इंदौर में विटामिन D की कमी एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या के रूप में सामने आ रही है। हाल ही के 9 हजार से ज्यादा लोगों के स्वास्थ्य परीक्षण में यह सामने आया है कि शहर में महिलाओं और पुरुषों दोनों में 36 से 37% लोग विटामिन D की कमी से ग्रस्त हैं। एक्सपर्ट्स ने इस पर चिंता जताई है। डॉक्टरों के अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह बदलती लाइफ स्टाइल, वर्क फ्रॉम होम कल्चर और एयर कंडीशनिंग वाले बंद माहौल में अधिक समय बिताना है। ऐसे माहौल में लोगों को पर्याप्त धूप नहीं मिल पा रही है। यह जानकारी कोकिलाबेन धीरुबाई अंबानी हॉस्पिटल की सालाना हेल्थ स्टडी में सामने आई है। इनमें 3454 महिलाओं और 5964 पुरुषों को आयु वर्ग में बांटा गया। एक 45 वर्ष से कम उम्र और दूसरा 45 वर्ष या उससे ज्यादा। इसमें पाया गया कि 36.30% पुरुषों और 37.30% महिलाओं में विटामिन डी की कमी है जो अधिक उम्र के लोगों में सबसे ज्यादा थी। रिपोर्ट के अनुसार- 3454 महिलाओं की जांच की गई, जिनमें से 1288 महिलाओं में विटामिन D की कमी पाई गई। इसी तरह 5964 पुरुषों के परीक्षण में 2164 पुरुषों में विटामिन D की कमी दर्ज की गई। कुल मिलाकर यह आंकड़ा 37 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है। बदलती लाइफ स्टाइल बना रही शरीर को कमजोर कंसलटेंट क्लालिटी चीफ डॉ. गौरव शैलगांवकर का कहना है कि मानव शरीर मूल रूप से खुले वातावरण में काम करने के लिए बना है। पहले लोग खेती, श्रम और आउटडोर गतिविधियों से जुड़े रहते थे, लेकिन अब बड़ी संख्या में लोग कॉर्पोरेट और केबिन आधारित नौकरियों में काम कर रहे हैं। लंबे समय तक बंद कमरों में रहने और एसी वातावरण में काम करने से शरीर को प्राकृतिक धूप नहीं मिल पाती, जिससे विटामिन D का स्तर गिर रहा है। बच्चों में भी बढ़ रही समस्या डॉक्टरों ने चिंता जताई कि अब यह समस्या केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रही। पहले बच्चे क्रिकेट, कबड्डी और अन्य आउटडोर खेलों में सक्रिय रहते थे, लेकिन अब सोशल मीडिया, मोबाइल गेम्स और इनडोर गतिविधियों में अधिक समय बिताने के कारण बच्चों में भी विटामिन D की कमी के मामले सामने आ रहे हैं। हड्डियों से लेकर मानसिक स्वास्थ्य तक असर एक्सपर्टस के अनुसार विटामिन D शरीर में कैल्शियम को हड्डियों तक पहुंचाने में मदद करता है। इसकी कमी से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस और बार-बार फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा विटामिन D बालों को स्वस्थ रखने में मदद करता है और इसकी कमी से डिप्रेशन, थकान और चिड़चिड़ापन भी देखा गया है। खासकर मेनोपॉज के बाद महिलाओं में इसका असर ज्यादा गंभीर हो सकता है, क्योंकि इस उम्र में शरीर को अधिक कैल्शियम की आवश्यकता होती है। धूप और संतुलित आहार है सबसे बड़ा इलाज डॉक्टरों के अनुसार रोज़ाना सुबह 15 से 20 मिनट प्राकृतिक धूप लेना विटामिन-D का सबसे अच्छा स्रोत है, लेकिन वर्क फ्रॉम होम और एसी लाइफस्टाइल के कारण यह अब संभव नहीं हो पा रहा। ऐसे में संतुलित आहार बेहद जरूरी है। डॉक्टरों ने लोगों को मिलेट्स, टोफू, दूध, पनीर और कैल्शियम-युक्त खाद्य पदार्थों को सीमित लेकिन नियमित रूप से लेने की सलाह दी है। जांच और इलाज जरूरी डॉक्टरों की