इंटरनेट और सोशल मीडिया से पूरी दुनिया हमारी हथेली पर सिमट गई। जाने-अनजाने दोस्तों के अलावा न्यूज चैनल्स, रील्स ने हमें चौबीसों घंटे बांधे रखती है। लेकिन भीतर की खामोशी हमें अकेला कर रही है। अकेलेपन को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) इसे ‘वैश्विक स्वास्थ्य खतरा’ घोषित कर चुका है। हैरानी की बात ये है कि जिसे कभी सिर्फ बुजुर्गों की समस्या माना जाता था, वह अब युवा और बच्चों को भी चपेट में ले रही है। डब्लूएचओ और द लैंसेट की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में चार में एक वयस्क सामाजिक अलगाव या अकेलेपन का सामना कर रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक लंबे समय तक अकेलापन महसूस करना स्वास्थ्य के उतना ही हानिकारक है, जितना एक दिन में 15 सिगरेट पीना। यह मोटापे और शारीरिक निष्क्रियता से भी ज्यादा घातक है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कम आय वाले देशों में अकेलेपन की दर सबसे ज्यादा 24 फीसदी है, जो उच्च आर्य वर्ग वाले देशों में लगभग 11 फीसदी है।
चौंकाते हैं आंकड़े
- 2024 में जिन युवाओं को चिंता और अवसाद का सामना करना पड़ा, उनमें 81 फीसदी अकेले रहने वाले थे।
- 30 वर्ष से कम उम्र के 25त्न जबकि 30-44 आयु वर्ग के 29 फीसदी अकेलापन महससू करते हैं।
- बीमारी की अवस्था में अकेलापन मौत का जोखिम 26 प्रतिशत बढ़ा देता है।
- भारत में 50 फीसदी युवा अकेलापन महससू करते हैं, यह उत्पादकता पर 10 अरब डॉलर का सालाना प्रभाव डाल सकता है। (स्रोत : डब्लूएचओ, हार्वड का अध्ययन, फॉच्र्यून मैगजीन, कैंपेन टू एंड लोनलीनेस)
इसलिए बढ़ रहा अकेलापन
- सोशल मीडिया-इंटरनेट पर सक्रियता, असल जीवन से कट रहे हैं।
- लॉकडाउन के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग से भावनात्मक अलगाव बढ़ा।
- बेरोजगारी, नौकरी में तनाव, रिश्तें में तल्खी से जुड़ाव कम हो रहा।
क्या करें
- स्कूल, कार्यस्थल और घर-परिवार में सामाजिक जुड़ाव को प्राथमिकता दें।
- स्थानीय लोगों और सामुदायिक कार्यक्रमों से जुड़ें
- घर में बुजुर्गों और बच्चों से नियमित बातचीत करें।
मेलजोल बढ़ाएं, शौक को समय दें: डॉ पीएल भालोठिया
जयपुर के एमएमएस मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सक डॉ पीएल भालोठिया ने कहा, अकेलेपन में व्यक्ति सामाजिक या भावनात्मक रूप से खुद को अलग-थलग महसूस करता है। इससे एंजाइटी, आत्मविश्वास की कमी, डिप्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इससे बचने के लिए सामाजिक मेलजोल बढ़ाएं, संयुक्त परिवार कल्चर से जुड़ें, परिवार-मित्रों से बात करें और अपने शौक को समय दें। मनोचिकित्सक की राय लें।


