केंद्र सरकार की ओर से एथेनॉल पॉलिसी में बदलाव किया गया है। इससे बेगूसराय के इकलौते एथेनॉल फैक्ट्री ‘न्यूवे होम्स’ (NEWWAY) गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। बिहार सरकार के कद्दावर मंत्री के रिश्तेदार की ये फैक्ट्री 25 दिनों से बंद है। कंपनी में काम करने वाले 250 से अधिक कर्मी रोजाना सुबह आते हैं और शाम को लौट जाते हैं। सबसे अधिक खराब हालत अनाज लोडिंग-अनलोडिंग का काम करने वाले मजदूरों की है। उन्हें काम नहीं मिल रहा है और उनके मन में बेरोजगारी के बाद पलायन का डर भर गया है। उधर, प्रबंधन का कहना है कि अगर पॉलिसी में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में प्लांट को पूरी तरह बंद करना पड़ सकता है, जिससे सैकड़ों मजदूर और स्टाफ बेरोजगार हो जाएंगे। एथेनॉल पॉलिसी में पहले के बदलाव से मक्का के दाम में कमी आई थी समस्या सिर्फ फैक्ट्री प्रबंधन और मजदूर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मक्का उत्पादन के लिए चर्चित बेगूसराय और आसपास के किसानों के लिए भी ये चिंता का विषय है। क्योंकि एथेनॉल पॉलिसी में पूर्व में किए गए बदलाव से मक्का के दाम में कमी आई थी और अब के बदलाव से तो किसानों की कमर टूटनी है। पहले जरूरी था कि मक्का आधारित प्लांट लगेगा और मक्का से उत्पादन एथेनॉल बनेगा। जब प्लांट खुले तो मक्का के दाम में भी वृद्धि हुई। आमतौर पर 15 रुपए किलो बिकने वाला मक्का 25 रुपए किलो तक बिकने लगा। रवि सीजन में किए गए मक्के की खेती किसानों के लिए आय का प्रमुख स्रोत बना। फैक्ट्री प्रबंधन के लिए फायदेमंद था कि यह लोग मक्का से एथेनॉल बनाने के बाद उसके बेस्ट को बॉयो प्रोडक्ट के रूप में सप्लाई कर देते थे। प्रबंधन, कर्मचारी, मजदूर, किसान सब हैरान… पता नहीं क्या होगा 2024 में सरकार ने कहा कि अब एथेनॉल फैक्ट्री को 60 प्रतिशत ही मक्का खरीदना है और उसमें 40 प्रतिशत चावल मिलाना होगा। चावल एफसीआई से लेने के लिए बाध्य कर दिया गया और दाम तय कर दिया गया 23 रुपए किलो। मजबूरी में जब चावल खरीदना शुरू किया तो मक्का की खरीद में कमी हुई और मक्का का दाम कम होकर 16 से 18 रुपए किलो तक आ गया। अब जबकि सरकार में नई पॉलिसी बनाकर तेल कंपनियों को गन्ना से तैयार एथेनॉल लेने का आदेश दे दिया है तो अनाज आधारित इस एथेनॉल फैक्ट्री पर संकट के बादल छाए हुए। प्रबंधन, कर्मचारी और मजदूर, सबके सब हैरान-परेशान उहापोह की हालत में है कि पता नहीं क्या होगा। उत्पादन में भारी कटौती, स्टोरेज की समस्या न्यूवे फैक्ट्री के टेक्नो-कॉमर्शियल मैनेजर मनीष त्रिपाठी ने दैनिक भास्कर को बताया कि फैक्ट्री की मासिक उत्पादन क्षमता 40 लाख लीटर है। पहले ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) फैक्ट्री के कुल उत्पादन का 100 प्रतिशत हिस्सा खरीद लेती थी, जिससे प्लांट सुचारू रूप से चल रहा था। लेकिन पिछले तीन महीनों से ओएमसी केवल 60-70 प्रतिशत एथेनॉल ही उठा रही है। हमारे पास 10-12 लाख लीटर