सलाह है कि लोग विटामिन-D की नियमित जांच कराएं। यदि स्तर कम पाया जाए तो डॉक्टर की सलाह से विटामिन-D सप्लीमेंट या टेबलेट लें और खुद से दवा लेने से बचें। लाइफ स्टाइल में बदलाव ही स्थायी समाधान एक्सपर्टस का कहना है कि विटामिन-D की कमी को दूर करने के लिए केवल दवाइयां काफी नहीं हैं। इसके लिए लाइफ स्टाइल में बदलाव, आउटडोर गतिविधियों को बढ़ाना और स्क्रीन टाइम कम करना बेहद जरूरी है। समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में हड्डियों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं और बढ़ सकती हैं। सालाना हेस्थ स्टडी में ये फैक्ट्स भी… – विटामिन बी-12 की कमी भी एक चिंता का विषय रही। रिपोर्ट में 13.60% पुरुष और 9.30% महिलाएं प्रभावित पाई गई। यह समस्या भी विशेष रूप से अधिक उम्र के वयस्कों में अधिक थी। – हल्का से मध्यम एनीमियाः यह पुरुषों (1.9%) की तुलना में महिलाओं (10%) में अधिक पाया गया। – 45 वर्ष से अधिक उम के वयस्कों मेंः महिलाओं में इसकी दर 0.20% और पुरुषों में 0.15% देखी गई। गंभीर एनीमियाः कुल महिलाओं में यह 0.60% और पुरुषों में 0.30% पाया गया। 45 वर्ष से अधिकः महिलाओं में 0.20% और पुरुषों में 0.15%। 45 वर्ष से कमः महिलाओं में 0.40% और पुरुषों में 0.15%। निष्कर्षः गंभीर एनीमिया के मामले कम थे, लेकिन इसमें भी महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना मे अधिक होने का समान ट्रेंड देखा गया। प्री-डायबिटीज और डायबिटीज प्री-डायबिटीजः फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c लेवल के आधार पर प्री-डायबिटीज के नामले काफी अधिक पाए गए। इससे 30.90% पुरुष और 29% महिलाएं प्रभावित थीं और 15 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में इसकी दर ज्यादा देखी गई। खास बात यह कि लोगों के लिए अर्लामिंग है क्योंकि प्री-डायबिटीज को अवेयरनेस, प्रिवेंशन से डायबिटीज की ओर जाने से फिर से नॉर्मल की ओर मूव किया जा सकता है। डायबिटीजः यह मामले भी काफी ज्यादा पाए गए।16.2% पुरुष और 12.20% महिलाएं ग्रसित पाई गई। इसमें भी मुख्य रूप से अधिक उम्र के वयस्क ही प्रभावित थे। किडनी की कार्यक्षमता के संकेत क्रिएटिनिन का स्तरः किडनी की कार्यक्षमता दर्शाने वाले क्रिएटिनिन का स्तर महिलाओं (0.80%) की तुलना में पुरुषों (1.90%) में अधिक पाया गया। साथ ही, अधिक उम्र के लोगों में यह समस्या ज्यादा देखी गई। थायराइड: हाइपोथायरायडिज़मः यह 12.50% महिलाओं और 6.90% पुरुषों में पाया गया। यह समस्या अधिक उम्र के व्यक्तियों, विशेषकर महिलाओं में अधिक देखी गई। हाइपरथायरायडिज्मः इसके मामले काफी कम थे, जिससे 0.62% महिलाएं और 0.12% पुरुष प्रभावित पाए गए। 45 वर्ष से अधिक आयु वर्गः इस वर्ग में हाइपोथायरायडिज्म की दर पुरुषों में 0.12% और महिलाओं में 0.42% रही। मरीजों की बेहतर देखभाल प्राथमिकता हॉस्पिटल के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. संतोष शेट्टी ने कहा कि मरीजों की बेहतर देखभाल प्राथमिकता रही है। वाइस प्रेसिडेंट सुनील मेहता ने कहा कि मरीजों के जांच आंकड़ों के एनालिसिस पर आधारित हेल्थ कार्ड एनीमिया, प्रीडायबिटीज, डायबिटीज, किडनी रोग, थायराइड ईओसिनोफिलिया, विटामिन डी और बी12 की कमी और प्रोस्टेट से जुड़ी समस्याओं को सामने लाता है।


