Amitabh Bachchan Health Problem: भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्चन सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक पहचान हैं। उनकी दमदार आवाज, मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस और घंटों तक काम करने की क्षमता उन्हें अलग बनाती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि एक समय ऐसा भी आया था जब एक गंभीर बीमारी की वजह से उनका करियर ही खतरे में पड़ गया था। यह कहानी सिर्फ एक सुपरस्टार की नहीं, बल्कि सेहत को समय पर समझने और संभालने की सीख देती है।
1980 के दशक के अंत में अमिताभ बच्चन लगातार थकान और कमजोरी महसूस करने लगे थे। शूटिंग के दौरान मांसपेशियां जल्दी जवाब देने लगीं। पहले जो काम आसानी से हो जाता था, वही भारी लगने लगा। यह सामान्य थकान नहीं थी। जब जांच हुई तो डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें मायस्थीनिया ग्रेविस नाम की एक दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी है।
मायस्थीनिया ग्रेविस क्या है?
मायस्थीनिया ग्रेविस एक ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर की इम्यून सिस्टम गलती से नसों और मांसपेशियों के बीच के सिग्नल को नुकसान पहुंचाने लगती है। आम तौर पर दिमाग से मांसपेशियों तक साफ संदेश जाते हैं, लेकिन इस बीमारी में वह संदेश ठीक से नहीं पहुंच पाते। नतीजा होता है मांसपेशियों की कमजोरी, जो काम करने के बाद और बढ़ जाती है।
इस बीमारी के आम लक्षण (Symptoms)
मायस्थीनिया ग्रेविस के लक्षण हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं, लेकिन आम तौर पर इनमें शामिल हैं:
- बिना ज्यादा मेहनत के भी मांसपेशियों में कमजोरी
- थोड़ी देर काम करने पर अचानक थकान
- पलकें झुकना या आंखों से साफ न दिखना
- बोलने में दिक्कत या आवाज का लड़खड़ाना
- चबाने और निगलने में परेशानी
- चेहरे की मांसपेशियों पर कंट्रोल कम होना
- आराम करने पर कुछ देर के लिए सुधार महसूस होना
यही बात इस बीमारी को पहचानने में मदद करती है कि आराम से हालत बेहतर हो जाती है, लेकिन दोबारा एक्टिव होते ही कमजोरी लौट आती है।
सेहत के नजरिए से क्या सीख मिलती है?
अमिताभ बच्चन की कहानी बताती है कि लगातार थकान और कमजोरी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई लोग इसे उम्र, काम का दबाव या तनाव समझकर टाल देते हैं। लेकिन कभी-कभी यह किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है। इस बीमारी में जबरदस्ती काम करना नुकसानदेह हो सकता है। अमिताभ ने भी यही समझा काम की रफ्तार धीमी की, डॉक्टरों की सलाह मानी और अपने शरीर की सीमाओं को स्वीकार किया। सही इलाज, दवाइयों और लाइफस्टाइल में बदलाव से उनकी हालत में सुधार हुआ। आज भी वह सक्रिय हैं, काम कर रहे हैं और लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि सेहत सबसे बड़ी पूंजी है। समय पर लक्षण पहचानना, इलाज लेना और शरीर की सुनना ही लंबी और स्वस्थ जिंदगी की कुंजी है।