स्टोर करने की जगह है, जो अब पूरी तरह भर चुकी है। जब तक पिछला स्टॉक नहीं निकलेगा, हम नया उत्पादन नहीं कर सकते। मनीष त्रिपाठी ने ऐसे में प्लांट को बार-बार बंद करना पड़ रहा है। बार-बार प्लांट बंद करना किसी भी औद्योगिक इकाई के लिए आर्थिक रूप से आत्मघाती है। प्लांट बंद होने की स्थिति में भी मजदूरों और तकनीकी कर्मचारियों को वेतन देना पड़ रहा है। कोई भी कंपनी लंबे समय तक बिना आय के भारी भरकम सैलरी का बोझ नहीं उठा सकती। जब प्लांट लगाए गए थे तो सरकार ने कहा था कि पूरा प्रोत्साहन दिया जाएगा, सुचारू रूप से चलाने में कोई बाधा नहीं आने दी जाएगी। मजदूर बोले- कोरोना के वक्त लौटकर आए थे, अब कोई विकल्प नहीं बचेगा इस फैक्ट्री में काम करने वाले अधिकांश कर्मचारी और मजदूर बेगूसराय के ही रहने वाले हैं, जो कोरोना के लॉकडाउन के बाद अन्य राज्यों से लौटकर यहां आए थे। काम करने वाले टेक्निकल स्टाफ का कहना है कि अगर यह यूनिट बंद हुई, तो बेगूसराय में उनके पास काम का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा। उन्हें एक बार फिर हरियाणा, गुजरात या महाराष्ट्र की ओर रुख करना पड़ेगा। कोरोना में वापस लौटे थे, अब उनके सामने फिर से वही पुरानी स्थिति खड़ी होती दिख रही है। अनलोडिंग सुपरवाइजर दीपक कुमार ने बताया कि मजदूरों को काफी परेशानी हो रही है। यहां 100 लेबर काम करते थे, 10 से 15 सुपरवाइजर लोडिंग पॉइंट पर रहते थे। प्रोडक्शन कम होने से मजदूरों को परेशानी है कि 2 महीने से करीब प्लांट बंद रहा और मजदूर कम करना पड़ा। सुपरवाइजर को हटाना पड़ रहा है। यही स्थिति रही तो हम लोगों को भी नौकरी छोड़ना पड़ेगा। दीपक कुमार ने कहा कि हम लोग को यहां काम छोड़ना पड़ेगा। परदेस में काम करते थे, कोरोना के समय गांव आ गए। जीवन यापन कर रहे थे, यह प्लांट चालू हुआ तो काम मिल गया था, खुशी हुई। लेकिन फिर दिल्ली, मुंबई, पंजाब जाना पड़ेगा। यहां काम नहीं मिलेगा तो क्या करेंगे, प्रोडक्शन कम होगा तो प्लांट चलेगा नहीं, फिर हमारी नौकरी चली जाएगी, परदेस जाने की मजबूरी होगी। सरकार कहती है हम रोजगार ला रहे हैं, लेकिन यहां तो आया हुआ रोजगार वह खत्म हो रहा है। अनलोडिंग करने वाले मजदूर बोले- अब रोज काम नहीं मिल रहा है अनलोडिंग करने वाले मजदूर स्थानीय शंभू महतो, गोलू, ललन सहित अन्य बताया जब से यह फैक्ट्री खुला हमलोगों को परदेस में मोटिया का काम करने से राहत मिल गया था। लेकिन अब काम रोज नहीं मिल रहा है, अब हम लोग को फिर परदेस ही जाना पड़ेगा। महीना में मात्र 15 दिन काम मिल रहा है। पहले प्रत्येक महीना 26-27 हजार रूपया कमा लेते थे। अभी 10 से 12 हजार ही कमा पाते हैं, ऐसे में परिवार कैसे चलेगा। अभी बस 50 लोग काम कर रहे हैं और सब के सब परेशान हैं। एथेनॉल पॉलिसी में केंद्र ने क्या बदलाव किया है? जानकार कहते हैं कि अधिकतर चीनी मिल महाराष्ट्र और गुजरात में है, जो बड़े-बड़े नेताओं और बड़े कॉर्पोरेट घरानों के हैं, इसलिए यह निर्णय लिया गया