रहने के बाद अब दिन में चटख धूप निकलने पर बढ़ते तापमान से रबी फसलों में रोग लगने की आशंका बढ़ गई है। तापमान में तेजी से हो रहे उतार-चढ़ाव का सीधा असर मटर और चना समेत सरसों जैसी संवेदनशील फसलों पर पड़ रहा है। इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। मौसम विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिकों ने इसको लेकर एडवाइजरी जारी करते हुए किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करने तथा रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही त्वरित उपचार करने की सलाह दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, लंबे समय तक ठंड और पाले जैसे असर के कारण फसलों की बढ़वार पहले से ही प्रभावित रही है। ऐसे में अब अचानक तापमान बढ़ने और नमी में बदलाव से फसलों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। इसी कारण इस मौसम में फफूंद जनित रोगों के साथ-साथ लाही जैसे कीटों का प्रकोप भी तेजी से फैलने लगता है। कृषि मौसम वैज्ञानिक डॉ ए सत्तार ने बताया कि मटर और चना की फसल में पत्ती झुलसा, जड़ सड़न तथा अन्य फफूंद जनित रोगों का खतरा अधिक रहता है। समय पर उपचार नहीं होने की स्थिति में उत्पादन पर भारी असर पड़ सकता है। तापमान के उतार-चढ़ाव के समय रोग का खतरा कड़ाके की ठंड के बीच अचानक तापमान बढ़ने से रोग का खतरा बन जाता है। तेज धूप फफूंद को तेजी से सक्रिय कर देती है। सरसों पर लाही लगने का खतरा बना हुआ है। कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि खेतों का हर 2-3 दिन पर निरीक्षण करें और पत्तियों के रंग, धब्बों व झुलसने पर विशेष ध्यान दें। सुबह ओस सूखने के बाद ही फसलों में दवा का छिड़काव करें। रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही अनुशंसित फफूंदनाशक का प्रयोग करें। मटर और चना में रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर खेत से बाहर नष्ट करें। यूं तो वर्तमान मौसम खेती के लिए सामान्य रूप से अनुकूल है, लेकिन लगातार शीतलहर के बाद दिन में तीखी धूप और रात में पाले जैसी स्थिति फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है। देर से बोई गई गेहूं की फसल यदि 21-25 दिन की हो गई है तो उसकी सिंचाई करें। जिला कृषि कार्यालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार जिला कृषि पदाधिकारी ने बताया कि रब्बी व दलहन के लक्ष्य के करीब जिला पहुंचा। भास्कर न्यूज|मधुबनी जिले में एक बार फिर मौसम में आईं बदलाव से ठंड में इजाफा हुआ है। शनिवार को कुहासे के साथ बही पछिया हवा ने लोगों को कंपकपी भरी ठंड का एहसास कराया। जिले में लगातार जारी कड़ाके की ठंड व शीतलहर की रहने के बाद अब दिन में चटख धूप निकलने पर बढ़ते तापमान से रबी फसलों में रोग लगने की आशंका बढ़ गई है। तापमान में तेजी से हो रहे उतार-चढ़ाव का सीधा असर मटर और चना समेत सरसों जैसी संवेदनशील फसलों पर पड़ रहा है। इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। मौसम विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिकों ने इसको लेकर एडवाइजरी जारी करते हुए किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करने तथा रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही त्वरित उपचार करने की सलाह दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, लंबे समय तक ठंड और पाले जैसे असर के कारण फसलों की बढ़वार पहले से ही प्रभावित रही है। ऐसे में अब अचानक तापमान बढ़ने और नमी में बदलाव से फसलों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। इसी कारण इस मौसम में फफूंद जनित रोगों के साथ-साथ लाही जैसे कीटों का प्रकोप भी तेजी से फैलने लगता है। कृषि मौसम वैज्ञानिक डॉ ए सत्तार ने बताया कि मटर और चना की फसल में पत्ती झुलसा, जड़ सड़न तथा अन्य फफूंद जनित रोगों का खतरा अधिक रहता है। समय पर उपचार नहीं होने की स्थिति में उत्पादन पर भारी असर पड़ सकता है। तापमान के उतार-चढ़ाव के समय रोग का खतरा कड़ाके की ठंड के बीच अचानक तापमान बढ़ने से रोग का खतरा बन जाता है। तेज धूप फफूंद को तेजी से सक्रिय कर देती है। सरसों पर लाही लगने का खतरा बना हुआ है। कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि खेतों का हर 2-3 दिन पर निरीक्षण करें और पत्तियों के रंग, धब्बों व झुलसने पर विशेष ध्यान दें। सुबह ओस सूखने के बाद ही फसलों में दवा का छिड़काव करें। रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही अनुशंसित फफूंदनाशक का प्रयोग करें। मटर और चना में रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर खेत से बाहर नष्ट करें। यूं तो वर्तमान मौसम खेती के लिए सामान्य रूप से अनुकूल है, लेकिन लगातार शीतलहर के बाद दिन में तीखी धूप और रात में पाले जैसी स्थिति फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है। देर से बोई गई गेहूं की फसल यदि 21-25 दिन की हो गई है तो उसकी सिंचाई करें। जिला कृषि कार्यालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार जिला कृषि पदाधिकारी ने बताया कि रब्बी व दलहन के लक्ष्य के करीब जिला पहुंचा।