है। केंद्र सरकार की ओर से एथेनॉल पॉलिसी में बदलाव किया गया है। इससे बेगूसराय के इकलौते एथेनॉल फैक्ट्री ‘न्यूवे होम्स’ (NEWWAY) गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। बिहार सरकार के कद्दावर मंत्री के रिश्तेदार की ये फैक्ट्री 25 दिनों से बंद है। कंपनी में काम करने वाले 250 से अधिक कर्मी रोजाना सुबह आते हैं और शाम को लौट जाते हैं। सबसे अधिक खराब हालत अनाज लोडिंग-अनलोडिंग का काम करने वाले मजदूरों की है। उन्हें काम नहीं मिल रहा है और उनके मन में बेरोजगारी के बाद पलायन का डर भर गया है। उधर, प्रबंधन का कहना है कि अगर पॉलिसी में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में प्लांट को पूरी तरह बंद करना पड़ सकता है, जिससे सैकड़ों मजदूर और स्टाफ बेरोजगार हो जाएंगे। एथेनॉल पॉलिसी में पहले के बदलाव से मक्का के दाम में कमी आई थी समस्या सिर्फ फैक्ट्री प्रबंधन और मजदूर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मक्का उत्पादन के लिए चर्चित बेगूसराय और आसपास के किसानों के लिए भी ये चिंता का विषय है। क्योंकि एथेनॉल पॉलिसी में पूर्व में किए गए बदलाव से मक्का के दाम में कमी आई थी और अब के बदलाव से तो किसानों की कमर टूटनी है। पहले जरूरी था कि मक्का आधारित प्लांट लगेगा और मक्का से उत्पादन एथेनॉल बनेगा। जब प्लांट खुले तो मक्का के दाम में भी वृद्धि हुई। आमतौर पर 15 रुपए किलो बिकने वाला मक्का 25 रुपए किलो तक बिकने लगा। रवि सीजन में किए गए मक्के की खेती किसानों के लिए आय का प्रमुख स्रोत बना। फैक्ट्री प्रबंधन के लिए फायदेमंद था कि यह लोग मक्का से एथेनॉल बनाने के बाद उसके बेस्ट को बॉयो प्रोडक्ट के रूप में सप्लाई कर देते थे। प्रबंधन, कर्मचारी, मजदूर, किसान सब हैरान… पता नहीं क्या होगा 2024 में सरकार ने कहा कि अब एथेनॉल फैक्ट्री को 60 प्रतिशत ही मक्का खरीदना है और उसमें 40 प्रतिशत चावल मिलाना होगा। चावल एफसीआई से लेने के लिए बाध्य कर दिया गया और दाम तय कर दिया गया 23 रुपए किलो। मजबूरी में जब चावल खरीदना शुरू किया तो मक्का की खरीद में कमी हुई और मक्का का दाम कम होकर 16 से 18 रुपए किलो तक आ गया। अब जबकि सरकार में नई पॉलिसी बनाकर तेल कंपनियों को गन्ना से तैयार एथेनॉल लेने का आदेश दे दिया है तो अनाज आधारित इस एथेनॉल फैक्ट्री पर संकट के बादल छाए हुए। प्रबंधन, कर्मचारी और मजदूर, सबके सब हैरान-परेशान उहापोह की हालत में है कि पता नहीं क्या होगा। उत्पादन में भारी कटौती, स्टोरेज की समस्या न्यूवे फैक्ट्री के टेक्नो-कॉमर्शियल मैनेजर मनीष त्रिपाठी ने दैनिक भास्कर को बताया कि फैक्ट्री की मासिक उत्पादन क्षमता 40 लाख लीटर है। पहले ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) फैक्ट्री के कुल उत्पादन का 100 प्रतिशत हिस्सा खरीद लेती थी, जिससे प्लांट सुचारू रूप से चल रहा था। लेकिन पिछले तीन महीनों से ओएमसी केवल 60-70 प्रतिशत एथेनॉल ही उठा रही है। हमारे पास 10-12 लाख लीटर स्टोर करने की जगह है, जो अब पूरी तरह भर चुकी है। जब तक पिछला स्टॉक नहीं निकलेगा, हम नया उत्पादन नहीं कर सकते। मनीष त्रिपाठी ने ऐसे में प्लांट को बार-बार बंद करना पड़ रहा है। बार-बार प्लांट बंद करना किसी भी औद्योगिक इकाई के लिए आर्थिक रूप से आत्मघाती है। प्लांट बंद होने की स्थिति में भी मजदूरों और तकनीकी कर्मचारियों को वेतन देना पड़ रहा है। कोई भी कंपनी लंबे समय तक बिना आय के भारी भरकम सैलरी का बोझ नहीं उठा सकती। जब प्लांट लगाए गए थे तो सरकार ने कहा था कि पूरा प्रोत्साहन दिया जाएगा, सुचारू रूप से चलाने में कोई बाधा नहीं आने दी जाएगी। मजदूर बोले- कोरोना के वक्त लौटकर आए थे, अब कोई विकल्प नहीं बचेगा इस फैक्ट्री में काम करने वाले अधिकांश कर्मचारी और मजदूर बेगूसराय के ही रहने वाले हैं, जो कोरोना के लॉकडाउन के बाद अन्य राज्यों से लौटकर यहां आए थे। काम करने वाले टेक्निकल स्टाफ का कहना है कि अगर यह यूनिट बंद हुई, तो बेगूसराय में उनके पास काम का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा। उन्हें एक बार फिर हरियाणा, गुजरात या महाराष्ट्र की ओर रुख करना पड़ेगा। कोरोना में वापस लौटे थे, अब उनके सामने फिर से वही पुरानी स्थिति खड़ी होती दिख रही है। अनलोडिंग सुपरवाइजर दीपक कुमार ने बताया कि मजदूरों को काफी परेशानी हो रही है। यहां 100 लेबर काम करते थे, 10 से 15 सुपरवाइजर लोडिंग पॉइंट पर रहते थे। प्रोडक्शन कम होने से मजदूरों को परेशानी है कि 2 महीने से करीब प्लांट बंद रहा और मजदूर कम करना पड़ा। सुपरवाइजर को हटाना पड़ रहा है। यही स्थिति रही तो हम लोगों को भी नौकरी छोड़ना पड़ेगा। दीपक कुमार ने कहा कि हम लोग को यहां काम छोड़ना पड़ेगा। परदेस में काम करते थे, कोरोना के समय गांव आ गए। जीवन यापन कर रहे थे, यह प्लांट चालू हुआ तो काम मिल गया था, खुशी हुई। लेकिन फिर दिल्ली, मुंबई, पंजाब जाना पड़ेगा। यहां काम नहीं मिलेगा तो क्या करेंगे, प्रोडक्शन कम होगा तो प्लांट चलेगा नहीं, फिर हमारी नौकरी चली जाएगी, परदेस जाने की मजबूरी होगी। सरकार कहती है हम रोजगार ला रहे हैं, लेकिन यहां तो आया हुआ रोजगार वह खत्म हो रहा है। अनलोडिंग करने वाले मजदूर बोले- अब रोज काम नहीं मिल रहा है अनलोडिंग करने वाले मजदूर स्थानीय शंभू महतो, गोलू, ललन सहित अन्य बताया जब से यह फैक्ट्री खुला हमलोगों को परदेस में मोटिया का काम करने से राहत मिल गया था। लेकिन अब काम रोज नहीं मिल रहा है, अब हम लोग को फिर परदेस ही जाना पड़ेगा। महीना में मात्र 15 दिन काम मिल रहा है। पहले प्रत्येक महीना 26-27 हजार रूपया कमा लेते थे। अभी 10 से 12 हजार ही कमा पाते हैं, ऐसे में परिवार कैसे चलेगा। अभी बस 50 लोग काम कर रहे हैं और सब के सब परेशान हैं। एथेनॉल पॉलिसी में केंद्र ने क्या बदलाव किया है? जानकार कहते हैं कि अधिकतर चीनी मिल महाराष्ट्र और गुजरात में है, जो बड़े-बड़े नेताओं और बड़े कॉर्पोरेट घरानों के हैं, इसलिए यह निर्णय लिया गया है।


